Sunday, February 15, 2026
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पारंपरिक रूप से मनाया जाएगा बसंत पंचमी पर्व

  • बसंत पंचमी पर्व पर इस बार है सुखद संयोग

जनवाणी संवाददाता |

सहारनपुर: माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को यानि कि मंगलवार 16 फरवरी को बसंत पंचमी का पर्व धूमघधाम से मनाया जाएगा। पर्व को लेकरप हिंदू समाज में उत्साह है। हिन्दू मान्यता के अनुसार विद्या की देवी मां सरस्वती की उत्पत्ति भी इसी दिन हुई थी।

यह दिन विद्यार्थियों, कला, संगीत, साहित्य एवं पठन पाठन आदि क्षेत्रों के लोगों के लिए काफी महत्वपूर्ण माना जाता है। बसंत पंचमी के दिन मां सरस्वती की पूजा की जाती है एवं विद्या वरदान के रुप में मांगी जाती है। कई जगहों में इस दिन बच्चों को पहला अक्षर लिखना एवं पढ़ना सिखाया जाता है। मान्यता है कि इस दिन पठन-पाठन शुरु करने से मनुष्य पर मां सरस्वती की कृपा प्राप्त होती है।

कब है शुभ मुहूर्त

बसंत पंचमी के दिन दो खास संयोग रवि योग और अमृत सिद्धि योग का संयोग बन रहा है। बसंत पंचमी के पूरे दिन रवि योग रहेगा। इसलिए इस बार की बंसत पंचमी का महत्व और भी बढ़ गया है। मंगलवार 16 फरवरी को स्3 बजकर 36 मिनट पर पंचमी तिथि शुरु होगी , जो अगले दिन यानी 17 फरवरी को सुबह 5 बजकर 46 मिनट पर पूर्ण होगी। इस बीच 16 फरवरी को दिन में 11.30 से 12.30 के बीच अति शुभ मुहूर्त है।

क्या है पूजन विधि

भक्तगण सबसे पहले मां सरस्वती की प्रतिमा या मूर्ति को पीले रंग के वस्त्र अर्पित करें। इसके बाद मां सरस्वती की प्रतिमा को रोली, चंदन, हल्दी, केसर, चंदन, पीले या सफेद रंग के पुष्प, पीली मिठाई और अक्षत अर्पित करें। तत्पश्चात मां सरस्वती की वंदना का पाठ करें। यदि विद्यार्थी चाहें तो इस दिन मां सरस्वती के लिए व्रत भी रख सकते हैं।

सरस्वती उपासना मंत्र

सरस्वती नमस्तुभ्यं वरदे कामरूपिणी, विद्यारम्भ करिष्यामि सिद्धिर्भवतु में सदा।

क्यों मनाई जाती है बंसत पंचमी

इस दिन को मां सरस्वती की जन्मदिवस के रूप में भी मनाया जाता है। शास्त्रों के अनुसार बसंत पंचमी के दिन ही मां सरस्वती का जन्म हुआ था। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार जब भगवान विष्णु के कहने पर ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना की तो उन्होंने जीव जंतु और मनुष्यों की रचना की थी। लेकिन, ब्रह्मा जी अपनी रचना से संतुष्ट नहीं थे। जिसकी वजह से चारो और मौन छाया हुआ था।

जिसके बाद भगवान विष्णु की अनुमति लेकर ब्रह्मा जी ने अपने कमंडल में से जल छिड़का। जिसके पश्चात एक हाथ में वीणा तथा दूसरा हाथ वर मुद्रा में एवं अन्य दो हाथों में पुस्तक और माला लिए स्त्री प्रकट हुई। उनके वाणी बजाते ही सर्व संसार को कोलाहल प्राप्त हुआ। तब ब्रह्मा जी ने उस देवी को वाणी की देवी सरस्वती का नाम दिया।

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