Friday, February 13, 2026
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सर्वश्रेष्ठ कौन?

AMRITWANI 1


राजा मलिक अपनी प्रजा की सेवा में दिन-रात जुटा रहता था। उसकी प्रजा परम संतुष्ट थी। एक दिन राजा ने सोचा कि मेरी कीर्ति चारों ओर फैली हुई है। सब मेरी प्रशंसा करते हैं। मुझे इस बात का पता लगाना चाहिए कि क्या मैं सचमुच श्रेष्ठ हूं? कहीं ऐसा तो नहीं कि चापलूस दरबारी मुझे अंधेरे में रखे हुए हों। उसने अपने राज्य के विद्वानों से पूछा तो सभी ने कहा, महाराज आप तो सर्वश्रेष्ठ हैं। आपका चरित्र, व्यवहार और विचार चंद्रमा के समान धवल है। आप जैसा राजा तो पूरी दुनिया में कहीं भी नहीं है। राजा ने सोचा, हो सकता है मुझे प्रसन्न करने के लिए ये मेरी प्रशंसा कर रहे हों।

इसलिए उसने सच जानने के लिए गांव-गांव जाकर पता किया। सभी स्थानों पर यही उत्तर मिला। राजा को यकीन हो गया कि मुझ जैसा परोपकारी राजा दूसरा और कोई नहीं है। राजा मलिक गर्व से फूला, जब अपनी राजधानी लौट रहा था, तब उसका सामना राजा ब्रह्मदत्त से हो गया। दोनों के रथ आमने-सामने थे। ब्रह्मदत्त के सारथी ने मलिक से कहा, मेरे रथ पर समस्त गुणों के भंडार बैठे हैं। अपना रथ हटा लीजिए। राजा मलिक ने कहा, सभी गुणों का भंडार तो मैं हूं। आप अपने रथ को बगल में कर लो।

ब्रह्मदत्त बोले, आप अपने को श्रेष्ठ क्यों समझते हैं? राजा मलिक ने कहा, क्योंकि मैं बुराई करने वालों के साथ बुराई और भलाई करने वालों के साथ भलाई करता हूं। इस पर ब्रह्मदत्त ने कहा, लेकिन इतने से ही आप श्रेष्ठ कैसे हो गए? सर्वश्रेष्ठ तो वह है, जो बुराई करने वालों के साथ भी भलाई करता है और उसे सदाचार के मार्ग पर ले आता है। यह सुनकर राजा मलिक को अपनी गलती का अहसास हुआ और वह ब्रह्मदत्त के प्रति श्रद्धा से भर उठा।


SAMVAD 1

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