Wednesday, January 28, 2026
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जीवन, आशा और मौत मैनेजमेंट कंपनी

जमाना प्रगतिशील हो चला है। आदमी जिंदा रहे तो लोन में जीए और मर जाए तो पैकेज में जले। जी हां! अब मौत भी सुविधा बन चुकी है। जिन दिनों में पड़ोसी के घर मातम छा जाता था, गली-मोहल्ले के लोग दौड़े चले आते थे। कंधा देने, आंसू बहाने और परिजनों को दिलासा देने के लिए। अब किसी की संवेदना सिर्फ मोबाइल के ‘सॉरी फॉर योर लॉस’ वाले मैसेज तक सीमित है। अगर मरने वाले की शख्सियत जरा वीआईपी टाइप की रही हो तो इंस्टा पर ब्लैक एंड व्हाइट फोटो के साथ ‘आरआईपी लीजेंड’ लिख देना ही पर्याप्त है।

अब ‘इवेंट इंडस्ट्री’ दूर तक पहुंच चुकी है। मौत अब बड़ा इवेंट है। शादी-ब्याह, बर्थडे, बेबी शॉवर के बाद अब ‘फ्यूनरल प्लानिंग’ का जमाना है। बड़ी-बड़ी कंपनियाँ पैकेज लेकर आ गई हैं- बेसिक, प्रीमियम और प्लैटिनम! बेसिक पैकेज में मिलता है- चार कंधा देने वाले मजदूर (फुल यूनिफॉर्म में), एक ‘नियोजित’ रोने वाली और शमशान घाट तक मुफ्त ट्रांसपोर्ट! इसमें गारंटी है कि कंधा देने वाले चलते-चलते बीच-बीच में बोलेंगे- राम नाम सत्य है, ताकि मोहल्ले को लगे कि सचमुच दुख का माहौल है। प्रीमियम पैकेज थोड़ा और उन्नत है। इसमें रोने वाली महिलाएं डायलॉग ट्रेनिंग के साथ आती हैं। वो बीच-बीच में कहेंगी- ‘हाय राम! ये क्या हो गया! अभी तो पेंशन चालू हुई थी…!’ ताकि परिजन रोना भूल भी जाएं तो सुनकर फिर से आंसू टपकाएं। साथ ही, पंडाल, कुर्सियां और एसी टेंट भी लगाया जाता है, ताकि शोकसभा में आए मेहमान गर्मी से बेहाल न हों।

प्लैटिनम पैकेज शानदार है। इसमें आपको मिलेगा- स्पेशल एंकर, माइक सिस्टम, पंडित आॅन-डिमांड और ‘थ्री-डे प्रोफेशनल एग्जीक्यूटिव टीम!’ ये टीम दिन-रात अलग-अलग स्क्रिप्ट के हिसाब से रोती है। पहले दिन पति का गम, दूसरे दिन पिता का गम और तीसरे दिन ‘हाय हाय! हम तो अनाथ हो गए’ वाली फिलिंग। साथ ही, लाइव टेलीकास्ट का भी विकल्प है- यू-ट्यूब चैनल पर ‘लास्ट जर्नी’ का सीधा प्रसारण, ताकि दूर बैठे रिश्तेदार भी दिल थामकर रो सकें।

अब एडवांस बुकिंग का भी चलन है। आदमी बीमार है और डॉक्टर ने हाथ खड़े कर दिए तो परिवारजन उसे तुरंत ‘मौत पैकेज’ में रजिस्टर करवा देते हैं। कौन सा फोटो लगेगा, कौन-सा गाना बजेगा, श्मशान तक ले जाने के लिए कौन-सी गाड़ी होगी, सब तय! लोग इतने दूरदर्शी हैं कि वे अपनी मृत्यु-योजना खुद बनाते हैं- ‘भाई! मेरी लास्ट राइड सफेद इनोवा में होनी चाहिए! फूल मोगरे के हों और पीछे ‘कभी अलविदा न कहना’ गाना बजे।’ कंपनियां भी खूब समझदार हैं। वे ईएमआई पर मौत की सुविधा दे रही हैं। कई जगह कॉरपोरेट टाई-अप भी हो गया है। अब दफ्तरों में मेडिकल इंश्योरेंस के साथ-साथ फ्यूनरल इंश्योरेंस भी आॅफर होता है। अखबारों में शोक-संदेश भी अब ग्लॉसी पेपर पर छपते हैं। फोटोशॉप से एडिटेड फोटो, नीचे लिखा- ‘अलविदा पापा! आप हमेशा हमारे दिलों में रहेंगे। स्पॉन्सर्ड बाय एबीसी फ्यूनरल सर्विसेज!’

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