कहीं आप भी अपने बच्चों को खेलने से रोकते तो नहीं? यदि हां, तो निश्चित ही आप अनजाने में अपने बच्चों के व्यक्तित्व निर्माण में बाधक बन रहे हैं। यदि मां बाप अपने बच्चों को खेलने की अनुमति नहीं देते हैं तो बच्चों में अनेक स्थायी दोष मसलन कायरता, दब्बूपन, शर्मीलापन आदि अनायास ही व्याप्त हो जाते हैं।
बच्चों को खेलने का मौका जरूर दें। ऐसा नहीं करेंगे तो बच्चे में सहानुभूति, आत्म विश्वास एवं परस्पर सहयोग जैसी आवश्यक भावनाओं का विकास नहीं हो पाता। इससे बच्चे न केवल कक्षा में पिछड़ जाते हैं, बल्कि उनके स्वास्थ्य का विकास भी नहीं हो पाता।
बच्चे स्वभाव से क्रि याशील होते हैं और क्रि याशीलता ही उनके जीवन का आधार है। स्पष्ट है, खेल ही बच्चों के जीवन का सार है। खेलों के माध्यम से वे भविष्य की तैयारी करते हैं।
शारीरिक और मानसिक विकास
खेलों के माध्यम से बालक का सर्वांगीण विकास होता है। इससे उसका शरीर सुदृढ़ बनता है तथा स्वास्थ्य अच्छा रहता है। खेलों में चूंकि भागदौड़ होती है, लिहाजा इससे रक्त संचार ठीक रहता है एवं मांसपेशियां भी मजबूत होती हैं।
दूसरी तरफ बच्चों के मानसिक विकास के लिए भी खेल निहायत जरूरी हैं। खेल के द्वारा दूसरों के विचार और अनुभव ग्रहण करने की क्षमता बच्चों में स्वत: ही जागृत होती है। आमतौर पर यह देखा जाता है कि जो बालक बचपन में जितना अधिक खेलता है, वह दूसरे बच्चों की अपेक्षा उतना ही अधिक अनुभवी होता है।
खेल बच्चे को अपने आस पास के वातावरण और घटनाओं को समझने में सहयोग देते हैं। खेल में ही बच्चों की रूचियां, मूल प्रवृत्तियां और भावनाएं शामिल होती हैं। बच्चे का लगातार विकासशील शरीर और मांसपेशियां अनेक क्रि याएं चाहते हैं।
बच्चे में कुछ अतिरिक्त ताकतें संचित होती हैं जिसे वह खेल कर भुनाता है। अच्छी खेल सुविधा व साधन के अभाव में और गैरजरूरी नियंत्रण से उसकी यह अतिरिक्त ताकत विध्वंसात्मक क्रि याओं में व्यय होती है। मसलन बर्तनों की तोड़ फोड़, बात बात पर रोना, बेबात जिद इत्यादि।
सामूहिक भावना का विकास
खेल अनुकरणात्मक सामाजिक क्रि या भी है। साधारणतया दो से पांच वर्ष तक के बच्चे के खेल व्यक्तिगत व मात्र स्वयं तक ही सीमित होते हैं। बाद में ज्यों ज्यों बच्चे बड़े होते जाते हैं, उनमें अकेले खेलने की प्रवृत्ति कम होती जाती है तथा वे अकेले रहने की अपेक्षा हमउम्र बच्चों के साथ रहना और सामूहिक खेल खेलना अधिक पसंद करते हैं। चूंकि सामूहिक खेल आपसी व सद्भावना के उश्वम हैं, लिहाजा इनसे बच्चे दूसरों के साथ खेलते खेलते बहुत कुछ सीख जाते हैं।
बच्चा अपनी इच्छानुसार और पसंदीदा खेल अपनाता है। आप बच्चे के खेल में रूकावट नहीं बल्कि उसके सहायक बनिए। अपना मनपसन्द खेल खेलने से बालक की दिनभर की थकान और तनाव दूर हो जाता है। इससे उसमें एक नए उत्साह और उमंग से पढ? लिखने की भावना जागृत होती है।
च्चों को खेलने भी दें’, इसके माने यह नहीं है कि आपका बच्चा सारे दिन खेलता ही रहे। यदि शुरू से ही बच्चे के खेल के लिए समय निर्धारित कर दिया जाये तो उत्तम रहता है। यदि आपका बच्चा खेलने में कम रूचि लेता है तो उसे समझाकर कुछ देर खेलने के लिए प्रोत्साहित करना भी आपका दायित्व है।
हां, इस बात की जानकारी अवश्य रखें कि कहीं आपका बच्चा अपराधी प्रवृत्ति के बच्चों के साथ तो नहीं खेल रहा ? यदि ऐसा है तो उसे ऐसे बच्चों के साथ खेलने से रोकें क्योंकि इससे आपका बच्चा बिगड़ सकता है। यदि आप अपने बच्चों का व्यक्तित्व प्रखर करना चाहते हैं तो उन्हें खेलने भी दें।