Wednesday, January 28, 2026
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पीढ़ी दर पीढ़ी न्याय का इंतजार

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केंद्रीय विधि एवं न्याय मंत्रालय के गत वर्ष के आंकड़ो की ही माने तो देश के उच्च न्यायालयों और जिला न्यायालयों में ही 65 लाख से अधिक मुकदमें निर्णय के इंतजार में दशकों से प्रतीक्षारत है। मजे की बात तो यह है कि 3 हजार से अधिक मामलें तो 50 साल भी अधिक समय से लंबित चल रहे हैं। दस साल या इससे अधिक समय से निर्णय का इंतजार कर रहे मुकदमों की ही बात करें तो यह संख्या इतनी अधिक है कि सोचने का मजबूर कर देती है। देश के 25 उच्च न्यायालयों व राज्यों के जिला अदालतों में लबित मुकदमों की बात की जाएं तो यह सामने आ रहा है कि 54 लाख 58 हजार 832 मुकदमें 10 से 20 साल की अवधि के हैं और निष्पादन का इंतजार कर रहे हैं। 20 से 30 साल और 30 से 40 साल की अवधि के निर्णय के इंतजार के मुकदमें भी लाखों में हैं। यह तो तब है जब आज भी कहीं कुछ हो जाता है तो यही कहा जाता है कि उपर वाले के यहां न्याय है अन्याय नहीं और इसी तरह से लोगों के अदालतों में विश्वास को इसी से समझा जा सकता है कि लोग अदालतों से इस कदर आषान्वित है कि वे न्याय के लिए अदालतों का शरण लेने में किसी तरह का संकोच नहीं करते। यहां तक की दुबारा सोचते भी नहीं है। तस्वीर का एक पहलू यह भी है कि सालों से लोक अदालतें भी लग रही है पर मुकदमों की संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है।

सवाल अदालतों में मुकदमों की संख्या को लेकर नहीं है। अदालतों की कार्यप्रणाली पर भी कोई टिप्पणी नहीं की जा सकती क्योंकि नित नए सुधार और मुकदमों के अंबार से स्वयं अदालातों में बैठे माननीय न्यायाधीश, सरकारें और सर्वोच्च अदालत तक चिंतित और गंभीर है बल्कि यह कहा जा सकता है कि गंभीर ही नहीं अपितु इसका कोई ना कोई हल खोजने के प्रयास जारी है। चिंता का सवाल यह है कि उच्च न्यायालयों और जिला न्यायालयों में 50 साल से अधिक समय से आज भी 3442 मुकदमें चल रहे हैं। इनमें से 2329 मुकदमें उच्च न्यायालयों व 1113 मुकदमें जिला न्यायालयों में पेंडिंग है। सवाल मुकदमों की संख्या को लेकर नहीं है क्योंकि यदि 50 साल से एक मुकदमा भी पेंडिंग है तो यह अपने आप में गंभीर हो जाता है। सवाल 50 साल की अवधि का विश्लेषण करने का है। 50 साल की अवधि का मतलब कई मामलों में तो निष्चित रुप से अदालतों में हाजरी देते देते दो से तीन पीढ़ियां तक खप गई होगी। मजे की बात यह है कि दोनों ही अदालतों में 50 साल से अधिक अवधि के लंबित मुकदमों में सिविल प्रकरण ही अधिक है।

निश्चित रूप में इनमें से अधिकांश जमीन जायदाद को लेकर होंगे। हालांकि दोनों अदालतों के मिलाकर 459 मुकदमे आपराधिक श्रेणी के हैं और 50 साल से अधिक समय से निर्णय के इंतजार में है। अब आज से 50 साल पहले जिसने भी जैसा भी अपराध किया था या जिसने भी जैसा भी अपराधी के कारण मानिसिक शारीरिक संताप या प्रताड़ना झेली थी उनमें से कई तो हो सकता है भगवान के प्यारे हो गये हो और भगवान के प्यारे भी नहीं हुए होंगे तब भी उनकी शारीरिक मानसिक हालात को समझा जा सकता है।

सरकार और सर्वोच्च न्यायालय के स्तर पर इस समस्या पर गंभीर चिंतन किया जाता रहा है और इसके समाधान खोजने के प्रयास भी किये जाते रहे हैं। यह तो एक अच्छी बात है कि अब सर्वोच्च न्यायालय में माननीय न्यायपतियों के अधिकांश भरे हुए रहने लगे हैं। इसके साथ ही समग्र प्रयासों से उच्च न्यायालयों और जिला अदालतों के न्यायमूर्तियों के पद भी भरने के प्रति गंभीर प्रयास जारी हैं। पर तस्वीर का दूसरा पहलू यह है कि एक मोटे अनुमान के अनुसर उच्च न्यायालयों के करीब 1100 से अधिक स्वीकृत पदों में से 300-350 से अधिक पद रिक्त चल रहे हैं। जहां तक जिला अदालतों का प्रश्न है, एक मोटे अनुमान के अनुसार करीब 4 से 5 हजार पद रिक्त हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि इससे काम प्रभावित होता है। पर दस साल से अधिक के कुल मिलाकर 65 लाख से अधिक मुकदमों में निर्णय का इंतजार कहीं ना कहीं हमारी व्यवस्था पर प्रश्न तो उठाता ही है।

सरकार ने कुछ माह पहले कानून में संशोधन कर सुधार की दिशा में कदम बढ़ाये हैं। उससे निस्तारण की समय सीमा तय होगी। पर सौ टके का सवाल यही है कि कुछ इस तरह का रोस्टर सिस्टम या केवल और केवल पुराने मुकदमों के निस्तारण के लिए अलग से ही माननीय न्यायाधीशों की बैंच बना दी जाएं तो प्राथमिकता से वर्षों से न्याय की आस में चल रहे मुकदमों का निष्पादन हो सके। न्यायालयों व सरकार दोनों के पास ही मुकदमों की वर्षवार बकाया सूची उपलब्ध है। यह तय हो जाए कि प्रति कार्यदिवस में निश्चित संख्या में पुराने मुकदमों की भी सुनवाई होगी तो बैकलॉंग निपटाना आसान हो जाएगा। इन मुकदमों से जुड़े वकीलों को भी यह दायित्व हो जाता है कि पक्ष विपक्ष दोनों के ही वकील महोदय मुकदमें के निस्तारण में सहभागी बने नाकि तारीख पर तारीख में।

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