Sunday, February 15, 2026
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चमक गंवाते भारत-रत्न

Ravivani 28


कुमार प्रशांत |

सब जानते हैं कि हाल में भारत रत्न से ताड़तोड़ नवाजे गए पांच वरिष्ठों को सम्मानित करने के पीछे क्या मंशा रही है, लेकिन क्या चुनाव जीतने की मामूली हुलस में देश के इस सर्वोच्च सम्मान की प्रतिष्ठा घटाई नहीं जा रही? क्या आजकल नागरिक सम्मान भी वोट कबाड़ने की नायाब तरकीब में तब्दील नहीं हो रहे हैं? रत्नों का यह बंटवारा दरअसल किसी दूसरे को नहीं, दूसरे के बहाने खुद को महिमा-मंडित करने की चालाकी है। हमने अपने गणतंत्र को इसी नकल पर संयोजित किया तो राज्य-पुरस्कारों का चलन भी शुरू किया। हम भीतर से जितने दरिद्र होते हैं, बाहरी अलंकरणों से उसे उतना ही छिपाने की कोशिश करते हैं। आज वही तमाशा चल रहा है। भारत-रत्न इतना खोखला कभी नहीं हुआ था।

कहावत पुरानी है कि भगवान जब देता है तो छप्पर फाड़कर देता है! इस बार अब तक छप्पर से पांच रत्न बरस चुके हैं। इस वर्ष को छोड़ दें तो 48 रत्नों की खोज हमने पहले ही कर ली थी। अब हो गए हैं 53, यानी अर्द्ध-शतक पूरा हो चुका है। वैसे भी इतने रत्न होने के बावजूद हम इतने दरिद्र व फूहड़ क्यों हैं? महात्मा गांधी ने डेढ़ सौ साल पहले जब हिंद-स्वराज लिखी थी, तब भारत-रत्न का जन्म भी नहीं हुआ था। हिंद-स्वराज में महात्माजी ने संसदीय लोकतंत्र की कटु समीक्षा करते हुए प्रधानमंत्री नाम के अनोखे प्राणी की आंतरिक विपन्नता पर भी उंगली उठा दी और लिख दिया कि वह अपनी सत्ता का सौदा कई तरह से, कई स्तरों पर करता है, जिनमें एक तरीका सम्मान बांटने का भी है। आपको यह भी देखना चाहिए कि रत्नों की इस ताजा खोज में सरकार ने पार्टी का भेद भी नहीं किया है। सबको एक नजर से, एक ही तराजू पर तोला गया है। जिन्हें काल के कूड़ेघर में फेंक दिया गया था, उन्हें भी जब वहां से निकालकर झाड़ा-पोंछ गया तो इस मीडिया नाम के जमूरे को उनमें नई ही रोशनी व चमक दिखाई देने लगी। अब कोई पिछले सालों की सारी खाक छानकर बताए कि कर्पूरी ठाकुर की किस विशेषता का जिक्र किसने, कब किया और इस मीडिया ने कब उनकी चमक कबूल की?
अब तो कई दावेदार पैदा हो गए हैं जो कह रहे हैं कि कर्पूरी ठाकुर को भारत-रत्न न मिलने के कारण वे सालों से सोये नहीं हैं। अब जाकर उन्हें नींद आएगी! लेकिन कर्पूरी ठाकुर का क्या? जैसे-जैसे लोग उनकी जैसी-जैसी प्रशंसा कर रहे हैं उससे उनकी नींद हराम हो गई हो तो हैरानी नहीं। अंग्रेजी अखबारों ने उनकी प्रशंसा में क्या-क्या नहीं लिखा, जबकि उनके रत्न बनने से पहले इन अखबारों ने कभी उनकी सुध भी नहीं ली और कभी ली भी तो उनको बेसुध करने के लिए ही ली। सुध लेने की बात निकली ही है तो 2014 के बाद से किसने लालकृष्ण आडवाणी की सुध ली? वे भारतीय जनता पार्टी के सौरमंडल के किस कोने में रहे अब तक, इसका पता उनमें से किसे है जो आज उनकी अक्षय-कीर्ति के गान गा रहे हैं? वे गा भी रहे हैं और कनखी से देख भी रहे हैं कि यह गान कहीं मर्यादा के बाहर तो नहीं जा रहा? जिस इशारे से लालकृष्ण आडवाणी को भारत-रत्न बनाया गया है, सबको पता है कि उस इशारे के इशारे से आगे नहीं निकलना है।
भारतीय राजनीति के शिखरपुरुषों में शायद ही कोई दूसरा होगा जिसे लालकृष्ण आडवाणी जैसी बेइज्जती झेलनी पड़ी होगी। असामान्य बेशर्मी से उन्हें सरेआम अपमानित करने का कोई अवसर चूका नहीं गया। आज वे और उनका परिवार कृतकृत्य होकर उस अपमान का सौदा भारत-रत्न से करने में जुटा है। यह ज्यादा दुखद इसलिए है कि आडवाणी-परिवार व जयंत सिंह परिवार के संस्कारों में अब कोई फर्क बचा ही नहीं है। कर्पूरी ठाकुर हों कि लालकृष्ण आडवाणी कि चौधरी चरण सिंह कि नरसिम्हा राव कि स्वामीनाथन, कौन कहेगा कि ये सब विशिष्ट जन नहीं हैं? लेकिन कोई नहीं कहेगा कि इनमें विशिष्टता थी तो क्या थी? हमारी परंपरा में मृतकों के लिए सच बोलने का चलन नहीं है। यह भी सही है कि याद ही रखना हो तो शुभ को याद रखना चाहिए। फिर भी एक सवाल तो बचा रह जाता है कि कैसे फैसला करेंगे कि कौन, किस श्रेणी का हकदार है?

