Tuesday, March 24, 2026
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इतिहास और इतिहास का सच

Samvad 52


dinesh Pratap singhसमय-समय पर शिक्षा में नई नीतियों का समावेश होता रहा है। ‘कोठारी आयोग’ 1962-64), ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति’ (1986), और अब नई शिक्षा नीति (2019-20) आकार ग्रहण कर रही है। बीच में प्रोफेसर यशपाल के तत्वावधान में बहुचर्चित ‘राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा-2005’ भी आया था। इसके अंतर्गत बच्चों के बस्ते का बोझ कम करने के लिए करीब एक तिहाई पाठ्यक्रम काम करने का सुझाव था। नई नीतियों के आगमन के साथ पाठ्यक्रम में कुछ परिवर्तन होता है। यह स्वभाविक और आवश्यक प्रक्रिया है।किसी अन्य विषय की पाठ्य पुस्तक के संशोधन में किसी को कोई आपत्ति भी नहीं होती, मगर इतिहास का नम्बर आते ही एक खास विचारधारा के विद्वान तत्काल लामबंद होने लगते हैं।

इनका मत होता है कि इतिहास फिर से नहीं लिखा जा सकता है। मगर इसका कोई तार्किक आधार नहीं समझ में आता है। निश्चित रूप से इतिहास घटित होता है, निर्देशित नहीं ! लेकिन अतीत के गर्त में पड़े अनजाने ऐतिहासिक तथ्य अगर उद्घाटित हो रहे हैं, तो इसका इतिहास में समायोजन क्यों नहीं होना चाहिए?

एक समय था, जब ‘सिंधु घाटी की सभ्यता’ का क्षेत्र विस्तार बहुत अधिक नहीं था। 1921 में रायबहादुर दयाराम साहनी और 1922 में राखलदास बनर्जी के क्रमश: हड़प्पा और मोहनजोदड़ों के पुरातात्विक उत्खनन से इस सभ्यता का पता चला था। यहां जो पुरातात्विक सामग्रियां प्राप्त हुई थीं, उनके विश्लेषण से वास्तु, नगर नियोजन, सामाजिक व आर्थिक जीवन, खानपान, वस्त्र-आभूषण, अस्त्र-शस्त्र, धार्मिक मान्यता, शिल्प, लिपि आदि की जानकारी हुई थी।

साथ इसका कालक्रम 3500 ईसा पूर्व से 2500ईसा पूर्व निर्धारित हुआ था। कई दशकों तक इतिहास के विद्यार्थी इसे पढ़ते रहे। मगर अब इस सभ्यता का काफी क्षेत्र विस्तार हो चुका है। 1952 में पुरातत्ववेत्ता अमला- नन्द घोष कीदेखरेख में कालीबंगा में उत्खनन हुआ। बाद में बीके थापर और बीबी लाल ने 1961 से 1969 के बीच इस क्षेत्र में काफी काम किया।

इनको उत्खनन में दो प्रस्तर ऐसे मिले जो सिंधु सभ्यता से पुरातन ‘सरस्वती सभ्यता’ के संकेतक हैं। कालीबंगा के साथ अब लोथल, राखीगढ़ी, रोपड़, मेहरगढ़, रंगपुर, कच्छ जैसे कई क्षेत्र जुड़ चुके हैं। आज की स्थिति में यह 13 लाख वर्ग किलोमीटर के क्षेत्रफल में त्रिभुजाकार स्वरूप में फैली है।

यह पूर्व में घटित वह परिदृश्य हैं, जो अब सामने आ रहे हैं। कालीबंगा और मेहरगढ़ की कार्बन डेटिंग जैसी अत्याधुनिक पद्धति से आई.आई.टी. (खड़गपुर) एवं भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की टीम ने जो निष्कर्ष निकाल है, उसके अनुसार यह 5500 सौ साल पुरानी नहीं, बल्कि 8000 साल पुरानी ठहरती है। इस प्रकार यह मिस्र और मेसोपोटामिया की सभ्यता से प्राचीन और विकसित सभ्यता है।

1903 में गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने ‘भारतवर्ष का इतिहास’ विषय पर शांति निकेतन में एक भाषण दिया था। इसमें गुरुदेव टैगोर ने कहा था, भारत का इतिहास वह नहीं है जो हम परीक्षा के लिए पढ़ते और याद करते हैं। यह आक्रांताओं का सिंहासन के लिए पिता-पुत्र और परिजनों के बीच हत्याओं और लड़ाइयों का आख्यान है।

इस इतिहास में यह जिक्र नहीं है कि उन उथल-पुथल भरे दिनों में देश के लोग क्या कर रहे थे? इतिहास में क्या लोगों की जीवन-शैली, शिक्षा, साहित्य, कला, धर्म, स्थापत्य, मान्यताओं का स्थान नहीं होना चाहिए? राहुल सांकृत्यायन भी वामपंथी थे। वह भी इस बात के पैरोकार थे कि इतिहास राजवंशों के उत्थान-पतन, युद्धों, सैनिक-संगठन और प्रशासन व्यवस्था तक ही सीमित नहीं होना चाहिए।

