- कैराना से प्रदीप चौधरी का फिर प्रत्याशी बनने पर समर्थकों में खुशी
राजपाल पारवा |
शामली: राजनीति में विरोधी न हो ऐसा हो नहीं सकता, लेकिन कैराना से वर्तमान सांसद प्रदीप चौधरी कभी विरोध की राजनीति नहीं की। यही उनकी सफलता का आधार बनती चली गई। इतना ही नहीं, अगर जनता के बीच किसी ने विरोध के स्वर बोले तो उसको हंसकर सकारात्मक जवाब दिया। यही कारण रहा कि राजनीतिक गलियारों से लेकर जनता जनार्दन के बीच उनके विरोधी नजर नहीं आए।
सहारनपुर की गंगोह विधानसभा क्षेत्र के गांव दूधला के किसान परिवार में 1969 में जन्म लेने वाले कैराना से भाजपा सांसद प्रदीप चौधरी के पिता मास्टर कंवरपाल सिंह तीन बार नकुड़ विधानसभा विधायक बने। देखा जाए तो युवावस्था में घर के अंदर उन्होंने राजनीति का ककहरा सीखा। उनके पिता मास्टर कंवरपाल सिंह की क्षेत्र में हर कोई मिसाल देता था। इसलिए तीन बार विधायक रहे कंवरपाल सिंह का 1999 में जब निधन हुआ तो अब परीक्षा थी प्रदीप की। पिता के निधन के नकुड़ विस पर 2000 में हुए उप चुनाव में जनता ने उनकी नैया को सहानुभूति के एक ही झोंके में पार लगा दिया।
पिता की राजनीति विरासत को भली-भांति संभालने का दायित्व अब प्रदीप चौधरी के कंधों पर था। 2012 में गंगोह विस से कांग्रेस व 2017 में भाजपा से प्रदेश विधानसभा में चुनकर पहुंचें। राजनीति गलियारों प्रदीप ने अपनी पकड़ 2019 में उस समय साबित की जब वे तमाम दावेदारों को एक झटके में किनारे कर कैराना लोकसभा सीट से भाजपा का टिकट हासिल करने में सफल हुए।
हाईकमान के सामने जब उनके राजनीति काबिलियत की परीक्षा की घड़ी आई तो वे उसमें सफल हुए। लोकसभा में वे 92,160 से विजयी हुए। उन्होंने सपा की तबस्सुम हसन को हराया। इस चुनाव में प्रदीप चौधरी को जहां को 50.44 फीसदी मत प्राप्त हुए, वही तबस्सुम हसन 42.24 प्रतिशत मत हासिल कर सकीं। जबकि कांग्रेस के हरेंद्र चौधरी 69,355 मत लेकर तीसरे स्थान पर रहे।
इतना ही नहीं, राजनीति के साथ-साथ जनता के बीच अगर कोई उनके विरोध में खड़ा नजर भी आया तो प्रदीप चौधरी ने अपनी शालीन मुस्कान के जरिए उसको पस्त कर दिया। यही कारण रहा कि कैराना लोकसभा से टिकट के करीब आधा दर्जन दावेदार होने के बावजूद बाजी प्रदीप चौधरी के हाथ ही लगी। अब उनको अप्रैल-मई में होने वाली अग्नि परीक्षा से गुजरना होगा। अगर वे उसमें सफल रहे तो असली कुंदन बन जाएंगे।

