- 1952 में हुई खोज में ऐसी कई चीजें मिली, जो चौंकाने वाली थी, जिसका महाभारत से था संबंध
जनवाणी संवाददाता |
हस्तिनापुर: महाभारत कालीन तीर्थ नगरी हस्तिनापुर के किस्से दिलचस्प और अजीबों गरीब हैं। महाभारत काल में हस्तिनापुर कुरु वंश के राजाओं की राजधानी होने के बाद हस्तिनापुर को विरासत में महज विनाश हिस्से में आया। धर्म नगरी गंगा किनारे होने के कारण ना जाने कितनी बार उजड़ी होगी। जिसके सक्ष्य आज भी टीले के गर्भ में दफन है। जिन्हे खोजने में पुरातत्व की टीम दिन रात लगी है। हालाकि हिंदू इतिहास में हस्तिनापुर का खासा महत्व है, हिंदू इतिहास में पहला संदर्भ सम्राट भरत की राजधानी के रूप में आता है। महा काव्य महाभारत में कई घटनाएं हस्तिनापुर में घटी घटनाओं पर आधारित है।

हस्तिनापुर में इतिहास के सबसे बड़े युद्ध की कहानी हो या एक किवदंती की सत्यता को लेकर कई बार सवाल उठने का वाक्या हो। जिसके लिए कई बार उसको जमीनी कसौटी पर उतरना पड़ा, महाभारत से जुड़ी कई कहानियां पश्चिमी उत्तर के कई इलाकों में सुनी जा सकती हैं। इनसे जुड़े साक्ष्य भी कई बार सामने आ चुके हैं।
एक बार फिर मेरठ के पास हस्तिनापुर में पुरातत्व विभाग महाभारत से जुड़े साक्ष्य तलाशने की कोशिश की जाएगी, ये कोशिश इस बात को उजागर करने का एक कदम होगा कि हजारों साल बाद भी मानव सभ्यता से जुड़ी ये चीजों को कैसे समझा जाये? किस्से आज भी रोचक है।
कभी हस्तिनापुर के विनाश का कारण दौपद्री का श्राप बताया जाता है तो कभी गंगा में समय-समय पर आने वाली बाढ़ को इसका जिम्मेदार बताया जाता है, लेकिन आज तक हस्तिनापुर की बबार्दी को सत्य किस के सामने नहीं आया, लेकिन उल्टा खेड़ा टीले पर चल रहे उत्खनन हस्तिनापुर के विनाश का कारण खोज सकें।
हस्तिनापुर का विकास पर्यटन की दृष्टि से होगा महत्वपूर्ण
कार्बन डेटिंग से ये जानकारी सामने आएगी कि जो भी समान पुरातत्व विभाग को मिले हैं, क्या वाकई महाभारत काल का हैं या फिर इन सामानों को इतिहास उससे भी पहले का है, क्योंकि कॉपर से बने हथियार का इतिहास करीब 4000 साल से 6000 साल पुराना है। हस्तिनापुर के पांडव महल के अलावा ऊपरी टीला की कार्बन डेटिंग के लिए केन्द्र सरकार ने करीब 500 करोड़ रुपये का बजट अलॉट किया है, जिसका मकसद हस्तिनापुर का विकास पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण बनाना और उसके पुरातात्विक महत्व को आम जनता के सामने लाने के प्रयास को सफल बनाना है।
मिल रहे साक्ष्योें की जा रही कार्बन डेटिंग
पांडव टील पर पुरातत्व विभाग की टीम को उत्खनन के दौरान जो साक्ष्य मिल रहे हैं। उन साक्ष्यों में कुछ साक्ष्यों को बेहद महत्वपूर्ण माना गया है। 1952 में हुई खोज में ऐसी कई सारी चीजें मिली जो चौंकाने वाली थी, जिसका संबंध महाभारत से था। अब इन्हीं तथ्यों को सरकार तक पहुंचाने की कवायद शुरू कर दी गई है। इसमें अब तक मिले तमाम साक्ष्यों की कार्बन डेटिंग कराई जाएगी। साथ ही पांडव टीला और उसके आसपास के क्षेत्र में पुरातत्व विभाग फिर से एक्सकेवशन करेगा। बता दें कि हस्तिनापुर में कई ऐसी जगहे हैं। जहां पर महाभारत कालीन अवशेष मिलते रहे हैं, अब पुरातत्व विभाग उन स्थानों की खोज करेगा।
उत्खनन में मिला कूप
भारतीय पुरातत्व विभाग मेरठ जोन के डा. गणनायक के नेतृत्व में उत्खनन का कार्य कर रही टीम को मंगलवार को उत्खनन के दौरान राजपुताना काल का बेहद अहम् साक्ष्य मिला। उत्खनन के दौरान धरती के गर्भ में लगभग 10 फीट अन्दर एक कूप मिला। जिससे कई अन्य रहस्य भी उजागर होने की सभंवना है।
साक्ष्यों की होगी जांच
भारतीय पुरातत्व विभाग मेरठ जोन के डा. गणनायक बताते हैं कि नए साल में इसकी शुरुआत की जाएगी। करीब 10 जनवरी से एक्सकेवशन शुरू होगा, पहले की गई खोज के आधार पर हम लोगो ने कुछ तय स्थानों पर जाने का प्लान बनाया है। मेरठ और हस्तिनापुर हमेशा से महाभारत से जुड़े स्थलों के महत्वपूर्ण माने जाते हैं। हालांकि बागपत के सिनौली में जब महाभारत कालीन खोज हुई तो इतिहास की दिशा ही बदल दी थी और अब ऐसी ही उम्मीद इस नई खोज से भी है।

