Wednesday, January 28, 2026
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विक्टिम कार्ड के झंडाबरदार

जब से दिनचर्या में मोबाइल की हिस्सेदारी बढ़ी है, तब से रिचार्ज की वैधता निर्धारित रहती है।सो निर्धारित अवधि के उपरांत वैधता बढ़ाने के लिए रिचार्ज कराना अनिवार्य है।यही बात यदि विक्टिम कार्ड पर लागू की जाए तो निष्कर्ष निकलता है कि विक्टिम कार्ड की वैधता निर्धारित नही होती। वह कई बार रिचार्ज होने से पहले ही अपनी वैधता खो देता है। यदि जीवन में केवल समस्याओं के निस्तारण के लिए किए जाने वाले कार्यों का अध्ययन किया जाए, तो संसार का हर प्राणी विक्टिम है। कोई विक्टिम कार्ड खेलकर सहानुभूति प्राप्त कर लेता है, कोई विक्टिम की शिकायत को झूठा सिद्ध करके विक्टिम को ही कठघरे के खड़ा कर देता है। समाज में आजकल बेरोजगारी अधिक है। कमाई का समुचित जुगाड़ नही है। ऐसे में काम की तलाश में लोग भटक रहे हैं।

जंतर मंतर पर विक्टिम कार्ड लिए अपने लक्ष्य पूरा करने वालों के इर्द गिर्द कुछ लोग स्थाई रूप से टहलते रहते हैं। कुछ अपनी किसी गैर सरकारी संगठन का लेटर पैड लिए घूमते हैं, कुछ अपने चाय पानी के जुगाड़ में घूमते रहते हैं। सब जानते हैं कि मुफ़्त में कोई काम नही किया जाता। धरती में मुर्दे को दफनाने के लिए कब्र खोदने वाले भी मुफ़्त में कब्र नही खोदते। अलबत्ता सियासत में कब्र खोदने का चलन कुछ अधिक बढ़ गया है। मुद्दा चाहे कोई भी हो, विभिन्न सियासी दलों के झंडाबरदार किसी की भी कब्र खोदने की कामना करने लगते हैं। उन्हें इस सत्य से कोई सरोकार नही होता, कि किसी की मृत्यु के उपरांत उसकी पार्थिव देह का अंतिम संस्कार या तो कब्र खोदकर उसमें पार्थिव देह को समर्पित करके किया जाता है या पंचतत्व में विलीन करके।

जब तक जेब गर्म न हो, जंतर मंतर पर घूमने वाले किराए के बंदे कोई रिस्क नही लेते। रिस्क लेने वाले अपने धंधे के प्रति ईमानदारी अपनाते हैं, वे बखूबी समझते हैं, कि जो उनकी फंडिंग कर रहा है, उसके प्रति वफादार रहना उसकी जिम्मेदारी है। वैसे भी भौतिक युग है। बिन पैसे सब सूना है। किराए के आंदोलन जीवियों की जिम्मेदारी बढ़ गई है। जब जब किसी क्षेत्र में चुनाव की संभावना बनती है, तब तब आंदोलन जीवियों के रोजगार के प्रमोशन के लिए भगीरथ प्रयास किए जाते हैं। आंदोलन जीवियों की सेवाएँ लेने वाले भी वही लोग होते हैं, जिनकी विश्वसनीयता बाजार में समाप्त हो चुकी होती है। ऐसा नही है कि आंदोलन जीवियों का प्रयोग पहली बार किया जा रहा हो। बिना किसी नार्को टैस्ट के आंदोलन जीवी स्वयं को दूध से धुला सिद्ध करने का प्रयास करती हैं।

आरोप लगाकर अपने प्रति अपनी जाति और भ्रमित तत्वों की सहानुभूति प्राप्त करते हैं। कहीं कैंडल मार्च निकालते हैं, कहीं धरना प्रदर्शन करते हैं, कहीं किसी सियासी तत्व के हाथों की कठपुतली बनकर ड्रामा करते हैं, बदले में सियासत के खेल में शामिल होते हैं। कुछ आंदोलन जीवी कठपुतलियाँ अपने पुराने झूठे किस्सों को कब्र में दबाए रखने के लिए वर्तमान तक संघर्ष करती हैं। उन्हें अपने राज के खुलने का डर लगा रहता है, कि यदि राज खुल गया, तो खाया पचाया सभी कुछ वापस करना पड़ सकता है।

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