
वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम ने कुछ समय पहले ही ‘ग्लोबल रिस्क्स रिपोर्ट-2022’ जारी की है। इस रिपोर्ट ने इस वर्ष और भविष्य में होने वाले वैश्विक स्तर के विभिन्न खतरों से विश्व बिरादरी को सावधान करने का प्रयास किया है। वस्तुत: संपूर्ण संसार और मानवता का भविष्य इन खतरों के कारण अधर में है और यदि मानवता को अपने को इनसे बचाना है तो समझना होगा कि सावधानी ही दुर्घटना रोकने का एकमात्र उपाय है। वास्तव में ग्लोबल रिस्क्स रिपोर्ट विभिन्न समस्याओं की बाढ़ को बताती, समझाती और सावधान करती है। हां, फिर भी हम सब यदि बाढ़ में फंसना और बहना चाहें तो वह कुछ नहीं कर सकती है। आइये इसको समझें।
वर्ष 2020 की शुरुआत कोविड-19 के फैलाव से हुई है। कोरोना ने संपूर्ण विश्व को एक वास्तविक बिरादरी में परिवर्तित कर दिया है जो कि डरी और सहमी है। ऐसी डरी और सहमी हुई जमात को विभिन्न खतरों से आगाह करने के लिए ही यह रिपोर्ट तैयार की गई है। ‘ग्लोबल रिस्क्स रिपोर्ट’ तैयार करने के लिए विश्व के कुछ चुनिंदा विशेषज्ञों, व्यवसाइयों, सरकारों और सिविल सोसाइटी के लोगों से आर्थिक, पर्यावरणीय, भूराजनैतिक, सामाजिक और तकनीकी क्षेत्रों से उत्पन्न हो सकने वाले अल्पकालीन (0-2वर्ष), मध्यमकालीन (2-5वर्ष) और दीर्घकालीन (5-10वर्ष) चुनौतियों एवं खतरों के बारे में जानकारी ली गई है और हम सबको इनसे शतर्क किया गया है। आर्थिक चुनौतियों और खतरों में ऋण संबन्धी समस्याएं, देशों में आर्थिक क्षेत्र की लंबी सुस्ती, संपत्तियों और उद्योग क्षेत्र का धराशाही होना, कीमत अस्थिरता आदि मुद्दे सम्मिलित हैं। दूसरी तरफ पर्यावरणीय सक्रियता पर नियंत्रण की असफलता, चरम मौसम, जैव विविधता की हानि, प्राकृतिक संसाधनों सम्बन्धी खतरे आदि पर्यावरणीय समस्याओं में सम्मिलित हैं।
इस रिपोर्ट के अनुसार कुछ खतरे ऐसे हैं जिनसे कि अन्य खतरे और भी बढ़ या गंभीर हो जाते हैं। जैसे पर्यावरणीय सक्रियता के नियंत्रण की असफलता से स्वास्थ्य समस्याओं का बढ़ना, प्राकृतिक संसाधनों पर विपरीत असर होना, आजीविका सम्बंधित खतरे तथा विपरीत मौसम के खतरे आदि का बढ़ना सम्मिलित हैं। इसी तरह, चरम मौसम, प्राकृतिक संसाधनों, पर्यावरणीय सक्रियता के नियंत्रण की असफलता और जैव विविधता के नुकसान को और गंभीर कर देता है। इससे अनैक्षिक प्रवसन बढ़ने के साथ-साथ सामाजिक एकजुटता और भू राजनैतिक संसाधन भी प्रभावित होता है। इसी तरह जैव विविधता की कमी अनेक समस्याओं को बढ़ाती है।
क्या हैं इस विवरण के निहितार्थ? कोविड ने वैश्विक चुनौतियों को एक ऐसी ऊंचाई दे दी है जो कि मानवता को खतरों के भंवर जाल में डाल चुकी है। खतरे अपरिमित हैं। ऋण के संजाल में अर्थव्यवस्थाएं फस चुकी हैं। इसका प्रभाव तीन से पांच वर्षों में गंभीर रूप धारण कर लेगा। अल्पावधि में सर्वाधिक गंभीर पांच खतरों में पर्यावरणीय खतरे और चरम मौसम सम्मिलित हैं।
