- दिया संदेश, लोकसभा चुनाव में भाजपा को सबक सिखाने के लिए रहे तैयार
जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: किसान आंदोलन से शुरू हुई किसानों की नाराजगी भारतीय जनता पार्टी को महंगी पड़ गई। एमएसपी कानून, गन्ना मूल्य और भुगतान के साथ-साथ छूट्टा पशुओं से होने वाली फसलों की बर्बादी ने भारतीय जनता पार्टी की लहलहाती चुनावी फसल को रौंद डाला। भारतीय किसान यूनियन नेतृत्व ने भाजपा के प्रति अपनी नाराजगी को कभी पोशीदा नहीं रखा और बार-बार किसानों को यह संदेश दिया कि लोकसभा चुनाव में भाजपा को सबक सिखाने के लिए तैयार रहें। किसानों में भाकियू के संदेश का गहरा असर हुआ, जिसके परिणाम पंजाब, हरियाणा के साथ-साथ पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भाजपा की मिली करारी हार के रूप में सामने आए हैं।
हरियाणा, पंजाब और पश्चिम उत्तर प्रदेश के किसानों ने एक वर्ष से भी अधिक समय तक चले दिल्ली में चले आंदोलन के दौरान बढ़-चढ़कर भाग लिया। लेकिन केंद्र सरकार ने खूब लंबे चले इस आंदोलन को भांपने में एक बड़ी चूक कर दी। किसानों की मांगों को लेकर कोई सकारात्मक बातचीत करने के बजाय सड़कों को खुदवा डाला, दिल्ली जाने वाली सड़कों पर दीवार और कीलें तक लगवा दी गर्इं। किसान दिल्ली न जा पाएं, इसको लेकर तरह-तरह के अवरोध पैदा किए गए। आंदोलन में भाग लेने वाले किसानों को आंदोलनजीवी, खालिस्तानी, पाकिस्तान समर्थित समेत कई तरह की तोहमतों से रूबरू होना पड़ा। हालांकि बाद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कृषि कानूनों को वापस लेने की घोषणा भी की, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
किसानों की प्रमुख मांगों में शामिल एमएसपी बिल लाए जाने के बारे में बार-बार मांग किए जाने के बावजूद कोई निर्णय नहीं लिया गया। जिसका खामियाजा लोकसभा चुनाव 2024 के दौरान हरियाणा, पंजाब और पश्चिम उत्तर प्रदेश में बड़ी संख्या में सीटें गंवाकर भारतीय जनता पार्टी को भुगतना पड़ा। भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय नेतृत्व की ओर से कभी खुले तौर पर तो कभी संकेत की भाषा में यह साफ कर दिया गया था कि इस बार लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को सबक सिखाना है। यही हुआ भी, अगर बागपत लोकसभा सीट को छोड़ दिया जाए तो बाकी स्थान पर भारतीय किसान यूनियन से प्रभावित बेल्ट में किसानों ने इंडिया गठबंधन का साथ दिया, और समाजवादी पार्टी के प्रत्याशियों को सिर पर जीत का सेहरा बांध दिया। भारतीय किसान यूनियन के जिला अध्यक्ष अनुराग चौधरी का कहना है कि वर्ष 2021 में विधानसभा चुनाव से ठीक पहले दिल्ली में हुए किसान आंदोलन के दौरान नाराजगी की एक फसल बोई गई थी। जो लोकसभा चुनाव तक इतनी फली फूली कि भारतीय जनता पार्टी को इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी।

