डॉ विजय गर्ग
आस्ट्रेलिया सरकार ने बच्चों द्वारा इंटरनेट मीडिया का उपयोग करने पर प्रतिबंध लगा दिया है। बच्चों के लिए इंटरनेट मीडिया पर प्रतिबंध लगाने का यह विश्व में अपनी तरह का पहला कदम है। इसका उद्देश्य 16 साल से कम आयु के बच्चों को लत लगाने वाले एल्गोरिदम, आनलाइन फ्राड और साइबरबुलिंग आदि से बचाना है। कोई भी देश अब तक इतने बड़े पैमाने पर ऐसा कानून नहीं ला सका है। ऐसे में दूसरे देशों के कानून बनाने वाले लोग भी आस्ट्रेलिया के इस कदम पर बारीकी से नजर रख रहे हैं।
शिक्षा से जुड़े विशेषज्ञों का एक मत यह भी है कि इंटरनेट मीडिया के प्रतिबंधित किए जाने से बच्चों को पढ़ाई-लिखाई के प्रति एकाग्र किया जा सकता है। वस्तुत: स्मार्टफोन और लैपटाप, टैबलेट आदि उत्पाद की सुलभता और इंटरनेट की आसान पहुंच के कारण भारत में बड़ी संख्या में बच्चे पढ़ाई के प्रति एकाग्रचित्त नहीं हो पा रहे हैं।
सकारात्मक प्रभाव
डिजिटल युग ने बच्चों के लिए ज्ञान के द्वार खोल दिए हैं। पहले जहां जानकारी सीमित पुस्तकों व शिक्षकों तक सीमित थी, वहीं इंटरनेट के माध्यम से विश्व का समस्त ज्ञान एक क्लिक पर उपलब्ध है। बच्चे विभिन्न विषयों पर वीडियो देखकर एनिमेशन के माध्यम से कठिन अवधारणाओं की आसानी से समझ सकते हैं। कई विषयों में डिजिटल टूल्स सहायक सिद्ध हुए हैं। चूंकि आज के बच्चे कल के डिजिटल नागरिक हैं, ऐसे में उनके लिए तकनीकी ज्ञान अनिवार्य है। डिजिटल माध्यमों से बच्चों में आत्मनिर्भरता, समस्या समाधान क्षमता और रचनात्मक सेच का विकास भी होता है।
नकारात्मक प्रभाव
जहां डिजिटल युग ने अनेक सुविधाएं दी हैं, वहीं इसके दुष्प्रभाव भी गंभीर हैं। सबसे बड़ी समस्या है ध्यान भटकना स्मार्टफोन, इंटरनेट मीडिया, आनलाइन गेम्स और मनोरंजन एस बच्चों का ध्यान पढ़ाई से दूर कर देते हैं। आनलाइन पढ़ाई के दौरान भी बच्चे अन्य एप्स में उलझ जाते हैं, जिससे सूखने की गुणवत्ता प्रभावित होती है। अत्यधिक स्क्रीन टाइम बच्चें के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। आंखों में जलन, सिरदर्द, नींद की कमी और मोटापा जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं। मानसिक रूप से बच्चे चिड़चिड़े, तनावग्रस्त और अकेलेपन का शिकार हो सकते हैं। वास्तविक समाजिक संपर्क की कमी से उनके सामाजिक कौशल भी कमजोर हो सकते हैं। डिजिटल युग में एक और गंभीर समस्या है सोचने एवं विश्लेषण करने की क्षमता में कमी। इंटरनेट पर हर प्रश्न का उत्तर उपलब्ध होने से बच्चे स्वयं सेचने के बजाय सीधे समाधान खोज लेते हैं। इससे रचनात्मकता और तार्किक क्षमता का विकास बाधित होता है।
माता-पिता की भूमिका
डिजिटल युग में बच्चों की पढ़ाई को सही दिशा देने मैं माता-पिता और शिक्षकों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। अभिभावकों का बच्चों के साथ संवाद बनाए रखना, उनकी समस्याओं को समझना और उन्हें आफलाइन गतिविधियों के लिए प्रेरित करना आवश्यक है। शिक्षकों को भी डिजिटल शिक्षा का संतुलित उपयोग करना चाहिए। तकनीक को शिक्षा का साधन बनाया जाए, न कि उद्देश्य बच्चों को डिजिटल साक्षरता के साथ- साथ नैतिक शिक्षा देना भी समय की आवश्यकता है।
कायम रहे संतुलन
डिजिटल युग को न पूरी तरह अपनाना समाधान है और न ही पूरी तरह नकारना आवश्यकता संतुलन की है। बच्चों को यह सिखाया जाना चाहिए कि तकनीक का उपयोग कैसे किया जाए, न कि तकनीक उनका उपयोग करे। डिजिटल और पारंपरिक शिक्षा के संयोजन से ही बच्चों का सर्वांगीण विकास संभव है। खेल, कला, योग, पुस्तक पढ़ने की आदत और पारिवारिक संवाद बच्चों के जीवन में आवश्यक हैं। यह भी सही है कि यदि डिजिटल तकनीक का उपयोग विवेकपूर्ण नियंत्रित और उद्देश्यपूर्ण ढंग से किया जाए तो यह बच्चों के उज्वल भविष्य की नींव बन सकती है अन्यथा, इसका दुरुपयोग शिक्षा और बाल विकास के लिए एक गंभीर खतरा बन सकता है। इस खतरे से बचने की जरूरत है।

