Wednesday, January 28, 2026
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जहर तो दिल्ली के पानी में भी है

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दूषित कहें या फिर जहरीले पानी की आपूर्ति का मसला अकेले इंदौर, गांधीनगर तक ही सीमित नहीं रहा है, इस समस्या से कमोबेश समूचा देश जूझ रहा है। जहां तक देश की राजधानी दिल्ली का सवाल है, वह भी दूषित पेयजल की समस्या से अछूती नहीं है। यहां के निवासियों को भी साफ और शुद्ध पीने का पानी उपलब्ध नहीं है। सच कहा जाये तो यहां की तकरीब 30 फीसदी आबादी धीमा जहर पीने को मजबूर है और स्वच्छ पानी उसके लिए अब सपना बन गया है। गौरतलब है कि स्वच्छ पेयजल में टीडीएस की आदर्श मात्रा 300 से 350 पीपीएम के बीच है, जिसमें 100 से 150 पीपीएम सबसे अच्छा मानक माना जाता है। जबकि 500 से अधिक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक और जब टीडीएस 2000 पीपीएम से ऊपर पहुंच जाए तो पानी पीने योग्य नहीं रहता। लेकिन अब दिल्ली में टीडीएस की मात्रा 900 के पार है। पिछले दिनों भलस्वा डेरी इलाके के एक घर में पानी में टीडीएस की मात्रा 968 पायी गयी। जाहिर है ऐसी स्थिति में दूषित जल दिल्ली वालों को बीमार बना रहा है।

हकीकत यह है कि दिल्ली का पानी 24 फीसदी लोगों की मौत की वजह बन रहा है। दूषित पानी में मौजूद वैक्टीरिया, वायरस और परजीवी बच्चों, बुजुर्गों और गर्भवती महिलाओं के लिए सर्वाधिक खतरनाक साबित हो रहे हैं। पानी में केवल जीवाणु ही नहीं, फ्लोराइड, नाइट्रेट, आर्सेनिक आदि खतरनाक रसायन गंभीर खतरा पैदा कर रहे हैं। अपोलो, यथार्थ और गंगाराम अस्पताल के इंटरनल मेडिसिन के डाक्टरों का कहना है कि दूषित पानी से बार-बार हो रहे दस्त, पेटदर्द, बच्चों में कुपोषण और उनके शारीरिक विकास में सबसे बड़ी बाधा है। दूषित पानी से लिवर, किडनी और हड्डियों को काफी नुकसान होता है। कई मरीज तो तब अस्पताल पहुंचते है जब बीमारी काफी बढ़ चुकी होती है।

असलियत में यहां के लोग हर साल दूषित पेय जल की समस्या से दो-चार होते हैं। आज भी यहां जनकपुरी, भलस्वा, चंद्र नगर, अशोक नगर, नारंग कालोनी आदि अनेक इलाकों के लोग दूषित पेयजल मिलने से परेशान हैं। जनकपुरी ए ब्लाक का गंदे पानी की आपूर्ति का मामला अभी भी एनजीटी में विचाराधीन है। एनजीटी की सख्ती के बाद अब कहीं जाकर दिल्ली जल बोर्ड ने सुध ली है और इस इलाके की दशकों पुरानी और क्षतिग्रस्त पाइप लाइन बदलने का काम शुरू किया है। दिल्ली जल बोर्ड का पानी अक्सर दूषित आता है, इसमें दो राय नहीं है। फिर घरों में पहुंचने वाले पानी की सही ढंग से जांच भी नहीं होती है, इसी वजह से जलजनित बीमारियों का हरसमय खतरा बना रहता है। पूर्वी दिल्ली के शकरपुर, लक्ष्मी नगर, मंडावली, और पुरानी दिल्ली के सीताराम बाजार इलाके में अक्सर बदबूदार पानी की सप्लाई होती है। पिछले दिनों शकरपुर ए ब्लाक में सीवर युक्त बदबूदार पानी आया जिससे इलाके में पानी की टंकियों में बदबू आ गयी। लोगों का कहना है कि जल बोर्ड के पानी का इस्तेमाल तो वे केवल नहाने या कपड़े धोने में ही करते हैं। खाना बनाने या पीने के लिए नहीं। यही वह एकमात्र कारण है जिसके चलते दिल्ली के लोग मजबूरी में आरओ का पानी, या फिर कैंपर से पानी मंगवाकर या बोतलबंद पानी के जरिये खाना बनाने और अपनी प्यास बुझाने के लिए कर रहे हैं।

