Wednesday, March 25, 2026
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SIR पर गर्माई बंगाल की सियासत, टीएमसी की आपात बैठक, ममता का आयोग को दूसरा पत्र, BJP का जवाबी हमला

जनवाणी ब्यूरो |

नई दिल्ली: तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने 24 नवंबर को एक महत्वपूर्ण आंतरिक बैठक बुलाने का फैसला किया है, जिसकी अध्यक्षता पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी करेंगे। बैठक का मुख्य उद्देश्य विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया की समीक्षा करना और यह सुनिश्चित करना होगा कि मतदाता सूची में किसी भी पात्र मतदाता का नाम छूट न जाए।

सूत्रों के अनुसार, टीएमसी 25 नवंबर को SIR के खिलाफ एक बड़ी रैली भी आयोजित कर सकती है। इधर, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी राज्य में चल रही SIR प्रक्रिया पर गंभीर चिंता जाहिर की है। उन्होंने चुनाव आयोग से तत्काल हस्तक्षेप करने की अपील की है। ममता ने इस संबंध में अपने द्वारा पहले लिखे गए पत्र को शुक्रवार को एक्स पर साझा किया।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने राज्य में जारी विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया पर फिर से सवाल उठाते हुए चुनाव आयोग को एक और पत्र भेजा है। उन्होंने इस प्रक्रिया को योजना विहीन, अव्यवस्थित और खतरनाक बताया। ममता बनर्जी ने कहा कि प्रशिक्षण की कमी, जरूरी दस्तावेजों के बारे में स्पष्ट जानकारी न होना और मतदाताओं से उनकी रोजमर्रा की कामकाजी दिनचर्या के बीच मिल पाना लगभग असंभव होना—इन सभी कारणों की वजह से SIR का काम गंभीर रूप से प्रभावित हो रहा है। मुख्यमंत्री ने यह भी आरोप लगाया कि पूरी प्रक्रिया अधिकारियों और आम लोगों पर अचानक थोप दी गई, जिससे शुरू से ही अव्यवस्था की स्थिति बन गई। उनके अनुसार तैयारी की कमी, स्पष्ट दिशा-निर्देशों का अभाव और समुचित योजना न होने के कारण यह प्रक्रिया अब बेहद चिंताजनक स्थिति में पहुंच गई है।

मुख्यमंत्री ने बताया कि बूथ स्तर के अधिकारी यानी बीएलओ भारी दबाव में काम कर रहे हैं। उन्होंने ऑनलाइन डाटा भरने में दिक्कतें आ रही हैं, सर्वर ठीक से काम नहीं कर रहा और प्रशिक्षण भी पर्याप्त नहीं दिया गया। उन्होंने कहा कि इतनी भारी जिम्मेदारी, कम समय और तकनीकी दिक्कतों की वजह से मतदाता डाटा गलत होने का खतरा बढ़ गया है। यह स्थिति लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए गंभीर चुनौती है। उन्होंने आगे कहा कि बीएलओ इंसानी सीमा से बाहर जाकर काम कर रहे हैं। कई बीएलओ शिक्षक और अग्रिम मोर्चा के कार्यकर्ता भी हैं, जिन्हें अपनी नियमित ड्यूटी के साथ-साथ घर-घर सर्वे और ऑनलाइन फॉर्म भरने का काम करना पड़ रहा है। प्रशिक्षण की कमी, सर्वर की गड़बड़ियों और बार-बार डाटा मैच न होने की वजह से उन्हें लगातार दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।

ममता बनर्जी ने चेतावनी दी कि एसआईआर की खामियों की वजह से कई असली मतदाता वोटर लिस्ट से बाहर हो सकते हैं, जबकि पूरी मतदाता सूची की विश्वसनीयता भी प्रभावित हो सकती है। उन्होंने कहा कि चार दिसंबर तक कई विधानसभा क्षेत्रों का सही-सही डाटा अपलोड कर पाना लगभग नामुमकिन है। उन्होंने यह भी कहा कि दबाव में कई बीएलओ गलत या अधूरा डाटा जमा कर सकते हैं, जिससे सही मतदाताओं का नाम सूची से हट सकता है।

