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शाहपीर मकबरा: पर्यटन बनाने की योजना फाइलों में

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शाहपीर मकबरा: पर्यटन बनाने की योजना फाइलों में
  • कमिश्नर ने हेरीटेज योजना में शामिल करने की थी घोषणा
  • मकबरा के केयरटेकर भी मिल चुका कमिश्नर से

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: मुगलकालीन शहंशाह जहांगीर के शिक्षक और नूरजहां के चिकित्सकीय सलाहकार हजरत शाहपीर की याद में बनाया गया शाहपीर मकबरा भले ही पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की देखरेख में हो, लेकिन कमिश्नर ने हेरीटेज योजना में भी इसको शामिल किया था। एक साल गुजर गये, लेकिन प्रशासन ने इस मकबरे की तरफ झांकने की जरूरत नहीं समझी। मकबरा के केयरटेकर इस संबंध में कमिश्नर से मिल भी चुके है लेकिन सिवाय आश्वासन के कुछ नहीं मिला।

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हापुड़ रोड पर इन्दिरा चौक से थोड़ा आगे एक संकरी गली के अंदर शाहपीर का मकबरा स्थित है। 1620 में एक मुस्लिम हजरत शाहपीर के इंतकाल के बाद बनाया गया था। हजरत शाहपीर बादशाह जहांगीर का शिक्षक और रानी का चिकित्सक सलाहकार थे। स्मारक गहरे लाल बलुई पत्थरों से बना है जो शाम के समय जब सूरज डूब रहा होता है तब बेहद खूबसूरत लगता है।

शाहपीर का मकबरा मेरठ के लोकप्रिय स्मारकों में से एक है। जिसे उत्तर भारत का सबसे पुराना मकबरा माना जाता है। इसका निर्माण हजरत शाहपीर के इंतकाल के 24 घंटे के अंदर जहांगीर के द्वारा शुरू कराया गया था। बाद में जहांगीर के इंतकाल के बाद उसकी पत्नी नूरजहां ने इसे पूरा कराया था। दरगाह 1620 में बनी थी जो ताजमहल से भी काफी पहले की है। इसे जटिल रूप से डिजाइन के साथ उकेरा गया है।

इस खुले आसमान की संरचना में कोई छत नहीं है। कहा जाता है कि इसके बावजूद बारिश का पानी मुख्य मकबरे पर नहीं गिरता। यह 605 वर्षों से समय की कसौटी पर खरा उतरा है और इसे भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा राष्ट्रीय विरासत स्मारक के रूप में सूचीबद्ध किया गया है। बाद में 1829 में, राजा स्थानीय जागीरदार ने मकबरे के पास गेट बनवाया, जिसे शाहपीर का दरवाजा के नाम से जाना जाने लगा। इस ऐतिहासिक मकबरे को पुरातत्व विभाग ने अपने अधिकार क्षेत्र में लिया हुआ है।

मकबरे के पास न तो सड़क बनी है और न ही सफाई की व्यवस्था है। जबकि रोज सैकड़ों लोग इबादत के लिये आते हैं। मकबरे के केयर टेकर अहमद अली ने बताया कि पूर्व कमिश्नर ने हेरीटेज योजना के तहत मकबरे को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की घोषणा की थी, लेकिन अभी तक इस योजना को अमली जामा नहीं पहनाया जा सका है। उन्होंने बताया कि रमजान के दिनों में काफी लोग यहां आते हैं।

इसके अलावा पूरे साल लोग इबादत के लिये आते रहते हैं। घनी आबादी के बीच स्थित इस मकबरे के बारे में शहर के काफी लोगों को नहीं पता है, लेकिन प्रशासन की तरफ से इस ओर कोई कार्रवाई नहीं की गई है। वरिष्ठ एडवोकेट अयाज अहमद ने बताया कि शाहपीर सांप्रदायिक सौहार्द का मोहल्ला है और हर बिरादरी और धर्म के लोग रहते है। इस मकबरे का ऐतिहासिक महत्व है और पूरा क्षेत्र इसके कारण प्रसिद्ध है। प्रशासन को चाहिये इसका विकास करें।