सबसे चिंतनीय बात यह है कि राजधानी का भूजल भी प्रदूषित हो गया है। इसमें कूड़े के पहाड़ की अहम भूमिका है। ओखला, भलस्वा, गाजीपुर और बवाना में लैंडफिल साइट के आसपास का भूजल दूषित होने का नतीजा दिल्ली की लगभग 30 फीसदी आबादी भुगत रही है जो साफ पानी से महरूम है। गत दिनों दिल्ली विधान सभा में भी विधायकों ने गंदे पानी की और असमान वितरण की समस्या पर गंभीर चिंता व्यक्त की। कुछ विधायकों ने अपने इलाकों में सालों से दूषित पानी की आपूर्ति का मामला उठाया। दिल्ली सरकार के जल मंत्री प्रवेश वर्मा ने भी माना है कि दिल्ली में 2800 किलोमीटर लम्बी और तीन दशक से भी पुरानी जर्जर पाइप लाइन से पेयजल दूषित हो रहा है।

गौरतलब है कि 2024 में कुल मिलाकर 90,833 मौतें हुई, जिसमें तकरीबन 24 फीसदी यानी 21,427 मौतें सीधे-सीधे संक्रामक और परजीवी रोग के कारण हुई। 2023 में यह आंकड़ा 28.66 फीसदी और 2022 में 26.39 फीसदी रहा है। जाहिर है यह खतरनाक स्थिति है। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले समय में स्थिति और भी भयावह हो जाएगी। यह हालत तब है जबकि दिल्ली में दूषित पानी की आपूर्ति के मामले में दिल्ली हाईकोर्ट और एनजीटी कई बार अपनी नाराजगी जता चुके हैं और आनंद विहार, योजना विहार, जनकपुरी में दूषित पानी का मामला अदालत तक जा पहुंचा है।

सरकार दावा करते नहीं थकती कि दिल्ली में 93 फीसदी घरों में नलों से पेयजल की आपूर्ति की जाती है। लेकिन हकीकत में यह सच नहीं है। जबकि संगम विहार, देवली सहित बहुतेरी अनधिकृत कालोनियों व झुग्गी बस्तियों में पानी का कनेक्शन ही नहीं है। बाहरी दिल्ली के किराडी, नरेला, नरेला की संजय कालोनी,भलस्वा डेरी आदि बहुतेरी जगहों पर तो नियमित पानी की आपूर्ति होती ही नहीं है और यदि आता भी है तो वह इतना गंदा कि उससे हाथ भी धोये नहीं जा सकते, पीने का तो सवाल ही कहां उठता है। नांगलोई, सुल्तानपुरी और किराडी में तो नलों से काले-पीले रंग के दूषित पानी आने की आम शिकायत है। सरकार घरों से समय-समय पर पानी के नमूने जांच के लिए लेने का दावा करती है। उसकी मानें तो हर साल तकरीबन 80 हजार से ज्यादा पानी के नमूने लिए जाते हैं लेकिन समझ नहीं आता कि उन नमूनों की जांच रिपोर्ट पर कार्रवाई कब होती है। देखा जाये तो बीती 22 दिसम्बर से 26 दिसम्बर के बीच लिये 7129 पानी के नमूनों में 100 से ज्यादा फेल पाए गए हैं।

सरकार का दावा कि राजधानी में पानी व सीवर की व्यवस्था सुधारने हेतु 68 विधान सभा क्षेत्र में 734 करोड़ की राशि दी गई है। फिर भी हालात जस के तस हैं, बल्कि पहले से बदतर हैं। अब सवाल यह उठता है कि आखिर 734 करोड़ का क्या हुआ और अब कहा जा रहा है कि दिल्ली का जलापूर्ति का बदहाल नेटवर्क सुधारने हेतु 30 हजार करोड़ रुपए की जरूरत है। जानकारी है कि केंद्र सरकार ने राजधानी के हर घर में पेयजल व सीवर लाइन नेटवर्क उपलब्ध कराने के लिए व जलस्रोतों की दशा सुधारने हेतु अमृत 2 योजना के तहत 2800 करोड़ आवंटित किये हैं और 800 करोड़ की लागत से अनधिकृत कालोनियों में सीवर नेटवर्क मजबूत किया जायेगा। देखना यह है कि पेयजल व सीवर नेटवर्क सुधारने हेतु दी गयी यह राशि भी सरकारी भ्रष्टाचार की भेंट न चढ़ जाये और दिल्ली की जनता पहले की तरह इस बार भी ठगी की ठगी न रह जाए।

कहते हैं, दिल्ली वालों दिल वालों की है। इन्हें पीने का साफ पानी कब मिलेगा, इसकी कोई गारंटी नहीं है। लगता है देश की राजधानी दिल्ली का कोई पुरसाहाल है ही नहीं। अब तो वह किसी भगीरथ रूपी ताड़नहहार की बाट जोह रही है जो आये और उसे दूषित जल से मुक्ति दिलाए।

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