Wednesday, January 28, 2026
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नब्बे पार हूं, सौ के इंतजार में हूं

आपकी दुआओं से मैं ‘अबकी बार नब्बे पार’ हो गया हूं। भाइयो और बहनो यह कोई चुनावी नारा नहीं बल्कि हकीकत है। जब से नब्बे पारक्या हुआ, लोग शोर मचाने लगे हैं कि मैं कमजोर हो गया हूं। नब्बे तक आते-आते तो अच्छा भला आदमी भी कमजोर हो जाता,फिर भला कागज का रुपया क्या चीज है। ऊपर से कड़क दिखने और नए रंग-बिरंगे वस्त्र पहन लेने से कोई उम्रदराज जवान नहीं हो जाता। आप मेरे नए-नए रूपों को देखकर कहीं गफलत में न पड़ जाएं। जब मैं सत्तर का था,तब भी सोचता था कि अभी तो सत्तर का ही हुआ हूं। फिर अस्सी का हुआ, तब भी यही सोचता रहा। देखते ही देखते नब्बे का हो गया। दरअसल नब्बे महज एक संख्या है, वास्तव में मेरी ताकत पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गई है। अब मैं परिपक्व और तजुर्बेकार हूं।

अभी कुछ दिनों पहले ही मैंने बिहारचुनाव में अपनी ताकत दिखाई थी, आगे भी जब-जब मौका मिलेगा, जरूर दिखाऊंगा। महज राजनीति में ही नहीं, चारों ओर लोग मेरी ताकत का लोहा मानते हैं। जो कहते हैं कि रुपया कमजोर हुआ है, दरअसल मैं उनकी कमजोरी हूं। आखिर प्रजातंत्र के चारों स्तंभ भी तो मुझ पर ही टिके हैं। वैसे मेरा यहां तक पहुंचना इतना भी आसान नहीं है। कई दुर्गम रास्तों से गुजरना पड़ता है मुझे। धन्ना सेठों, साहूकारों, ठेकेदारों, नेताओं की तिजोरियों, तहखानों, लॉकरों में कई-कई साल गुजारने पड़ते हैं मुझे। कई बार बिस्तरों के गद्दों में डाल दिया जाता हूं, कभी गुसलखानों की दीवारों के पीछे कैद कर दिया जाता हूं। लोभियों ने मेरा बुरा हाल किया है। अब वे ही यह कहते नहीं थकते कि मैं कमजोर हो गया हूं। महफिलों, बारातों में उड़ा उड़ाकर अक्सर मुझे जलील किया जाता है। हालांकि मजबूरी के मारे लोग मेरी बहुत कद्र करते हैं और मुझे हाथों हाथ थाम लेते हैं।

मुझ में इतनी ताकत है कि जिसका चाहूं उसका ईमान खरीद सकता हूं। मैं इंसान का जमीर खरीद सकता हूं। अदालत में गवाह और ईमान खरीद सकता हूं। मैं गरज की चिरौरी हूं, गरीब की मजबूरी हूं। बेरोजगारों की ख्वाहिश हूं। अमीरों की नुमाइश हूं। भूख का इलाज हूं। बीमारी का नुस्खा हूं। सट्टे का ईंधन हूं। काम निकालने का जरिया हूं। रिश्वत का औजार हूं। फिर भी तोहमत का अख़्तियार हूं। लाटरी का इनाम हूं। हाउजी, बीसी और चौपड़ का पासा हूं।

उत्सवों, चुनावों का चंदा हूं। बाजार में पहुंच जाऊं तो धंधा हूं। राजनीति में घुस जाऊं तो गौरख धंधा हूं। ईडी की रेड हूं। गरीब के लिए दूर की कौड़ी हूं। चोरों के हाथ की सफाई और अमीरों की काली कमाई हूं। श्रद्धा का चढ़ावा हूं। बेईमानी की घूस हूं। मीडिया का विज्ञापन हूं। मजदूर की मजदूरी और गरीब का वेतन हूं। भ्रष्टाचारियों का हफ़्ता हूं। दलाल की दलाली हूं। कॉरपोरेट का वरदहस्त हूं। मैं मेड इन इंडिया हूं। मैं ईवीएम का बटन हूं और नेताओं का टशन हूं। कई गिरते हैं, तब कहीं जाकर मैं अकेला गिरता हूं। मैं गिरावट के अंतिम पायदान पर खड़ा हूं फिर भी ऐंठा हूं। पवेलियन में खड़े शतकवीर मेरी हौसला-अफजाई कर रहे हैं। नारे गूंज रहे हैं-अगली बार सौ के पार।

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