Sunday, February 8, 2026
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चीन की ऊर्जा की चाहत या जल राजनीति?

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पिछले कुछ वर्षों से चीन द्वारा अपने ऊर्जा संसाधनों को विस्तार देने की दिशा में उठाए गए कदम वैश्विक दृष्टि से चर्चा में रहे हैं। हाल ही में ब्रह्मपुत्र नदी पर तिब्बत क्षेत्र के निंगची शहर में दुनिया के सबसे बड़े हाइड्रोपावर बांध के निर्माण का निर्णय इसी रणनीति का भाग है। चीन ने यह स्पष्ट किया है कि इस परियोजना से भारत और बांग्लादेश जैसे पड़ोसी देशों को कोई नुकसान नहीं होगा। लेकिन, वास्तविकता इससे अधिक जटिल और बहुपरिणामी है। यह परियोजना सिर्फ एक ऊर्जा योजना नहीं, बल्कि एक सामरिक, पारिस्थितिकीय और कूटनीतिक संकट का कारण भी बन सकती है।

ब्रह्मपुत्र नदी, जिसे तिब्बत में यारलुंग त्सांगपो के नाम से जाना जाता है, चीन से निकलकर भारत के अरुणाचल प्रदेश, असम और फिर बांग्लादेश से होते हुए बंगाल की खाड़ी में मिलती है। यह न सिर्फ भौगोलिक दृष्टि से बल्कि पारिस्थितिक, सांस्कृतिक और आर्थिक जीवन के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। चीन का प्रस्तावित बांध इसी नदी के ‘ग्रेट बेंड’ नामक क्षेत्र में बन रहा है, जहां नदी एक गहरे यू-टर्न के साथ भारत की सीमा की ओर बढ़ती है। यही कारण है कि इस परियोजना को भारत और बांग्लादेश दोनों देशों ने गंभीरता से लिया है।

इस बांध की अनुमानित लागत लगभग 167.8 अरब अमेरिकी डॉलर है, जिसे चीन तिब्बत में अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति तथा क्षेत्रीय प्रभुत्व को सुदृढ़ करने के लिए उपयोग करेगा। इसमें पाँच जलविद्युत स्टेशन होंगे जो लगभग 300 अरब किलोवाट घंटे बिजली सालाना उत्पन्न करेंगे। इसका एक हिस्सा स्थानीय खपत के लिए तिब्बत में रहेगा जबकि शेष बिजली चीन के अन्य औद्योगिक क्षेत्रों में भेजी जाएगी। यह चीन की उस दीर्घकालिक योजना का हिस्सा है, जिसमें वह स्वदेशी ऊर्जा स्रोतों पर अधिक निर्भर होकर कोयला आधारित उत्पादन को कम करना चाहता है।

किन्तु इस परियोजना के निहितार्थ इससे कहीं अधिक गहरे हैं। भारत के लिए यह बांध भू-राजनीतिक दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र में बन रहा है- अरुणाचल प्रदेश, जिस पर चीन स्वयं भी दावा करता रहा है। भारत ने पहले ही चीन को इस परियोजना के संबंध में पारदर्शिता बरतने और दोनों देशों के हितों का ध्यान रखने की सलाह दी है। भारत का यह भी कहना है कि ब्रह्मपुत्र जैसे अंतरराष्ट्रीय नदी तंत्र पर कोई भी निर्माण कार्य निचले देशों की सहमति और सहभागिता के बिना नहीं किया जाना चाहिए।

साथ ही, इस परियोजना से पारिस्थितिकीय असंतुलन की संभावना भी प्रबल हो गई है। पूर्वी हिमालय क्षेत्र जैव विविधता से भरपूर है, और ब्रह्मपुत्र इस पूरे क्षेत्र के जलवायु संतुलन को बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। नदी के प्रवाह में कोई भी बदलाव न केवल कृषि उत्पादकता पर प्रभाव डालेगा, बल्कि मछलियों, जलजीवों और स्थानीय समुदायों की जीवनशैली पर भी प्रतिकूल असर डालेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि चावल, जूट और अन्य जल-आधारित कृषि फसलों की उत्पादकता में गिरावट आ सकती है, जिससे खाद्य सुरक्षा पर संकट खड़ा होगा।
भारत और बांग्लादेश दोनों ही इस नदी पर अत्यधिक निर्भर हैं-भारत के असम, मेघालय, नागालैंड, सिक्किम और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में यह नदी सिंचाई, जलापूर्ति, नौपरिवहन और मछली पालन का प्रमुख आधार है। चीन द्वारा बिना समुचित पारदर्शिता के जल संसाधनों का नियंत्रण अपने हाथ में लेना एकतरफा रवैए का प्रतीक है। ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि चीन ने पूर्व में सतलुज नदी पर भारत के साथ जल डेटा साझा करने संबंधी समझौता समाप्त कर दिया था और ब्रह्मपुत्र पर 2023 में समाप्त हुए समझौते को भी अब तक नवीनीकृत नहीं किया गया है। इससे न केवल भरोसे की कमी उजागर होती है, बल्कि संकट के समय समयबद्ध सूचना साझा करने की बाध्यता भी प्रश्नांकित होती है।

जल को हथियार की तरह उपयोग करने की आशंका भी प्रकट की जा रही है। यदि चीन अचानक बांध से जल छोड़ता है, तो भारत के अरुणाचल प्रदेश और असम में विनाशकारी बाढ़ आ सकती है। इससे न केवल जान-माल की क्षति होगी बल्कि इससे निपटने के लिए भारत को सैन्य और नागरिक स्तर पर भारी संसाधनों की आवश्यकता होगी। युद्ध या तनाव की स्थिति में जल जैसी प्राकृतिक संपदा को रणनीतिक अस्त्र में बदलने का यह उदाहरण वैश्विक कानून और मानवता दोनों के विरुद्ध माना जा सकता है।

बांग्लादेश, जो ब्रह्मपुत्र के अंतिम चरण में स्थित है, को भी इस परियोजना से चिंताएं हैं। नदी की धाराओं पर किसी भी प्रकार का नियंत्रण वहां की कृषि और जल प्रबंधन व्यवस्था को सीधे प्रभावित करेगा। चीन ने हालांकि बांग्लादेश को आश्वस्त किया है कि यह बांध केवल बिजली उत्पादन के लिए है, और वह न तो अतिरिक्त जल निकालेगा और न ही प्रवाह को मोड़ेगा। लेकिन, बिना स्वतंत्र निरीक्षण या पारदर्शी डेटा साझेदारी के इन दावों पर विश्वास करना कठिन है।

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