जनवाणी ब्यूरो |
नई दिल्ली: भारत और अमेरिका के बीच लगभग 500 अरब डॉलर (करीब 45,29,069.80 करोड़ रुपये) के महत्वाकांक्षी व्यापार समझौते को लेकर एक अंतरिम ढांचे (Interim Framework) पर सहमति बन गई है। इसे दोनों देशों के आर्थिक रिश्तों में एक अहम मोड़ माना जा रहा है। इस पहल का उद्देश्य न केवल द्विपक्षीय व्यापार को नई ऊंचाइयों तक ले जाना है, बल्कि वैश्विक आपूर्ति शृंखला को मजबूत करते हुए भविष्य के एक व्यापक व्यापार समझौते की नींव रखना भी है।
सूत्रों के मुताबिक, इस पहल की रूपरेखा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच हुई उच्चस्तरीय बातचीत के बाद सामने आई है। यह सहमति ऐसे समय में आई है जब वैश्विक व्यापार अस्थिरता, भू-राजनीतिक तनाव और सप्लाई चेन में बाधाओं का सामना कर रहा है।
भारतीय निर्यातकों के लिए अमेरिकी बाजार में बड़ा अवसर
इस अंतरिम ढांचे का सबसे बड़ा लाभ भारतीय निर्यातकों को मिलने की उम्मीद है। खास तौर पर आईटी सेवाएं, फार्मास्यूटिकल्स, टेक्सटाइल, ऑटो कंपोनेंट्स, इलेक्ट्रॉनिक्स, कृषि उत्पाद और स्टार्ट-अप इकोसिस्टम से जुड़े क्षेत्रों को अमेरिकी बाजार में बेहतर पहुंच मिल सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि टैरिफ में रियायतें, तकनीकी मानकों में सहूलियत और नियामकीय प्रक्रियाओं को सरल किया जाता है, तो भारतीय कंपनियां अमेरिका जैसे बड़े और प्रतिस्पर्धी बाजार में अपनी मौजूदगी को तेजी से बढ़ा सकती हैं।
आपूर्ति शृंखला को मजबूत करने पर जोर
समझौते के अंतरिम ढांचे में सप्लाई चेन रेज़िलिएंस को प्रमुख प्राथमिकता के रूप में रखा गया है। इसका उद्देश्य चीन पर निर्भरता को कम करना, वैकल्पिक उत्पादन केंद्र विकसित करना और रणनीतिक क्षेत्रों—जैसे सेमीकंडक्टर, रक्षा उपकरण, ऊर्जा और क्रिटिकल मिनरल्स—में सहयोग बढ़ाना है।
दोनों देश यह भी चाहते हैं कि भविष्य में किसी वैश्विक संकट की स्थिति में आपूर्ति शृंखला बाधित न हो और व्यापार निर्बाध रूप से चलता रहे।
व्यापक द्विपक्षीय व्यापार समझौते की नींव
अंतरिम ढांचे को एक फुल-फ्लेज्ड द्विपक्षीय व्यापार समझौते (Bilateral Trade Agreement – BTA) की दिशा में पहला कदम माना जा रहा है। आने वाले महीनों में कृषि, डिजिटल व्यापार, डेटा सुरक्षा, बौद्धिक संपदा अधिकार और निवेश सुरक्षा जैसे संवेदनशील मुद्दों पर विस्तृत बातचीत होने की संभावना है।
नीति-विशेषज्ञों का कहना है कि 500 अरब डॉलर का व्यापार लक्ष्य हासिल करना आसान नहीं होगा, लेकिन यदि राजनीतिक इच्छाशक्ति बनी रहती है और उद्योगों की चिंताओं को संतुलित तरीके से संबोधित किया जाता है, तो यह लक्ष्य मध्यम अवधि में संभव है।
रणनीतिक साझेदारी को मिलेगा नया आयाम
यह व्यापार पहल केवल आर्थिक नहीं, बल्कि रणनीतिक साझेदारी के लिहाज से भी अहम मानी जा रही है। भारत और अमेरिका पहले ही रक्षा, तकनीक और इंडो-पैसिफिक रणनीति में करीबी साझेदार हैं। अब व्यापार और निवेश के क्षेत्र में गहराता सहयोग इस रिश्ते को और मजबूत कर सकता है।

