
गैर-भाजपा दलों की मुश्किल यह है कि वे जितनी राजनीतिक पूंजी कमाते हैं, जल्द ही उससे ज्यादा खर्च कर डालते हैं। नतीजा यह होता है कि भारतीय जनता पार्टी को चुनौती देने के लिए जो ‘राजनीतिक’ या वैचारिक ताकत चाहिए, उसे वे बना नहीं पाते। इसके बाद उनके लिए राजनीति का मतलब जोड़-घटाव बन जाता है। मगर दिक्कत यह है कि यह जोड़-घटाव भी वे गलत अंकगणित के साथ करते हैं। उससे ठोस जमीनी प्रश्नों का जो हल निकलता है, उसका गलत होना लाजिमी ही है। कमाई से ज्यादा राजनीतिक पूंजी खर्च करने की मिसाल देखनी हो, तो हाल की तीन घटनाओं पर गौर किया जा सकता है।