नमस्कार, दैनिक जनवाणी डॉटकॉम वेबसाइट पर आपका हार्दिक स्वागत और अभिनंदन है। श्रावण मास की पंचमी तिथि को देशभर में श्रद्धा और आस्था के साथ नाग पंचमी पर्व मनाया जा रहा है। शास्त्रों के अनुसार, श्रावण शुक्ल पक्ष की पंचमी को नागों की उत्पत्ति हुई थी, इसलिए इस दिन नाग देवता की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन विधिपूर्वक नागों की पूजा करने से सर्प भय, सर्पदंश तथा कालसर्प दोष से मुक्ति मिलती है। वहीं कुछ क्षेत्रों में यह पर्व कृष्ण पक्ष की पंचमी तिथि को भी मनाया जाता है।
“अनन्तम्, वासुकि, शेषा, पद्मनाभम्, चक्कबलम्, कर्कोतकम, तक्षकम्।”
कालसर्प योग में जन्म लेने वाले जातक के जीवन का पूर्वार्द्ध अत्यंत कष्टों से भरा होता है, लेकिन उत्तरार्द्ध यानी 48 वर्ष की आयु के बाद उसे यश-कीर्ति मिलती है। ब्रह्मांड में 12 राशियां, नौ ग्रह और जन्म कुंडली के 12 भावों में ग्रह स्थिति आदि के कारण कालसर्प योग के प्रभावों को बांटा गया है। इस तरह कालसर्प योग 12 प्रकार के होते हैं। इनका निवारण कराने से सुख एवं समृद्धि की प्राप्ति होती है। किसी भी उपाय को कराने से पहले कालसर्प योग की स्थिति जरूर जान लें।
ऐसे करें पूजा
कालसर्प योग का प्रभाव होने पर नाग पंचमी के व्रत, रुद्राभिषेक, नाग पूजन का विधान है। भगवान शिव की उपासना करने से नाग देवता कालसर्प योग के शाप से मुक्त करते हैं। शिव मंदिर में रुद्राक्ष माला से “ॐ नमः शिवाय” का जाप करें। शिवलिंग पर तांबे का सर्प चढ़ाएं और लोहा या चांदी का सर्प जोड़ा बनवाकर पूजा करें। इस दिन सात अनाज, काले तिल, नीला वस्त्र, नारियल, घोड़ा अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान करें। पितरों का आह्वान करें। नाग को नमन करते हुए प्रार्थना करें कि पितरों को मोक्ष मिले। फिर नदी या समुद्र में पूजा की सामग्री और सर्प जोड़ा विसर्जित करें। यदि किसी स्त्री की कुंडली में कालसर्प दोष है तो वह नाग पंचमी के दिन वट वृक्ष की 108 प्रदक्षिणा करे, उसकी मनोकामना पूरी होगी। इस दिन नवनाग स्तोत्र का पाठ भी करना चाहिए।
श्री नवनाग स्तोत्र
अनन्तं वासुकिं शेषं पद्मनाभं च कम्बलं
शन्खपालं ध्रूतराष्ट्रं च तक्षकं कालियं तथा
एतानि नव नामानि नागानाम च महात्मनं
सायमकाले पठेन्नीत्यं प्रातक्काले विशेषतः
तस्य विषभयं नास्ति सर्वत्र विजयी भवेत
ll इति श्री नवनागस्त्रोत्रं सम्पूर्णं ll
नाग गायत्री मंत्र
ॐ नव कुलाय विध्महे विषदन्ताय धी माहि तन्नो सर्प प्रचोदयात ll

