Monday, January 24, 2022
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हिंसा-अहिंसा

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हिंसा चाहे कितने ही उचित कारणों से की जाए कहलाती हिंसा ही है। उसका किसी भी काल, कारण, स्थिति, के कारण ‘अहिंसा’ में परिवर्तन नहीं हो जाता। वैसे तो प्रतिकार या आत्मरक्षा में हिंसा का हो जाना संभव है, तब भी वह विवशता में की गई हिंसा ही कहलाएगी।

ऐसी हिंसा के लाख अवश्यंभावी कारण जताकर भी उसे ‘अहिंसा’ के रूप में स्थापित नहीं जा सकता। कानून किसी को भी दंडित कर देने की जनसामान्य को अनुमति नहीं देता, चाहे दंड देना कितना भी न्यायसंगत हो। अदालती भाषा में इसे ‘कानून हाथ में लेना’ कहते है।

अन्यथा लोग स्वयं न्यायाधीश बन, प्रतिरक्षार्थ एक-दूसरे को दंडित ही करते ही रहेंगे। और बाकी जो बच जाएं, उन्हें प्रतिशोध में दंडित करेंगे। इस तरह तो हिंसा का ही राज स्थापित हो जाएगा। इसीलिए अत्याचार और अन्याय के बाद भी प्रतिशोध में दंडित करने का अधिकार अत्याचार भोगी को भी नहीं दिया गया है।

हिंसक विचारधारा और हिंसा की यह व्यवस्था सभ्य समाज में स्वीकृत नहीं होती। इसका भी कारण है। सभी तरह के कारणों कारकों पर समुचित विचार करने के बाद ही अपराध निश्चित किया जाता है। प्रतिरक्षा में हिंसा अपवाद स्वरूप है प्रतिरक्षात्मक हिंसा से पहले भी अन्य सभी विकल्पों पर विचार किया जाता है।

यह सुनिश्चित करने के लिए ही न्यायालय व्यवस्था होती है। अन्यथा सामान्य जन जल्दबाजी, आवेश, क्रोध आदि वश निरपराधी की हिंसा हो सकती है। प्रतिरक्षा में हिंसा हमेशा एक ‘विवशता’ होती है, यह विवशता भी गर्भित ही रहनी भी चाहिए।

इस प्रकार की हिंसा का सामान्ययीकरण करना हिंसा को प्रोत्साहन देना है। ऐसी हिंसा की संभावना एक अपवाद होती है। अत: विवशता की हिंसा को अनावश्यक रूप से जरूरी नियम की तरह प्रचारित नहीं किया जाना चाहिए। और न ही इसे अहिंसा कहकर भ्रम मंडित किया जाना चाहिए।


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