Sunday, May 24, 2026
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Supreme Court में बिहार SIR पर सुनवाई, लोकतंत्र, नागरिकता और चुनाव आयोग की प्रक्रिया पर सवाल

जनवाणी ब्यूरो |

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट में बिहार में चल रहे मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर बहस तेज़ हो गई है। सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया ने इस कवायद पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि यह मामला लोकतंत्र की जड़, यानी मतदान के अधिकार से जुड़ा है।

उन्होंने तीन मुख्य बिंदु उठाए जिसमें है पहला यह पूरी प्रक्रिया मतदाता अधिकार जैसे संवैधानिक मूल्यों को प्रभावित करती है। दूसरा, यह केवल चुनाव आयोग की शक्तियों पर नहीं, बल्कि अभियान की प्रक्रिया और पारदर्शिता पर भी सवाल है। तीसरा,सबसे अहम सवाल यह है कि ऐन चुनावों से पहले ही इस कवायद की क्या ज़रूरत पड़ गई?

चुनाव आयोग का पक्ष “हम मतदाता के बिना नहीं”

चुनाव आयोग की ओर से वरिष्ठ वकील राकेश द्विवेदी ने दलील दी कि ईसी का सीधा संबंध मतदाताओं से है। उन्होंने स्पष्ट किया कि हर भारतीय नागरिक, जो 18 वर्ष या उससे अधिक उम्र का है और किसी कानूनी प्रतिबंध के तहत अयोग्य नहीं है, वह मतदाता बनने का अधिकारी है। साथ ही, उन्होंने कहा कि आयोग धर्म या जाति के आधार पर भेदभाव नहीं कर सकता।

विरोध पक्ष का तर्क, “यह नागरिकता की जांच है, अधिकार नहीं”

विरोधी पक्ष के वकीलों — अभिषेक मनु सिंघवी, कपिल सिब्बल और वृंदा ग्रोवर — ने आयोग की मंशा पर गंभीर सवाल उठाए, सिंघवी ने कहा कि यह मतदाता सूची की प्रक्रिया नहीं, बल्कि नागरिकता साबित करने की कवायद है। कपिल सिब्बल ने तर्क दिया कि अगर कोई 1950 के बाद भारत में पैदा हुआ है, तो वह स्वत: नागरिक है। अधिकारी को यह साबित करने की जिम्मेदारी दी जानी चाहिए, न कि मतदाता को। वृंदा ग्रोवर ने इसे हाशिए पर पड़े तबकों के खिलाफ एक प्रक्रिया बताया और चेतावनी दी कि इससे लोगों को फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल भेजने का रास्ता खुल सकता है।

कई याचिकाएं दाखिल, एडीआर सबसे पहले पहुंचा सुप्रीम कोर्ट

इस मामले में कई याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गई हैं। सबसे पहले एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) ने चुनाव आयोग के 24 जून के आदेश को चुनौती दी। बाद में तृणमूल सांसद महुआ मोइत्रा, राजद सांसद मनोज झा और सामाजिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव भी कोर्ट पहुंचे।

एडीआर का तर्क: यह आदेश संविधान और कानून का उल्लंघन

एडीआर ने दावा किया कि चुनाव आयोग का निर्देश संविधान के अनुच्छेद 14, 19, 21, 325 और 326 का उल्लंघन करता है। यह जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 और मतदाता पंजीकरण नियम 1960 के नियम 21ए के प्रावधानों के भी खिलाफ है।

एडीआर ने यह भी कहा कि, दस्तावेज़ों की ज़िम्मेदारी सरकार से हटाकर आम जनता पर डाल दी गई है। आधार और राशन कार्ड जैसे सामान्य दस्तावेज भी मान्य नहीं हैं। इससे गरीब और वंचित वर्ग सबसे अधिक प्रभावित होंगे।

दस्तावेजों की जटिल मांग, करोड़ों प्रभावित हो सकते हैं

एसआईआर के निर्देशों के अनुसार, 2003 की मतदाता सूची में नहीं होने वाले लोगों को नागरिकता के दस्तावेज देने होंगे। दिसंबर 2004 के बाद जन्मे लोगों को माता-पिता के दस्तावेज भी दिखाने होंगे। अगर माता-पिता विदेशी हैं, तो पासपोर्ट और वीज़ा दिखाना अनिवार्य होगा। ADR का अनुमान है कि बिहार में 3 करोड़ से ज्यादा मतदाता इन दस्तावेज़ों को देने में असमर्थ हो सकते हैं और सूची से बाहर कर दिए जा सकते हैं।

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