
आॅक्सफैम का पूरा नाम आक्सफोर्ड कमिटी फॉर फेमाइन रिलीफ यह मूल रूप से ब्रिटेन स्थित प्रसिद्ध आॅक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के शहर आॅक्सफोर्ड में अकाल राहत के लिए आॅक्सफोर्ड कमेटी के रूप में स्थापित, दुनिया भर में गरीबी और संबंधित अन्याय के समाधान खोजने के लिए काम करने वाले संगठनों का एक अंतरराष्ट्रीय संघ है। यह हर साल जनवरी के तीसरे सप्ताह में अपनी रिपोर्ट जारी करता है, यह वही वक्त है जब दुनिया भर के अमीर और विकासशील देशों के राष्ट्राध्यक्षों और उन्हीं देशों के पूंजीपतियों का जमावड़ा स्विट्जरलैंड के दावोस शहर में जनवरी के तीसरे सप्ताह में एक विशाल वैश्विक सभा का आयोजन करता है। इसमें ये सभी मिलजुलकर भविष्य के लिए आर्थिक रणनीतियां बनाते हैं।
लेकिन वास्तविकता यही है कि आने वाले हर सालों में भारत सहित दुनियाभर के पूंजीवादी देशों में गरीब लोगों की गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी, अशिक्षा, कुपोषण, आवास आदि की समस्याएं और भी विकराल रूप धारण करतीं जातीं हैं! दूसरी तरफ अमीरों की संख्या और बेशुमार दौलत में अकूत इजाफा होता जाता है, उदाहरणार्थ भारत में केवल पिछले एक साल में अरबपति पूंजीपतियों की संख्या में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई है! 2021 से पहले जहां भारत में केवल 102 अरबपति थे, वहीं 2021 में 40 और नए अरबपति बनकर उनकी संख्या 142 हो गई है। पिछले साल के कोरोना के वीभत्स काल में भी अरबपतियों की संख्या में दिन-दूनी-रात-चौगुनी की तेज रफ्तार से बढ़ोतरी हुई है, लेकिन दूसरी तरफ पिछले साल के कोरोना के भयावह दौर में भारत के 84 प्रतिशत परिवार भुखमरी के कगार पर खड़े हो गए! भारत के केवल 9 अमीरों के पास भारत की 50 प्रतिशत आबादी के बराबर धन इकट्ठा है! भारत सरकार के ही आंकड़ों के अनुसार 2017 में प्रति 10189 लोगों पर सिर्फ एक डॉक्टर है। प्रति 90343 लोगों की विशाल जनसंख्या पर केवल एक सरकारी अस्पताल है।
2010 में प्रति 10000 लोगों पर 9 बिस्तर सुलभ थे, लेकिन 2022 आते-आते अब प्रति 10000 लोगों पर केवल 5 बिस्तर में ही सिमट गया।
हकीकत यह है कि कोरोना के त्रासद काल में जब देश के लोग आॅक्सीजन, दवाओं और अन्य आवश्यक चीजों की भयंकर कमी में अपनी सांसों के लिए, जीने के लिए जद्दोजहद कर रहे थे, यहां के पूंजीपति आपदा में अवसर ढूंढ रहे थे। वास्तविकता यह भी है कि भारत जैसे देशों में सुरसा की तरह बढ़ती आर्थिक असमानता को कम करने के लिए किसी जादू की छड़ी, मंदिर, मस्जिद, चर्च, भगवान, खुदा और गॉड के वरदान व आशीर्वाद की कतई जरूरत ही नहीं है। सरकार इस देश के मजदूरों को उनके जीविकोपार्जन लायक मजदूरी देने तथा 90 करोड़ किसानों को उनके द्वारा उत्पादित फसलों का उचित मतलब उनकी लागत पर कुछ लाभांश रखकर देना सुनिश्चित करे, भारत में सर्वत्र खुशहाली आ जाएगी। लेकिन आम आदमी और किसानों के लिए यह एक दिवास्वप्न सरीखा ही है। आज भारत में खेती एक घाटे का सौदा बनकर रह गई है। खेती के लिए जरूरी सभी चीजें यथा खाद, पानी, बिजली, बीज, कीटनाशक, यूरिया, पेट्रोल, डीजल, ट्रैक्टर, मजदूरी आदि सभी कुछ बहुत महंगे हैं, लेकिन किसान द्वारा उत्पादित फसल को बाजार में बिचौलियों द्वारा मिट्टी के मोल लूट लिया जाता है। किसानों की भी मजबूरी है कि वे खेती न करें तो करें क्या? सरकारें एक तरफ किसानों को उनके द्वारा उत्पादित फसलों की न्यायोचित मूल्य तक नहीं दे रहीं हैं, जिससे किसान लाखों की संख्या में खुदखुशी कर चुके हैं और अभी भी प्रति आधे घंटे में एक की दर से अभी भी उनकी आत्महत्या करना जारी है। दूसरी तरफ पिछले कुछ सालों से अब तक इन्हीं सरकारों के कर्णधार अमीरों के 110 खरब रुपयों को एनपीए के चोर दरवाजे से माफ कर चुके हैं। किसानों को उनकी फसलों की जायज कीमत न देकर वर्तमान सरकारें देश के 90 करोड़ लोगों को जबर्दस्ती गरीबी के दलदल में धकेल रही हैं।
हकीकत यह है कि देश में अचानक लॉकडाउन लगाकर, जीएसटी लागूकर, अचानक नोटबंदी करके, स्कूलों, अस्पतालों, रेलवे और अन्य बहुतेरे सार्वजनिक संस्थानों को बेचकर एक आम गरीब, आदिवासी, दलित और अन्य पिछड़े वर्ग के युवा को उसके जीवन निर्वाह के लिए मिलने वाली नौकरी के अधिकार से जानबूझकर वंचित कर उसे आजीवन बेरोजगार कर गरीबी और अभावग्रस्त जीवन जीने को मजबूर किया है। प्राइवेट स्कूलों की ऊंची फीस न दे पाने से उनके बच्चों को अशिक्षित करने तथा निजी अस्पतालों के मनमानी लूट-खसोट से उसे गरीबी के नरक में जबरन जाने की दु:स्थितियों को जानबूझकर पैदा किया है।
देश में कुछ सौ अमीरी की गगनचुंबी मीनारों को कदापि नहीं खड़ी करनी है, जिसके बगल में गरीबी के दलदल के अनन्त विस्तारित समुद्र में गरीब लोग कुपोषण, अशिक्षा, भूखमरी, बेरोजगारी से तिल-तिलकर मर रहे हों। सरकार का यह कथित विकास का मॉडल कतई स्वीकार्य नहीं है। हमें ऐसी जनहितैषी सरकारें चाहिए जो इस देश के अन्नदाताओं के दु:ख को संजीदगी से सुनकर उनका मानवीय समाधान करें, कृषि में फसलों की लागत मूल्य कम करने के लिए उन्हें खाद, पानी, बिजली, डीजल, पेट्रोल, बीज, कीटनाशक, ट्रैक्टर आदि की कीमत न्यूनतम रखी जाए, किसानों द्वारा उत्पादित फसलों की दलालों द्वारा लूटने पर उन्हें कठोर दंड मिले, फसलों की कीमत न्यायोचित हो, जिससे किसान भी खुशहाल रहे, मजदूरों को भी इतनी मजदूरी मिले कि वे भी ठीक से अपने जीवन का निर्वाह कर सकें, शिक्षा रोजगारोन्मुखी हो, ताकि सभी को रोजगार मिल सके, कोई बेरोजगार युवा और किसान अपने जीवन से निराश होकर खुदकुशी करने को मजबूर न हो।
जातिवाद व धार्मिक प्रोपेगैंडा फैलाने वालों पर कानूनी कार्यवाही करके उन्हें दंड मिलना सुनिश्चित हो, ताकि ये धर्म और जातिवाद की वैमनस्यता फैलाने वाले समाज में किसी भी सूरत में अमन और शांति को भंग न कर सकें। हमें ऐसा विकास चाहिए कि धन का प्रवाह ज्यादा मानवीय हो, सभी के सर पर छत हो, सभी को दोनों वक्त की रोटी नसीब हो, सभी को मुफ्त शिक्षा मिल सके, किसी गरीब से गरीब बीमार व्यक्ति को भी सही समय पर बगैर किसी लूट-खसोट के समुचित और मुफ्त इलाज सुलभ हो, सभी लोग स्वस्थ्य व खुशहाल जीवन जी सकें, ऐसी व्यवस्था हो कि बगैर जातिगत व धार्मिक संकीर्णता के सभी जातियों, धर्मों और समुदायों के लोग भयमुक्त होकर शांतिपूर्वक इस देश में जी सकें।


