कुछ लोग जन्म ही सुनाने के लिए लेते है, यह अलग बात है कि कोई उन्हें सुनना चाहे या नहीं! ये जब किसी पर सवाल उछालते हैं, इनके मन में यह पक्का विश्वास हुआ करता है कि सामने वाले को उनके सामने निरुत्तर ही होना है। लिहाजा ये उत्तर की प्रतीक्षा नहीं करते। लेकिन जब सामने वाले के संभावित उत्तर में उनका अगला सवाल सन्निहित होता है, वे अपने सवाल का स्वयं उत्तर देकर उसमें से नया सवाल उछाल दिया करते हैं। एक प्रकार से उनकी बातों का सिलसिला एकाकी मार्ग पर ही चला करता है। उनका ऐसा मानना होता है कि जब मैं बोल रहा हूं तो सामने से किसी और के बोलने की तो कतई कोई जरूरत ही नहीं है। बस उसे मेरी तरफ देखते रहना है।
खाली-पीली हर बात में अड़ंगा लगाने वाले उन्हें पसंद नहीं। संयोग देखिए, काफी कुछ मैं भी उनके जैसी ही मिट्टी का बना हुआ हूं। इसलिए न तो मैं उनसे भिड़ता हूं और न ही वे मुझसे भिड़ते है। क्योंकि स्वाभाविक रूप से वे एक दूसरे की ताकत का अंदाजा लगाना जानते हैं। वैसे मेरी उनसे गहरी-छना करती थी। छने भी क्यों नहीं, हम परस्पर बारी-बारी से एक दूसरे को बोलने और बोलते रहने का भरपूर अवसर दिया करते है। लेकिन तीसरे पक्ष के साथ वातार्लाप करते हुए वे मुझे छीलते है और मैं उन्हें छीलता हूं। दरअसल हमारे बीच अंडरस्टैंडिंग ही ऐसी है कि व्यक्तिगत तौर पर मैं उनकी लाज रखता हूं और वह मेरी लाज रखते हैं।
खैर, आगे हुआ यूं कि चतुर सुजान ने हमसे वार्तालाप का समय निकालकर काफी देर तक हमें सुना। अब चतुर सुजान तो चतुर सुजान ठहरे, ‘तथाकथित बातचीत’ के दौरान हमें गच्चा देकर मौका मिलते ही उन्होंने हमें सक्रिय राजनीति में भाग लेने का सुझाव दे डाला। पता नहीं उन्होंने कौन से मुहूर्त में यह बात कही थी, लेकिन हमने उनकी बात को दिल पर ले लिया। अब सवाल यह था कि एक ही म्यान में दो तलवार कैसे समाती? वैसे इसका तोड़ हमने निकाल लिया। मैं इघर के दल में आ गया वे उधर के दल में चले गए। दोनों ही मजे में मुर्गा लड़ाई के सूत्रधार बने हुए हैं। मीडिया इस मामले में हमारा मददगार सिद्ध हो रहा है।
आज वह मेरी बात प्रकाशित और प्रसारित करता है तो कल उनकी बात प्रकाशित या प्रसारित करता है। इस बीच हम दोनों मजे में हैं। सच कहूं तो जिंदगी का सच्चा आनंद आ रहा है। वैसे हम एक दूसरे पर निशाना नहीं साधते, लेकिन राजनीति में हैं, तो लोग दिखाऊं थोड़ी बहुत व्यक्तिगत नुक्ताचीनी भी कर लिया करते हैं। वह क्या है कि इससे जनता जनार्दन के बीच अच्छा संकेत जाता है। लेकिन हां, जब कभी हम एक दूसरे से रूबरू होते हैं, साधारण से साधारण बात को लेकर भी गगनचुंबी अट्टहास करना याने कि ठहाका लगाना न

