जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: किसान आंदोलन को 110 दिन से ज्यादा हो गए हैं। आंदोलन का कोई समाधान नहीं निकल रहा है। मेघालय के राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने 110 दिन बाद आंदोलन में एंट्री होती दिखाई दे रही हैं। अचानक सत्यपाल मलिक ने किसानों के पक्ष में बोलना शुरू कर दिया।
अब ऐसे संकेत भी मिल रहे है कि सत्यपाल मलिक ही किसानों व सरकार के बीच बातचीत की धूरी बनने जा रहे हैं। इसके संकेत सत्यपाल मलिक के बार-बार आ रहे बयान दे रहे हैं। यही नहीं, इसके लिए भाकियू के राष्ट्रीय अध्यक्ष चौधरी नरेश टिकैत ने भी संकेत दिये हैं।
क्योंकि, भाकियू भी चाहती है कि कृषि कानून के खिलाफ चल रहे इस आंदोलन में सरकार के साथ कोई बातचीत का रास्ता निकले। मेघालय के राज्यपाल सत्यपाल मलिक मूल रूप से बागपत के हिसावदा गांव के रहने वाले हैं। किसान नेता की उनकी छवि रही है। लंबे समय तक वह पूर्व प्रधानमंत्री स्व. चौधरी चरण सिंह के विश्वासपात्र भी रह चुके हैं।
हालांकि अब अलग बात यह है कि सत्यपाल मलिक ने भाजपा का दामन थाम रखा है। सत्यपाल मलिक ने किसानों के जख्मों पर यह कहकर मरहम लगाने की कोशिश की है कि किसानों को दिल्ली से खाली हाथ नहीं भेजना चाहिए, इसमें सरकार को कदम उठाने चाहिए तथा आंदोलित किसानों से बातचीत भी करनी चाहिए।
उनके इस बयान में बड़ा रहस्य छुपा हुआ है। सरकार के साथ किसानों की जो बातचीत टूटी थी, उसको चालू करने के लिए सत्यपाल मलिक धूरी बन सकते हैं। इस दिशा में सत्यपाल मलिक की भूमिका अहम् हो सकती है। ऐसे संकेत फिलहाल मिल रहे हैं, वहीं भाकियू के राष्ट्रीय अध्यक्ष चौधरी नरेश टिकैत ने भी कहा है कि सत्यपाल मलिक किसान के पुत्र हैं। वह किसानों का दर्द जानते हैं।
उन्हें आगे आकर किसानों व सरकार के बीच मध्यस्ता करनी चाहिए। उनकी मध्यस्ता भाकियू को भी स्वीकार है। इससे साफ हो गया है कि जल्द ही मेघालय के राज्यपाल सत्यपाल मलिक व आंदोलित किसान नेताओं के बीच बातचीत हो सकती है, जिसके परिणाम सार्थक भी निकल सकते हैं। किसानों पर दर्ज हुए मुकदमे वापस हो सकते हैं तथा कृषि कानून भी तीन वर्षों के लिए होल्ड किया जा सकता है।
यूपी में गन्ने का 15 रुपये मूल्य भी बढ़ाया जा सकता हैं। इसके अलावा भी कई अहम् बिन्दुओं पर सरकार व किसान नेता समझौता कर फाइनल मुहर लगा सकते हैं, ऐसी संभावनाएं बनती दिखाई दे रही है। हालांकि भाकियू के राष्ट्रीय प्रवक्ता चौधरी राकेश टिकैत ने जिस तरह से भाजपा के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए पश्चिमी बंगाल में भी किसानों की महापंचायत कर भाजपा को वोट नहीं देने की अपील की है।
उससे सरकार व किसान नेताओं के बीच टकराव कम होने की बजाय बढ़ा है। भाजपा को भी दिख रहा है कि इस तरह से यदि किसान नेता चुनाव में भाजपा के खिलाफ प्रचार में जुटे रहे तो भविष्य में यूपी समेत कई राज्यों में होने वाले अगले वर्ष विधानसभा चुनाव में बड़ा नुकसान भी हो सकता है। यही वजह है कि अब समझौते की टेबल पर फिर से चर्चा हो सकती है।

