गाती है मल्हार जिंदगी पल पल सावन बरसे!
डॉ श्रीगोपाल नारसन एडवोकेट

चिंतन का आधार मिले तो, यह जग पावन होता है!
गाती है मल्हार ज़िंदगी, पल-पल सावन होता है!प्रसिद्ध साहित्यकार रहे डॉ योगेंद्रनाथ शर्मा ‘अरुण’ की ये पंक्तियां आध्यात्मिकता और प्रकृति का ऐसा संगम है ,जिसमे से तीज की खुशी झांकती नज़र आती है।
हरियाली तीज का पर्व इस वर्ष 27 जुलाई, रविवार को मनाया जा रहा है। हिंदू पंचांग के अनुसार, सावन शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि की शुरुआत 26 जुलाई को रात 10:41 बजे से होगी और यह तिथि 27 जुलाई रात 10:41 बजे तक रहेगी। उदया तिथि के अनुसार व्रत और पर्व 27 जुलाई को रखा जाएगा। इस दिन एक विशेष संयोग भी बन रहा है — रवि योग, जो 27 जुलाई शाम 4:23 बजे से शुरू होकर 28 जुलाई सुबह 5:40 बजे तक रहेगा।
मान्यता है कि रवि योग में किया गया व्रत और पूजन अत्यंत शुभ और फलदायक होता है। हरियाली तीज विशेषकर सुहागिनों द्वारा पति की लंबी उम्र और वैवाहिक सुख-शांति के लिए रखा जाता है।हरियाली तीज का विशेष महत्व है।
इस दिन सुहागिनें व्रत रखकर अपने पति की लंबी आयु और स्वयं अखंड सौभाग्यवती बने रहने के लिए भगवान शिव और मां पार्वती का पूजन करती हैं। हरियाली तीज का उपवास सावन मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को रखा जाता है।
इस तिथि को ही माता पार्वती और भगवान शिव को दोबारा मिलन हुआ था।इसलिए इसे सुखद उत्सव के रूप में मनाया जाता है। लड़कियां यह उपवास मन वांछित वर की प्राप्ति के लिए रखती है।
हरियाली तीज उपवास पूजा के लिए पीला वस्त्र, केला के पत्ते, जनेऊ, कच्चा सूत, नए वस्त्र, बेलपत्र, धतूरा, भांग, कपड़ा, एक जोड़ी जनेऊ/यज्ञोपवीत भगवान शिव और गणेश जी को चढ़ाए और मां पार्वती को एक हरी साड़ी, सुहाग का 16 श्रृंगार सामान से माता पार्वती की पूजा करे। 16 श्रृंगार में सिंदूर, बिंदी, बिछुआ, मेहंदी, चूडियां, महौर, खोल, कुमकुम, कंघी, इत्र शमिल हैं।
इसके अलावा, कलश, अक्षत्, दूर्वा, तेल, घी, कपूर, अबीर, श्रीफल, चंदन, गाय का दूध, गंगाजल, दही, चीनी, शहद और पंचामृत चीजें भी हरियाली उपवास पूजा के लिए आवश्यक है।
उपवास और पूजा अर्चना के साथ ही सावन मस्ती का महीना भी है। जिसमे तीज पर लड़कियां और महिलाएं झूला भी झूलती है। इसके लिए किसी वृक्ष या गैलरी में झूला डालकर उन्मुक्त हवाओ की सैर करती है। सावन के लोकगीत भी बहुत चर्चित है जिन्हें गाकर भारतीय संस्कृति को जिंदारखने की कोशिश की जाती है। हरियाली तीज पर प्रायः रिमझिम बरसात रहती है। बारिश की फुहारों के साथ सावन के झूले आनन्ददायक बन जाते है। लेकिन अब झूले भी अतीत बनकर रह गए है।
सावन के महीने का खास व्यंजन घेवर है। जिसे खाने का अलग ही मजा है। इस माह मंदिरों व अन्य धार्मिक स्थलों पर भागवत की कथाएं भंडारे होते रहते हैं। विवाहित महिलाएं अपने मायके जाकर यह त्यौहार मनाती हैं तो नवविवाहिताओं को सिंधारा भेजा जाता है। सावन का महीना भगवान शिव की स्तुति का खास अवसर है। सावन माह में प्रकृति भी हरियाली की चादर ओढ़ लेती है। तब हर किसी के मन में उन्मुक्तता की खुशी झलकती हैं|
यह आस्था, सौंदर्य और प्रेम का उत्सव है।चारों तरफ हरियाली होने के कारण इसे हरियाली तीज कहते हैं| इस अवसर पर महिलाएं झूला झूलती हैं, गाती हैं और खुशियां मनाती हैं|महिलाएं इस दिन ‘उमामहेश्वरसायुज्य सिद्धये हरितालिका व्रतमहं करिष्ये’ मंत्र का जाप करती है| इस व्रत को पूर्ण निष्ठा से करने पर प्रत्येक स्त्री को वांछित फल मिलता है| भगवान शिव ने पार्वती जी को वरदान दिया था कि इस व्रत को जो भी स्त्री पूर्ण श्रद्धा से करेंगी उसे तुम्हारी तरह अचल सुहाग की प्राप्ति होगी|तीज के अवसर पर विवाहिताए अपने मायके जाना चाहती हैं ।एक गीत भी है, ‘बहुत दिना हो गए पिया मोय, सावन शुगन मनाऊंगी, भैया आयो मोय लिवावे, मैं पीहर कू जाऊंगी।’वही ‘कच्चे नीम की निबौरी, सावन जल्दी अईयो रे, अम्मा दूर मत दीजौ, दादा नहीं बुलावेंगे, भाभी दूर मत दीजौ, भइया नहीं बुलावेंगे।’सावन में खूब गुनगुनाया जाता है।
गांव में झूले पर झूलती हुई लड़कियों को देखकर उनके मन की उन्मुक्तता का अहसास होता है। लड़कियां पेड़ व मुंडेरों पर बैठी हुई चिड़ियों को देखकर अपने मन के भाव को कुछ यूं प्रकट करती हैं ,’पेड़ पै दो चिड़ियां चूं-चूं करती जाएं, वहां से निकले हमारे भइया, क्या-क्या सौदा लाए जी, मां को साड़ी, बाप को पगड़ी और लहरिया लाए जी, बहन की चुनरी भूल आए, सौ-सौ नाम धराए जी।’सावन के लोकगीत के संवाद भी निराले है,” हे री काहे की तेरी मात, काहे के तेरे वीर, तू झूले अपने सासरे री।” झूला झूलती महिलाओं में कोई लंबी पीगें बढाती है तो कोई झोंटा देकर उन्हें हवा में उछालती हैं। महिलाएं गाती हैं, “झूला तो पड़ गए अमुआं की डार पै ।”तीज पर राधा-कृष्ण को भी कुछ इस तरह याद किया जाता है ,
“आया सावन, बड़ा मन भावन, रिमझिम सी पड़े फुहार, राधा झूल रही कान्हा संग,दिल हुआ बाग बाग।”सच मे सावन और उसमें भी तीज महिलाओं की खास खुशी व साधना का पर्व है।जिसमे महिलाओं की भक्ति, गायन,उन्मुक्तता साफ झलकती है।यह परंपरा जीवित रहे तभी भारतीय संस्कृति, संस्कार जिंदा रह सकते है।
डॉ श्रीगोपाल नारसन एडवोकेट
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