पत्र में यह भी आरोप लगाया गया कि इतनी कठिन परिस्थिति में सहयोग देने के बजाय चुनाव आयोग बीएलओ को डराने-धमकाने में लगा है। उन्होंने कहा कि बिना ठोस वजह के कारण बताओ नोटिस भेजे जा रहे हैं और पहले से परेशान बीएलओ को अनुशासनात्मक कार्रवाई की धमकी दी जा रही है, जबकि आयोग को वास्तविक स्थिति समझने की जरूरत है। मुख्यमंत्री ने यह भी बताया कि यह पूरी प्रक्रिया ऐसे समय हो रही है, जब राज्य में कृषि का चरम सीजन चल रहा है। किसानों और मजदूरों के लिए इस दौरान इन प्रक्रियाओं में हिस्सा लेना बेहद मुश्किल होता है। इससे मतदाताओं के जुड़ाव पर भी असर पड़ रहा है।

शुभेंदु अधिकारी ने चुनाव आयोग को अपना पत्र सौंपा

वहीं, विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष शुभेंदु अधिकारी ने एसआईआर को लेकर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की ओर से चुनाव आयोग को भेजे गए पत्र के जवाब में चुनाव आयोग को अपना पत्र सौंपा है। गुरुवार को लिखे अपने इस पत्र में अधिकारी ने आरोप लगाया कि ममता बनर्जी का संदेश चुनाव आयोग के सांविधानिक अधिकार को कमजोर करने की सोची-समझी कोशिश है। उन्होंने दावा किया कि इस पत्र का मकसद चुनाव अधिकारियों के बीच भ्रम फैलाना और उन मतदाताओं को बचाना है जिन्हें वे गैरकानूनी और अयोग्य बता रहे हैं।

अधिकारी ने लिखा कि मुख्यमंत्री का पत्र एसआईआर प्रक्रिया पर रचनात्मक सुझाव देने के बजाय चुनाव आयोग की सांविधानिक भूमिका को चुनौती देने वाला है। उन्होंने आरोप लगाया कि यह कदम चुनाव अधिकारियों के बीच मतभेद पैदा करने और ऐसे वोट बैंक को बचाने की कोशिश है, जिसमें ‘अयोग्य और अवैध तत्व’ शामिल हैं, जिन्हें उनकी पार्टी वर्षों से चुनावी फायदा उठाने के लिए बढ़ावा देती रही है। अधिकारी ने कहा कि यह केवल प्रशासनिक मुद्दा नहीं है, बल्कि देश के लोकतांत्रिक सिद्धांतों पर सीधा हमला है।

राज्यपाल सीवी आनंद बोस ने कहा

उधर, राज्यपाल सीवी आनंद बोस ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का वह हालिया आदेश भारतीय संविधान में शक्तियों के विभाजन के सिद्धांत को और मजबूत करता है, जिसमें यह स्पष्ट किया गया है कि अदालतें राष्ट्रपति और राज्यपालों को किसी विधेयक पर हस्ताक्षर करने के लिए समय सीमा तय नहीं कर सकतीं। उन्होंने कहा कि संविधान ने हर पद के लिए ‘लक्ष्मण रेखा’ तय कर रखी है।

राज्यपाल बोस ने कहा, इस आदेश ने यह संदेश दिया है कि भारत का सुप्रीम कोर्ट संविधान में दर्ज शक्तियों के विभाजन का सम्मान करता है। इसका मतलब यह नहीं है कि राज्यपाल फाइलों पर बैठे रहें। चुने हुए मुख्यमंत्री ही सरकार का असली चेहरा होते हैं, न कि नियुक्त किए गए राज्यपाल। राज्यपाल ने कहा कि यह फैसला मुख्यमंत्री और राज्यपाल दोनों की भूमिका को स्पष्ट रूप से बताता है और यह भी कि संविधान की सीमाओं का सम्मान करते हुए मिलकर काम करना जरूरी है। उन्होंने कहा, संविधान ने हर पद के लिए लक्ष्मण रेखा बना दी है। उसे पार मत करो, साथ मिलकर काम करो..यही संदेश सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से मिला है।

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