शहर के उस कोने में जहां नालियों का पानी और दर्शनशास्त्र की बातें एक साथ सड़ती हैं, वहां एक पुराने बरगद के नीचे ‘मूर्ख शिरोमणि’ सभा जमी थी। यहां चतुर लोग नहीं आते थे, क्योंकि चतुरों को डर था कि कहीं उनकी बुद्धि की किश्तें समय पर न चुकने के कारण जब्त न हो जाएं। शुक्ल जी (जो कि मोहल्ले के इकलौते पढ़े-लिखे बेरोजगार थे और चतुर होने का दंड भुगत रहे थे) एक कोने में दुबक कर इस दृश्य को देख रहे थे। सामने एक शुद्ध उजड्ड बैठा था, जिसका पेट दुनिया के तमाम भ्रष्टाचारों को पचाने के बाद इतना बड़ा हो गया था कि उस पर एक छोटी-सी रियासत का नक्शा बनाया जा सकता था।
वह उजड्ड नहीं था, वह तो साक्षात ईश्वर का वह अवतार था जिसने ‘सोचने’ की मेहनत को त्याग दिया था। उसके चेहरे पर वैसी ही शांति थी, जैसी किसी श्मशान में रात के दो बजे होती है। वह अपनी उंगलियों से नाक के बालों को सहलाते हुए जीवन के उस सत्य की व्याख्या कर रहा था, जिसे समझने के लिए बड़े-बड़े दार्शनिकों ने अपनी आंखें और बुद्धि दोनों फोड़ ली थीं। वह कह रहा था कि भाई, बुद्धि तो एक बीमारी है, जो एक बार लग जाए तो आदमी को अपनी परछाईं से भी डर लगने लगता है। दरअसल, चतुर होना एक ऐसी सजा है, जिसमें आदमी खुद ही जेलर भी होता है और कैदी भी।
शुक्ल जी ने देखा कि कैसे एक जाहिल व्यक्ति बिना किसी ‘इंडियन पैनल कोड’ की परवाह किए, एक डंडे के दम पर उस पूरी व्यवस्था को हांक रहा था जिसे चतुर लोग फाइलों के अंबार में दबाकर बैठे थे। चतुर आदमी सलीके के रेशमी धागों में बंधा हुआ अपनी इज्जत की लाश ढोता है, जबकि उजड्ड आदमी अपनी नग्नता को ही अपना आभूषण बना लेता है। इस देश में चतुरों ने हमेशा पुल बनाए, सड़कें बनाईं और नियम रचे, लेकिन उन पर राज हमेशा उन्हीं का रहा जिन्होंने कभी स्कूल की दहलीज तक नहीं लांघी थी। राज करने के लिए दिमाग की नहीं, बल्कि उस ‘गुर्दे’ की जरूरत होती है जो केवल बेवकूफी की खाद पर पनपता है। उजड्ड आदमी को न तो इतिहास का बोझ दबाता है और न ही भविष्य की चिंता सताती है; वह तो केवल वर्तमान की उस रोटी पर नजर गड़ाए रहता है जिसे छीनने के लिए चतुरों को दस बार नैतिकताओं का पाठ पढ़ना पड़ता है।
समाज के इस तमाशे में सबसे बड़ा दुख यह है कि यहां ‘एजुकेटेड फूल’ होना सबसे बड़ी त्रासदी है। शुक्ल जी जैसे लोग, जो मार्क्स और हीगेल को घोट कर पी चुके थे, आज उस उजड्ड के सामने हाथ जोड़कर खड़े थे जो ‘अ’ और ‘आ’ में अंतर नहीं जानता था। पर वह जानता था कि सत्ता का केंद्र कहां है। लक्ष्मी का वाहन उल्लू क्यों है, यह उस दिन शुक्ल जी को समझ आया जब उन्होंने देखा कि करोड़पति बाप की वह औलाद, जिसे यह भी नहीं पता था कि आलू जमीन के ऊपर उगता है या नीचे, वह कृषि विभाग का सलाहकार बना बैठा था। यह देखकर चतुरों की आंखों में आंसू नहीं, बल्कि वह तेजाब उतर आया जो उनकी डिग्रियों को जलाने के लिए पर्याप्त था।