इसके विपरीत, दीर्घावधि में सभी महत्वपूर्ण खतरे पर्यावरण से ही सम्बंधित होंगे और इन खतरों को रोक पाना संभव भी नहीं दिखाई देता क्योंकि विश्व जनमानस की क्षमता पर विश्व जनमत का विश्वास कम ही है। डिजिटल असमानता से भी जनमानस ग्रसित होगा क्योंकि लगभग 3 बिलियन लोगों को सूचना सम्प्रेषण और विश्लेषण की यह सुविधा प्राप्त ही नहीं है। आमजन साइबर असुरक्षा से दो-चार होंगे। इंग्लैंड में सन 2020 में 117 प्रतिशत आयतन (वॉल्यूम) में और 43 प्रतिशत मूल्य (वैल्यू) में इंटरनेट बैंकिंग फ्रॉड में वृद्धि दिखाई पड़ी ।
रिपोर्ट बताती है कि कोरोना के कारण विश्व अर्थव्यवस्था में सन 2024 तक 2.3 प्रतिशत का सिकुड़ाव होगा। बढ़ती हुई कीमतें और ऋण का बोझ, श्रमिक बाजार संबन्धी असंतुलन, संरक्षण वादी नीति के फैलाव की आशंका आदि से सरकारें दीर्घकालीन प्राथमिकताएं अपनाने में अपने को असमर्थ पाएंगी। पर्यावरणीय चुनौतियां इतनी विकराल हो चुकी हैं कि सन 2050 तक नेट जीरो का लक्ष्य पाना कठिन है। वातावरण सम्बन्धी नीतियों में कोई भी जल्दीबाजी में परिवर्तन का विपरीत असर होगा।
कार्बन उत्सजित करने वाले उद्योगों की समाप्ति से लाखों लोग बेरोजगार होंगे। साइबर सुरक्षा तार-तार हुई है। सन 2020 में मैलवेयर और रानसोमवायर वायरस के हमले में वृद्धि क्रमस: 358 प्रतिशत और 435 प्रतिशत हुई है और इसे नियंत्रित्र कर पाना हम सभी के लिए एक चुनौती हो गया है। सरकारों के बीच इससे सम्बंधित सहयोग न बना तो सरकारों में विवाद का यह एक महत्वपूर्ण कारण बनेगा। अत्यधिक सैटलाइट्स को अंतरिक्ष में भेजे जाने से वहाँ इनके बीच दूरी के सामंजस्य की समस्या बढ़ती जाएगी।
वैश्विक खतरे राजनैतिक सीमाओं की अनदेखी ही नहीं करते हैं वरन विश्व जनमत को चुनौती देते हैं। लिहाजा बसुधैव कुटुंबकम की भारतीय सोच से आगे बढ़ना होगा। किंतु भारत भी क्या इन खतरों से सावधान है? शायद नहीं। क्या हम ‘सामाजिक एकजुटता अथवा सद्भाव की कमी’ नहीं झेल रहे हैं? क्या भारतीय समाज, धर्म और जाति के आधार पर विभाजित नहीं दिखाई देता है? कश्मीर फाइल्स ने क्या इस बिखराव को हवा नहीं दी है? नौजवानों के सामने क्या आजीविका प्राप्त करना आज सबसे बड़ी चुनौती नहीं है? क्या भारत का कर्ज, जीडीपी का नब्बे प्रतिशत तक नहीं हो गया है? सत्य तो यह है कि इन सभी प्रश्नों के उत्तर हां में ही हैं और सरकार अपने राजकोषीय लक्ष्यों का भलीभांति संधान नहीं कर पा रही है।
चीन और पाकिस्तान से भारत का बढ़ता विवाद क्या भू-राजनैतिक और भू-आर्थिक विवाद का एक जीता जागता सबूत नहीं है। रूस और यूक्रेन के मध्य जंग भी तो यही बताता है। क्या भारत में साइबर सुरक्षा एक जटिल समस्या नहीं हो गई है? क्या मौसम परिवर्तन की मार हम नहीं झेल रहे हैं? क्या सुनामी का कहर हमने नहीं झेला था? क्या केदारनाथ क्षेत्र में ग्लेश्यिर पिघलने और बादल फटने की घटनाएं हमें आक्रांत नहीं करतीं? क्या ओवरसीज डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट का यह आकलन कि जलवायु परिवर्तन के कारण भारत में सन 2100 तक प्रतिवर्ष जीडीपी में 3 से 10 प्रतिशत की कमी होगी-एक गंभीर चुनौती नहीं खड़ा करता। सच तो यह है कि हम भी सभी वैश्विक खतरों से आक्रांत हैं और शुतुरमुर्ग बन जाने से खतरों की आंधी नहीं रुक जाएगी ।




