
भारत में हर साल 7.81 करोड़ टन भोजन की बर्बादी होती है, जो अमेरिका के मुकाबले तीन गुना है। देश में प्रति व्यक्ति भोजन की औसत बर्बादी करीब 55 किलोग्राम सालाना है। खासकर शहरी क्षेत्रों में भोजन कीबर्बादी की मात्रा तेजी से बढ़ रही है, जहां लोग बचा हुआ खाना सीधे कूड़े में फेंक देते हैं। जरूरत से ज्यादा भोजन पकाना, खराब व्यंजन, शादी-ब्याह तथा पार्टियां और रेस्टोरेंट्स में जरूरत से ज्यादा आॅर्डर करने जैसी चीजें भोजन कीबर्बादी का कारण हैं। यह हैरान करने वाली बात है कि जो भारत 2024 के वर्ल्ड हंगर इंडेक्स में 127 देशों की सूची में 105 वें स्थान पर है, वह भोजन बर्बाद करने वाले देशों की सूची में चीन के बाद दूसरे स्थान पर बना हुआ है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) की 2024 की रिपोर्ट के मुताबिक, 2022 में दुनिया में लगभग 1.05 अरब टन खाद्य पदार्थ बर्बाद हुआ, जबकि इस दौरान करीब 78 करोड़ लोग भुखमरी से जूझ रहे थे।
यूएनईपी खाद्य अपशिष्ट सूचकांक रिपोर्ट 2024 के अनुसार दुनिया भर में मानव उपभोग के लिए उत्पादित भोजन का पांचवां हिस्सा नष्ट या बर्बाद हो जाता है। यह प्रतिदिन एक अरब भोजन के बराबर है। वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए खाद्य हानि औरबर्बादी की कुल लागत लगभग 1 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर आंकी गई है। खाद्य पदार्थों की हानि और बर्बादी से वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में 10 प्रतिशत तक की वृद्धि होती है-जो विमानन क्षेत्र की तुलना में कुल उत्सर्जन का लगभग पांच गुना है। साठ प्रतिशत खाद्यान्न कीबर्बादी घरेलू स्तर पर होती है। गर्म देशों में खाद्यान्न कीबर्बादी अधिक होती है, घरेलू स्तर पर और कटाई के बाद के चरण में, क्योंकि उच्च तापमान के कारण खाद्यान्न का भंडारण, प्रसंस्करण और परिवहन प्रभावित होता है।
देश में खाद्य उत्पाद का 40 फीसदी बर्बाद हो जाता है, जिसकी कीमत 92,000 करोड़ है। हालांकि रिपोर्ट बताती है कि भोजन की सबसे अधिकबर्बादी घरों में होती है। दुनिया का हर व्यक्ति साल में औसतन 132 किलोग्राम खाना फेंक देता है, जिनमें से 79 किलोग्राम घर से फेंका जाता है। भारत जैसे देश में भोजन की इतने बड़े पैमाने पर बर्बादी अपराध से कम नहीं है, जहां 2023 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 74 प्रतिशत आबादी स्वस्थ आहार का खर्च नहीं उठा सकती और 39 फीसदी को पोषक तत्वों से भरपूर आहार नहीं मिल पाता। भोजन कीबर्बादी का अर्थ सिर्फ प्लेट में बचे खाने कीबर्बादी नहीं है, यह हमारे समाज की असमानता और संवेदनहीनता की भी तस्वीर है।
2030 तक वैश्विक खाद्य अपव्यय को आधा करना संयुक्त राष्ट्र की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में से एक है। वास्तव में, यह संगठन के 17 सतत विकास लक्ष्यों में से एक है। कल्पना कीजिए कि अगर सारा खाना बर्बाद न होता, तो एक किसान क्या कर सकता था— और अब कल्पना कीजिए कि अगर लाखों खाद्य-असुरक्षित किसानों के साथ ऐसा हो, तो इसका क्या मतलब होगा। कटी हुई फसलों को संभालने और भंडारण करने के कौशल की कमी छोटे किसानों के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। विश्व खाद्य कार्यक्रम किसानों को कटाई के बाद की बेहतर प्रबंधन विधियों और सब्सिडी वाले जल- और वायु रोधी भंडारण उपकरणों के प्रशिक्षण के माध्यम से इस समस्या का समाधान करने में मदद करता है। ब्ल्यूएफपी स्थानीय बाजारों तक पहुंच बढ़ाकर खाद्य अपव्यय की समस्या से भी निपट रहा है। इसमें स्कूलों के भोजन के लिए स्थानीय रूप से उगाई गई फसलों का उपयोग करना और समुदायों के साथ मिलकर सड़कें और पुल, साथ ही भंडारण सुविधाएं बनाना या उनका पुनर्निर्माण करना शामिल है। लेकिन हममें से प्रत्येक व्यक्ति व्यक्तिगत रूप से खाद्य हानि और खाद्य अपव्यय को कम करने में भूमिका निभा सकता है, न केवल भोजन के लिए, बल्कि उसमें प्रयुक्त होने वाले संसाधनों के लिए भी।
हमारे यहां कोई ऐसा कानून नहीं है जो भोजन की बर्बादी रोकने के काम आ सके। एक तरफ विवाह-शादियों, पर्व-त्यौहारों एवं पारिवारिक आयोजनों में भोजन की बर्बादी बढ़ती जा रही है, तो दूसरी ओर भूखे लोगों के द्वारा भोजन की लूटपाट देखने को मिल रही है। दरअसल, भोजन की बर्बादी संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है। यह चिंता का विषय है कि आज भी कई लोग रोजाना सुरक्षित और पोषणयुक्त भोजन से वंचित हैं। भोजन की बर्बादी को कम करने के कई तरीके हैं—जैसे जरूरत के अनुसार ही सामान खरीदना, किराना दुकान जाने से पहले भोजन की योजना बनाना, बचे हुए भोजन से नए और रचनात्मक व्यंजन बनाना, भोजन को अच्छे से बंद डिब्बों में सुरक्षित रखना आदि। भोजन की बर्बादी को कम करने के साथ-साथ हमें इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि जब भी हम खाने को फेंकते हैं, उस समय दुनिया के किसी कोने में कोई व्यक्ति अपने दैनिक पोषण की जरूरतों को पूरा करने के लिए संघर्ष कर रहा होता है।