सरकार के पास नागरिक सम्मान की चार श्रेणियां है न! क्या ये श्रेणियां व्यक्ति का कद नापने के इरादे से बनाई गई हैं? नहीं, पद्मश्री से पद्मविभूषण तक की सारी श्रेणियों को आंकने का आधार इतना ही हो सकता है कि किसने, किस क्षेत्र में ऐसा काम किया कि जिसका उनके क्षेत्र पर गहरा असर पड़ा? एक बड़ा डॉक्टर या इंजीनियर या प्रोफेसर पूरे समाज पर नहीं, अपनी विशेषज्ञता के किसी पहलू पर ही असर डालता है, तो वह पद्मश्री से नवाजा जा सकता है। कोई इससे बड़े दायरे को प्रभावित करता है तो पद्मभूषण और जो कई दायरों को प्रभावित करता है वह पद्मविभूषण से नवाजा जा सकता है। अगर राज्य द्वारा सम्मान कोई राजनीतिक क्षुद्रता की चालबाजी नहीं है तो ऐसे तमाम सम्मान व्यक्ति के छोटे या बड़े होने का फैसला नहीं करते, भारतीय समाज पर उस व्यक्ति के असर का आंकलन भर करते हैं। खिलाड़ी, अभिनेता, वैज्ञानिक जैसी हस्तियां अपने-अपने क्षेत्र में आला हो सकती हैं, लेकिन संपूर्ण भारतीय समाज व उसकी मनीषा पर उनका ऐसा कोई असर नहीं हो सकता कि जो व्यापक रूप से हमारी सोच-समझ को प्रभावित करता हो। यह सब भूलकर जब राज्य किसी को इस्तेमाल करने की छुद्रता करता है तब सम्मान अपमान में बदल जाता है। गांधी जिस अर्थ में इन सम्मानों को सत्ता की चालबाजी कहते हैं, उसे गहराई से समझने की जरूरत है।

भारत-रत्न का सीधा मतलब है कि आप ऐसे किसी व्यक्ति की बात कर रहे हैं, जिसने भूत-भविष्य व वर्तमान, तीनों स्तरों पर भारतीय मनीषा पर अपनी अमिट छाप छोड़ी है। यह वक्ती उपलब्धि की बात नहीं है, जिस हद तक इस नश्वर संसार में किसी की अविनाशी कीर्ति हो सकती है, उसकी बात है। अगर इस कसौटी को मान लें तो हमारे 53 भारत-रत्नों में से तीन भी इस पर खरे नहीं उतरेंगे। कोई क्रिकेट खेलता हो कि कोई गाना गाता हो वह हमारे वक्त का प्रतिनिधि हो सकता है, भारत-रत्न नहीं हो सकता। प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति बन जाना भारत-रत्न का अधिकारी हो जाना हर्गिज नहीं हो सकता है।
रत्नों का यह बंटवारा दरअसल किसी दूसरे को नहीं, दूसरे के बहाने खुद को महिमा-मंडित करने की चालाकी है। हमने अपने गणतंत्र को इसी नकल पर संयोजित किया तो राज्य-पुरस्कारों का चलन भी शुरू किया। हम भीतर से जितने दरिद्र होते हैं, बाहरी अलंकरणों से उसे उतना ही छिपाने की कोशिश करते हैं। आज वही तमाशा चल रहा है। भारत-रत्न इतना खोखला कभी नहीं हुआ था।


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