- राज्यपाल ने पूरे प्रकरण को लिया गंभीरता से की जा रही है रिपोर्ट तैयार
जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: नगर निगम में तेल के खेल को लेकर प्रदेश के राज्यपाल ने जांच बैठा दी है। प्रदेश के राज्यपाल की तरफ से जांच रिपोर्ट सिटी मजिस्ट्रेट से मांगी गई है। दरअसल, ये जांच निगम में चल रहे तेल के खेल को लेकर कराई जा रही है। फागिंग मशीनों की तेल की क्षमता कितनी है तथा कितना तेल हर रोज उनको आवंटित किया जा रहा है? इसके अलावा निगम की डिपो से गाड़ियों को जो तेल की पर्चियां दी जा रही है, उसमें बड़ा खेल किया जाता है। इस तरह से निगम को तेल के खेल में बड़ा नुकसान पहुंचाया जा रहा है।
इसकी शिकायत बीके गुप्ता ने निगम के अधिकारियों से की थी, जिसमें कोई कार्रवाई नगरायुक्त डा. अरविन्द चौरसिया ने नहीं की। इसके बाद ही बीके गुप्ता ने प्रदेश के राज्यपाल को एक प्रार्थना पत्र भेजकर इच्छा मृत्यु देने की गुहार लगाई थी। कहा था कि भ्रष्टाचार के खिलाफ उन्होंने शिकायत की, जिसमें भ्रष्टाचार में लिप्त नगर निगम के उन कर्मचारियों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हो रही है।
इसके प्रमाण भी दिये गए हैं, मगर फिर भी कार्रवाई नहीं की जा रही है। यही नहीं, उल्टे बीके गुप्ता को धमकाने का काम किया जा रहा है। इस पूरे प्रकरण से आहत होकर ही बीके गुप्ता ने प्रदेश के राज्यपाल को एक प्रार्थना पत्र भेजकर इच्छा मृत्यु मांगी थी। इसके बाद ही राज्यपाल ने पूरे प्रकरण को गंभीरता से लेते हुए सिटी मजिस्ट्रेट से जांच रिपोर्ट मांग ली है।
सिटी मजिस्ट्रेट ही तेल के खेल की जांच कर रहे थे। एक सप्ताह के भीतर इस पूरे प्रकरण में सिटी मजिस्टेÑट रिपोर्ट तैयार कर प्रदेश के राज्यपाल को भेजेंगे। महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि तेल का खेल डिपो में व्यापक स्तर पर चलता है, जिसमें एक राउंड गाड़ियों का लगता है, लेकिन तेल चार-चार राउंड लगाने का लिया जाता है।
पेट्रोल पंप से भी सेटिंग का खेल चल रहा है। ऐसे पेट्रोल पंप से ही तेल निगम खरीदता है, जहां पर सेटिंग है। निगम की गाड़ियों में तेल कम लिया जाता है, प्राइवेट वाहन में तेल भरवा दिया जाता है। तेल को लेकर नगरायुक्त के खिलाफ शिकायत भी हुई थी। क्योंकि पहले यह तेल ज्ञानेन्द्र के पेट्रोल पंप से लिया जाता था, लेकिन बीच में नगर निगम ने ज्ञानेन्द्र के पेट्रोल पंप से तेल लेना मना कर दिया था।
इसके बाद अन्य पेट्रोल पंप से तेल लिया गया। इसकी भी शिकायत हो गई थी। इन तमाम मामलों की शिकायत होने के बाद ही प्रदेश के राज्यपाल ने सिटी मजिस्ट्रेट से रिपोर्ट मांगी है। रिपोर्ट एक सप्ताह के भीतर तैयार करके देनी होगी।
प्लाट आवंटन के मामले में क्लर्क पर भी गिर सकती है गाज
आवास विकास परिषद के प्लाट नीलामी भ्रष्टचार की गाज क्लर्क पर भी गिर सकती है। जांच रिपोर्ट आने के बाद यह कार्रवाई हो सकती है। पहले सम्पत्ति अधिकारी को हटाया जा चुका है। प्लाट नीलामी का मामला सुर्खियों में बना हुआ है। इसके बाद ही इसकी जांच पड़ताल की जा रही है।
