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इंसान और जीव

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Amritvani 21


एक राजा शिकार का बड़ा प्रेमी था। जब भी वह आखेट के लिए जाता तो चारों ओर हाहाकार मच जाता। वन के जीव बहुत दुखी थे। मृगों में एक बहुत ही सुंदर और दयालु मृग था। वह वन के जीवों के दु:ख से बड़ा ही दुखी रहता था। वह मृग सोचता था कि ईश्वर ने खाने के लिए अनेक चीजें पैदा की हैं, फिर भी मनुष्य जीवों का शिकार क्यों करता है? उसने इस बात को लेकर राजा के पास जाने का निश्चय किया। प्रात: काल का समय था। राजा शिकार के लिए तैयार हो रहा था। सहसा एक सुंदर मृग राजा के सामने जाकर खड़ा हो गया। राजा उस मृग को देखकर चकित रह गया। इतने में मृग कोमल वाणी में बोल उठा, राजन आप प्रतिदिन वन में जाकर जीवों को शिकार करते हैं। मेरे शरीर के भीतर कस्तूरी का भंडार हैं। आपसे प्रार्थना है कि आप इस भंडार को ले लें और वन के प्रणियों का शिकार करना छोड़ दें। मृग की बात सुनकर राजा विस्मय से बोला, क्या तुम उन्हें बचाने के लिए अपने प्राण देना चाहते हो? तुम जानते हो कस्तूरी पाने के लिए मुझे तुम्हारा वध करना होगा। इस पर मृग बोला, राजन मुझे स्वीकार है। परंतु निरपराध जीवों का वध करना छोड़ दीजिए। राजा ने पुन: कहा, तुम्हारा शरीर बहुत सुंदर है। मृग ने जवाब दिया, राजन् यह शरीर तो नश्वर है। मैं दूसरों के प्राण बचाने के लिए मर जाऊं, इससे अच्छी बात क्या हो सकती है मेरे इस सुंदर शरीर के लिए। मृग की ज्ञान भरी वाणी ने राजा के मन में वैराग्य का प्रकाश पैदा कर दिया। वह सोचने लगा कि यह जानवर होकर भी दूसरों के लिए अपने प्राण दे रहा है और मैं मनुष्य होकर रोज जीवों की जान ले रहा हूं। उस दिन से राजा जीवों की हिंसा छोड़कर प्राणी मात्र पर दया करने लगा।                                                      प्रस्तुति : राजेंद्र कुमार शर्मा


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