राजेंद्र बज
इस असार संसार में जो भी आया है उसे कभी न कभी तो जाना ही होगा। यही संसार की रीत है। जिसे हम जानते हुए भी मानते कहां हैं ! भाग्य और पुरुषार्थ के माध्यम से जो कुछ भी हम भौतिक दृष्टि से संचय करते हैं, यही का यही रह जाया करता है। हमारे कर्मों का लेखा-जोखा मात्र कुछ समय तक जमाना याद रखता है। ऐसे में यह आश्चर्य का विषय है कि हम अपने चेतन और अवचेतन मन में इस कटु सत्य को स्वीकार नहीं करते। और…, और… और की चाहत के चलते हम जीवन के वास्तविक आनंद से वंचित हो जाते हैं। बचपन में सुना करते थे कि ‘ सब ठाठ पड़ा रह जाएगा जब लाद चलेगा बंजारा ”, लेकिन इसके गूढ़ निहितार्थ कभी समझ नहीं पाते थे।
जीवन भर हम राग, द्वेष, माया, ममता, मोह और लोभ में आकंठ जकड़ी हुई अवस्था में सांस-दर-सांस मौत के नजदीक जाते चले जाते हैं। लेकिन ऐसा नहीं होता कि जिंदगी के सफर में हम कहीं कोई परिग्रह से मुक्त होने की मानसिकता को धारण करें। यही कारण है कि लगातार जीवन की घटती उम्र के बावजूद हम सांसारिक पदार्थों के प्रति आसक्ति भाव का परित्याग नहीं कर पाते। अलग-अलग धर्म में अलग-अलग अवधारणाएं चाहे कितना भी मत-मतांतर रखती हो, लेकिन इससे बड़ा ध्रुव सत्य कोई नहीं है कि यह जीवन मौत की अमानत है। जिसे एक न एक दिन हमें लौटाना ही होगा।
हमने अपने अब तक के अनुभव से यह जाना है कि जो भी इस दुनिया से चले गए, उसे काल के प्रवाह में बहना ही पड़ा। सृष्टि के उदय से लेकर आज तक न जाने कितने धुरंधर आए और चले गए। कोई कितना ही महान हुआ, आखिरकार दिवंगतों की भीड़ में खोकर रह गया। कहा जाता है कि राजा राणा छत्रपति हथियान के असवार, मरना सबको एक दिन अपनी अपनी बार, लेकिन न जाने क्यों हम समझ लेते हैं कि ये पंक्तियां शायद हमारे लिए नहीं है। दरअसल यही भ्रम है, जो लगभग लाइलाज है। हालांकि जीवन में अनेकानेक शख्सियत की अंतिम यात्रा में शामिल होने का मौका अवश्य मिलता रहा। लेकिन श्मसानी वैराग्य की भावना भी श्मसान की चौखट पर आकर जाने कहां खो-सी जाती हैं !
आजकल तो व्यापार-व्यवसाय के साथ-साथ दुनियादारी की बातें श्मसान में भी होती नजर आती है। कहीं-कहीं तो उठावने एवं शोक निवारण की बैठक में नए-नए रिश्ते-नातों के प्रस्ताव की पृष्ठभूमि भी तैयार होती देखी गई है। वैसे यह बहुत स्वाभाविक है कि समय के साथ-साथ आदमी की मन:स्थिति में भी व्यापक परिवर्तन दिखाई दे। एक समय बाद मृत्यु को शाश्वत सत्य के रूप में स्वीकार करने की मानसिकता भी बहुत स्वाभाविक है। लेकिन यह गहन आश्चर्य का विषय है कि इस तस्वीर में हम अपने आप को नहीं देखते अपितु औरों को देखा करते हैं। जीवन भर ‘ हमारा-तुम्हारा ‘ करने के उपरांत आखिर अंत में हमें हासिल क्या होता है ?
लेकिन हम हैं कि जीवन भर जाने कैसे-कैसे भ्रम पाल लेते है – और फालतू का संताप किया करते हैं। इन तमाम संदर्भों में यदि हम सुकून के साथ जीवन जीना चाहे तो बेशक हम जी सकते हैं। लेकिन इसके लिए हमें अपने परिग्रह की सीमा रेखा खींचना होगी। दरअसल वर्तमान भौतिकवादी दौर में अनावश्यक परिग्रह ही तमाम समस्याओं की जड़ है। निश्चित रूप से जब हम परिग्रह को सीमित कर देंगे – तब बहुत ही स्वाभाविक रूप से माया, ममता, मोह और लोभ से सर्वथा मुक्ति प्राप्त कर लेंगे। इसके साथ-साथ राग और द्वेष की भावना से सर्वथा विमुक्त होकर निर्मल-निर्विकारी जीवन का आनंद ले सकेंगे। बेशक ऐसी स्थिति में आ जाने पर मृत्यु भी महोत्सव का रूप धारण कर लेती है।
आध्यात्मिक दृष्टि से भी इस तथ्य को स्वीकारा जाता है कि ‘चाह गई चिंता मिटी मनवा बेपरवाह’ , लेकिन चंचल मन की चाहत कुछ इस कदर परवान चढ़ा करती है कि संसार भर की दौलत से भी पेट नहीं भरता। और अधिक, और अधिक की चाहत कभी सुकून से बैठने नहीं देती। ऐसे में यह अत्यंत आवश्यक हो जाता है कि हम अपने परिग्रह की एक निश्चित सीमा रेखा खींच कर चलें। ऐसा करने पर ही हम जो कुछ हमारे पास प्राप्त है उसे पर्याप्त मानकर देव दुर्लभ मानव भव को सार्थक सिद्ध कर सकेंगे। सचमुच जीवन बहुत सुंदर है और जीने लायक भी है। असल सवाल यह है कि हम मन की चाहत को विराम देकर जीवन के इंद्रधनुषी रंग में रच बस जाएं। ऐसा करने पर हम धरा पर स्वर्ग उतार सकते हैं।