सम्पत्ति अधिकारी अनिल गुप्ता को हटाने के बाद ही निष्पक्ष जांच की जा सकती है। सम्पत्ति अधिकारी अनिल गुप्ता पर प्लाट नीलामी में घूस मांगने का आरोप लगा था। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को पोर्टल पर भ्रष्टाचार की शिकायत की गई थी,जिसकी जांच भी कराई जा रही है।
इसी मामले को लेकर कार्रवाई की गाज नहीं गिर जाए,इससे बचने के लिए ही अनिल गुप्ता दो दिन लखनऊ में रहे। निलंबन से तो विभागीय अफसरों ने सम्पत्ति अधिकारी को बचा लिया, लेकिन मेरठ से आगरा तबादला कर दिया था। तबादला करना कोई सजा नहीं है।
क्योंकि सम्पत्ति अधिकारी पर प्लाट नीलामी में भ्रष्टाचार करने के गंभीर आरोप लगे हैं। एक नहीं, बल्कि कई मामले प्लाट आवंटन में घपलेबाजी के सामने आये है। इन सभी की जांच होती है तो सम्पत्ति अधिकारी के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर भ्रष्टाचार के मामले में गिरफ्तारी की जा सकती है, मगर विभागीय अफसरों ने सम्पत्ति अधिकारी को बचाने के लिए सिर्फ मेरठ से आगरा तबादला कर दिया गया।
उनके तबादले के बाद आवास विकास परिषद में इस पूरे प्रकरण की जांच पड़ताल की जा रही है। इसमें क्लर्क पर भी गाज गिर सकती है। क्योंकि फाइलों में जो भी घालमेल हुआ है, उसमें क्लर्क भी लिप्त रहे हैं।
बिल पहले बढ़ाकर भेजा जाता है, फिर कर दिया जाता है कम
नगर निगम के खेल भी निराले हैं। डिजिटल की बात की जा रही है, लेकिन निगम का जल-कल अनुभाग अभी भी नॉन डिजिटल है। पानी के बिल जो निगम कर्मी चाहते है, वहीं बना देते हैं। हाथ से बनाया गया बिल यदि किसी का चार हजार का है तो उसे सेटिंग कर आधा भी कर दिया जाता है। यही सब निगम में चल रहा है। आखिर इस पूरे सिस्टम को कौन सुधारेगा?
शहर की करीब 16 लाख आबादी है। पेयजल टैक्स शहर के लोगों से नगर निगम वसूलता है। ये पैसे से जुड़ा मामला है, इसलिए यह डिजिटल होना चाहिए,मगर यहां बिल ज्यादा भेजना और फिर कम कर देने का खेल निगम में चल रहा है। एक-दो नहीं, बल्कि व्यापक स्तर पर बिलों में गड़बड़ी की जा रही है, जिनकी शिकायत सामने आ चुकी हैं।
इसी तरह का मामला पहले एमडीए में भी बड़ा घपला हो चुका हैं। फिर नगर निगम में तो जांच पड़ताल की ही नहीं जाती है। नगर निगम में व्यापक गड़बड़ी हाथ से भेजे जाने वाले बिलों में की जा रही है। कितना पैसा प्रत्येक माह निगम में आ रहा हैं? वसूली करने वाले कर्मचारी यह धनराशि निगम में पूरा जमा करा भी रहे हैं या फिर नहीं?
इसकी शिकायत पार्षद मनीष पंवार ने भी की है। उन्होंने इसको लेकर सूचना भी नगरायुक्त से मांगी है। उनका कहना है कि हाथ से जो भी पेयजल टैक्स के बिल बनाये जा रहे हैं, उसमें बड़ा घालमेल किया जा रहा है। इसकी जांच कराई जानी चाहिए, तभी सत्यता सामने आ सकती है। क्योंकि बिल बढ़ाकर भेजा जाता है, फिर उसे कम कर दिया जाता है। यह सब खेल सेटिंग से चल रहा है। इसमें नगर निगम के क्लर्क लिप्त है,उनके खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए।