इसमें शिल्पकार, किसान, मजदूर, व्ययसाइयों की छवियों का समावेश भी जरूरी है। उनका मत था कि इतिहास अतीत का ज्ञान और अध्ययन है। अतीत में सिर्फ सामंत ही नहीं थे, सामान्यजन भी थे। इसलिए उनकी सामूहिक स्मृतियों का भी इतिहास में समावेश होना चाहिए। राहुल सांकृत्यायन जब ‘मध्य एशिया का इतिहास’ लिख रहे थे तो उन्होंने इसी फ्रेम वर्क पर कार्य करके इतिहास लेखन की एक नई शैली विकसित की थी।

भारत वर्ष के इतिहास का कालक्रम के अनुसार राजवंशों से संबन्धित विशिष्ट घटनाओं का तथ्यात्मक और क्रमिक स्वरूप प्रस्तुत करने का दायित्व जेम्स मिल ने लिया था। वह एक अर्थ-शास्त्री, दार्शनिक और इतिहासकार थे। कहा जाता है कि ‘मनुस्मृति’ की गलत ढंग से की गई एक व्याख्या को पढ़कर वह भारत, हिंदूधर्म, संस्कृत साहित्य और ब्राह्मणों के कटु आलोचक बन गए थे।

भारतीय इतिहास लेखन का कार्य इन्होंने 1805 में शुरू किया और 1817 में छह खंडों में ‘द हिस्ट्री आॅफ ब्रिटिश इंडिया’ अस्तित्व में आयी थी। इसके तीन भाग थे। इसमें प्राचीन युग के इतिहास को हिंदू काल, मध्य युग को मुस्लिम काल तथा आधुनिक काल को ब्रिटिश काल के रूप में विभाजित किया गया है।

हिंदू काल में जातिगत आधार पर शोषण और अत्याचार है। इस पूरे कालखंड में ऊंच-नीच, धार्मिक पाखंड, अन्याय, शोषण, निर्दयता, सामाजिक विषमता और अंधविश्वास केन्द्रीय भाव के रूप में मौजूद है। मध्य युग अपेक्षाकृत ठीक है, मगर यहां भी शासकों की सदइच्छा के बाद भी धार्मिक वैमनस्य कायम है। जातिगत बंधन, धार्मिक कट्टरता, खून-खराबा, अस्थिरता भी मौजूद है।

अन्याय और शोषण बदस्तूर जारी है।यह सारी दुर्दशा हिंदुओं की बची-खुची ताकत के कारण है।जबकि आधुनिक ब्रिटिश काल को जेम्स मिल ने न्याय, प्रगति, सभ्यता, सद्भाव और शांति का प्रतीक सिद्ध करने का प्रयास किया है। उनका मत था कि अंग्रेजों को भारत के सारे भूभाग पर कब्जा कर लेना चाहिए, ताकि भारत के पिछड़े, बर्बर और असभ्य लोगों जीवन में सुख और ज्ञान का संचरण हो सके।

वास्तव में ‘द हिस्ट्री आॅफ ब्रिटिश इंडिया’ का काल विभाजन ही दोषपूर्ण है। अगर प्राचीन और मध्ययुग क्रमश: हिंदू व मुस्लिम काल थे तो आधुनिक युग ईसाई काल क्यों नहीं हुआ? कैसे वह ब्रिटिश काल हो गया। यह विभाजन सच्चाई से दूर था। इसका उद्देश्य लोगों को विभाजित करके फूट डालना था। मध्ययुग के विवेचन में मुस्लिम तुष्टीकरण के बीज उपस्थित हैं।

इससे वह हिंदू-मुसलमान के बीच भेद पैदा करने में सफल भी हो गए थे। वैसे इतिहास के किसी भी दौर को हिंदू या मुसलमान के रूप में नहीं बांटा जा सकता, किसी भी दौर में सभी धर्म एक साथ चलते हैं। प्राचीन काल में सभी शासक हिंदू नहीं थे, देश के कई क्षेत्रों में बौद्धों का भी राज था। शक, हूण और कुषाण भी समय-समय राज किए हैं।

निश्चय ही जो इतिहास पढ़ाया जा रहा है, वह एकांगी और पक्षपातपूर्ण है। इसमें अतीत के सकारात्मक पक्ष का भाव होना चाहिए। यह काम आजादी के तत्काल बाद होना चाहिए था, किंतु हम आजादी का अमृतोत्सव मनाने के दौर में पहुंच गए और इसे न कर सके। अब हमें लंबी नींद का परित्याग करके अपने स्वर्णिम अतीत में झांकना ही होगा।


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