
तपस्वियों का मान केवल उनके ज्ञान या तप के कारण नहीं रहा है, उनके मान के कारणों में उनका धैर्य-भरा जीवन और त्यागी जीवन शैली भी शामिल रही है। मिथिला के एक नैयायिक थे, किरणावली- ईश्वर सिद्धि के रचयिता उदयनाचार्य। उन्होंने सदा सत्य का सहारा लिया, कभी किसी की ठकुरसुहाती नहीं की, सुविधा या लाभ के लिए किसी की खुशामद या याचना नहीं की। ईश्वर सिद्धि का विवेचन कर वे विजय पाते रहे। इतने त्यागी, तेजस्वी पंडित के घर में अभाव ही अभाव थे। एक समय ऐसा भी आया कि उनकी पत्नी के पास बदलने के लिए वस्त्र ही नहीं थे। वे फटे-पुराने वस्त्र पहनकर मुंह अंधेरे ही नदी जाती और स्नान करके मटकी में पानी भर कर लातीं थी। एक दिन उन्हें थोड़ी देर हो गई और उजाला हो गया। राह में किसी परिचित ने उनके फटे-पुराने कपड़ो को देखा और फिर दूसरों से इसकी चर्चा की। यह सुनकर पंडिताइन रो उठीं। रोती-बिलखती घर आई। पत्नी को रोता देखकर संयमी तपस्वी उदयनाचार्य भी विचलित हो उठे। उनकी पत्नी अभावों-कष्टों में भी कभी नहीं रोई थीं। पत्नी से सारी बात जानकर बोले, ‘अब तो तुम्हारे लिए राजा के द्वार तक जाना ही होगा।’ पति-पत्नी दोनों चले। रास्ते में नदी पड़ी। मल्लाह ने नदी की उतराई मांगी। उदयनाचार्य सरल भाव से बोले, ‘पंडित हैं।’ मल्लाह बिगड़कर बोला, ‘सभी अपने को पंडित कहते हैं। पंडित तो मिथिला-भर में अकेला उदयन है, जो घोर अभाव में रहा, पर कभी किसी के सामने हाथ नहीं फैलाया।’ यह बात सुनते ही पत्नी ने पति से कहा की ‘सिंदूर की डिबिया घर पर ही रह गई है, घर वापस जाना होगा, तो आप नाव से उतर जाइए। दोनों घर लौट आए। पत्नी ने कहा, ‘हम दुख कष्ट सह लेंगे, पर अब कहीं नहीं जाएंगे। ऐसे यश को कभी कलंकित नहीं करूंगी। किसी के सामने आपके यशस्वी हाथ को पसारने का मौका नहीं दूंगी।


