- टेसू के फूलों को भिगोकर उससे बने रंग से होली खेले जाने की पुरानी परंपरा अब टूट रही
जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: टेसू के फूलों को भिगोकर उससे बने रंग से होली खेले जाने की पुरानी परंपरा अब टूट रही है। कई वर्षों पूर्व विभिन्न जगहों से टेसू के फूल लेकर नगर व ग्रामीण क्षेत्रों में होली खेली जाती थी, लेकिन यह परंपरा ग्रामीण व नगरीय क्षेत्र में समाप्त होते दिखाई दे रही है। यही कारण है कि आज की पीढ़ी होली की इस विशिष्ट परंपरा से अंजान हैं। करीब डेढ़ दशक पूर्व तक घर-घर टेसू नामक पौधे के फूलों के रंग से होली खेली जाती थी। हालांकि, उस समय कृत्रिम रंगों से भी होली का प्रचलन हो चुका था, लेकिन टेसू नामक पौधे के फूलों के रंग से अनिवार्य रूप से होली खेली जाती थी।
इसकी वजह भी एक धार्मिक परंपरा थी। दरअसल ऐसी मान्यता है कि वृंदावन में गोपियों ने भगवान श्रीकृष्ण के संग टेसू नामक पौधे के फूलों से ही होली खेली थी। चूंकि टेसू पौधा शुक्र ग्रह का प्रतिनिधित्व करता है। शुक्र ग्रह वसंत ऋतु के राजा हैं। इस फूलों से होली खेलने पर भगवान की कृपा मिलने की मान्यता है।
फूलों को उबालकर बनाते थे रंग
औघड़नाथ मंदिर के वरिष्ठ पुरोहित श्रीधर त्रिपाठी बताते हैं कि 15-20 साल पहले होली मनाने की तैयारियों के चलते लोग टेसू नामक पौधे के फूलों को घर लाते थे। इसके बाद बर्तन में रखकर फूलों को उबाला जाता था और उनसे रंग निकाला जाता था। होली के अवसर पर फूलों के इसी रंग से लोग होली खेलते थे।
टेसू का रंग त्वचा को नही पहुंचाता नुकसान
पंडित मनोज तिवारी बताते हैं कि वर्तमान समय में तो यह परंपरा छोड़ ही दी है। परंपरा प्रचलन से बाहर होने से नई पीढ़ी इससे अंजान होती जा रही है। आयुर्वेद के जानकारों के अनुसार टेसू के फूलों का रंग त्वचा को किसी भी तरह का नुकसान नहीं पहुंचाता है। इसके रंग से सुंदरता निखर आती है। अब लोग रंग बनाने में झंझट के कारण टेसू के फूल नहीं लाते हैं। वे कृत्रिम रंग खरीदने में रुचि ले रहे हैं। इसीलिए यह परंपरा विस्मृत होती जा रही है।

