Monday, May 27, 2024
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खाप पंचायतें करती रही हैं सामाजिक सुरक्षा

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RAVIWANI


खाप पंचायत को लेकर अक्सर मान्यता रहती है कि खाप पंचायत सिर्फ जाटों की होती है। लेकिन ऐसा नहीं है खाप पंचायत अधितकर गोत्र आधारित होती है। ऐसे में, अलग-अलग जातियों के लोग खाप का हिस्सा होते हैं। साल 1950 में पश्चिमी यूपी के मुजफ्फरनगर जिले के सौरम गांव में आजादी के बाद हुई पहली सर्व खाप पंचायत में बीनरा निवासी चौधरी जवान सिंह गुज्जर इसके प्रधान थे और गांव पुनियाला के ठाकुर यशपाल सिंह उप-प्रधान थे, जबकि गांव सोरम के चौधरी कबूल सिंह इसके मंत्री थे। तीन पदाधिकारियों में, चौधरी कबूल सिंह एक मात्र जाट थे। लेकिन आजकल खाप पंचायतों को सीधा जाटों से जोड़ा जाता है, क्योंकि पिछले कुछ सालों में जाटों का दबदबा पंचायतों में बढ़ा है।

खाप शब्द शक भाषा के शब्द खतप से लिया गया है, जिसका अर्थ है एक विशेष कबीले द्वारा बसा हुआ क्षेत्र। खाप पंचायत पहली बार महाराजा हर्षवर्धन के काल में 643 ईस्वी में अस्तित्व में आई थी। लेकिन माना जाता है कि खाप का सिद्धांत उस समय से प्रचलन में है, जब लोग घुम्मक्कड़ जिंदगी जीते थे।

बड़े-बड़े समुदायों में लोग एक से दूसरी जगह जाकर रहने लगते थे और वहां गांव बसा लेते थे। गांव के बुजुर्गों में से किसी एक को मुखिया बनाया जाता था और कुछ उनके साथ पंच होते थे, जो फैसलों में उनकी मदद करते थे।

स्वतंत्र भारत में खाप शब्द का प्रयोग पहली बार 1890-91 में जोधपुर की जनगणना रिपोर्ट में किया गया था, जो धर्म और जाति पर आधारित थी। हालांकि, खापों पर अधिक प्रामाणिक डेटा उपलब्ध नहीं है। आरंभ में इस संगठन का नाम यौधेय संगठन था, इसका मुख्यालय मुजफ्फरनगर का सौरम गांव रहा है और इसी गांव से इस संगठन का मंत्री बनता आया है।

सर्वखाप पंचायत के सामाजिक दायित्व का दायरा अत्यंत ही विस्तृत था। यह पंचायत सभी जातियों के सामाजिक और पारिवारिक झगड़ों से लेकर बाहरी ताकतों से क्षेत्र की जनता की रक्षा का महत्वपूर्ण कार्य करती थी। सर्वखाप पंचायत के पास हजारों की संख्या में मल्ल रहते थे। इन मल्लों ने अनेक अवसरों पर सर्वखाप पंचायत के मान-सम्मान और स्वाभिमान की रक्षा की थी।

खाप या सर्वखाप एक सामाजिक प्रशासन की पद्धति है, जो भारत के उत्तर पश्चिमी प्रदेशों यथा राजस्थान, हरियाणा, पंजाब एवं उत्तर प्रदेश में अति प्राचीन काल से प्रचलित है। दरअसल, ये पारंपरिक पंचायतें हैं जिन्हें एक गोत्र या फिर एक बिरादरी के लोग, कई गोत्रों के लोग या एक गोत्र के कई गांव मिलकर बना सकते हैं। खाप एक गोत्र के पांच गांवों की हो सकती है या फिर 50 से भी ज्यादा गांवों की हो सकती है।

हालांकि, खाप पंचायतों को कोई भी आधिकारिक या सरकारी स्वीकृति नहीं मिली हुई है, लेकिन समाज पर नियंत्रण के लिए एक व्यवस्था दी। इस व्यवस्था में परिवार के मुखिया को सर्वोच्च न्यायाधीश के रूप में स्वीकार किया गया है। जिसकी सहायता से प्रबुद्ध व्यक्तियों की एक पंचायत होती थी।

जाट समाज में यह न्याय व्यवस्था आज भी प्रचलन में है। जब कोई समस्या जन्म लेती है, तो सर्व प्रथम सम्बंधित परिवार ही सुलझाने का प्रयास करता है। यदि परिवार के मुखिया का फैसला नहीं माना जाता है तो इस समस्या को समुदाय और ग्राम समाज की पंचायत में लाया जाता है।

दोषी व्यक्ति द्वारा पंचायत फैसला नहीं माने जाने पर ग्राम पंचायत उसका हुक्का-पानी बंद करने, गांव समाज निकाला करने, लेन-देन पर रोक लगाने आदि का हुक्म जारी करती है। यदि समस्या गोत्र से जुड़ी हो तो उसके लिए गोत्र पंचायत होती है, जिसके माध्यम से दोषी को घेरा जाता है।

प्राचीन काल में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले का व्यक्ति ही इस पंचायत का महामंत्री हुआ करता था। गुलामी के समय में भी सबसे बडी खाप पंचायत मुजफ्फरनगर के गांव सोरम की चौपाल में ही हुआ करती थी। सर्वखाप का उदय पश्चिमी उत्तर प्रदेश और हरियाणा की खाप पंचायतों से मिलकर हुआ है। खाप पंचायतों ने देश में कई बडी पंचायतें की हैं और समाज तथा देश के हित में महत्वपूर्ण निर्णय लिए हैं।

इन पंचायतों ने दहेज लेने और देने वालों को बिरादरी से बाहर करने और छोटी बारात लाने जैसे फरमान जारी किए तथा जेवर और पर्दा प्रथा को खत्म किए जाने जैसे सामाजिक हित के निर्णय भी लिए। युद्ध के समय में भी खाप पंचायतों ने देशभक्ति की मिसाल कायम की है और प्राचीन काल में युद्ध के दौरान राजाओं और बादशाहों की मदद की है।

वैसे देखा जाए तो देश में परिवार की इज्जत के नाम पर कत्ल की पुरानी परम्परा रही है। हरियाणा, पंजाब, राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश इनमें सबसे आगे हैं। आनर किलिंग के ज्यादातर मामलों में लड़के और लड़की का एक ही गोत्र/सगोत्र में विवाह करना भी एक कारण रहा। अंतर्ज़ातीय प्रेम विवाह इस अपराध की दूसरी वजह रही।

वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो एक गोत्र में विवाह से विकृत संतान के जन्म लेने की आशंका रहती है लेकिन इससे पंचायतों को यह अधिकार तो नहीं मिल जाता कि वह अपने फरमान से प्रेमी युगल को इतना विवश कर दें कि वह आत्महत्या के लिए मजबूर हो जाए या समाज उन्हें इज्जत के नाम पर मौत के घाट उतार दे।

संवेदनशील सामाजिक मुद्दा होने के कारण सरकार इन मामलों में हस्तक्षेप करने से कतराती रही है। लेकिन अब खाप पंचायतें भी इस संदर्भ में कानून की जरूरत महसूस कर रही हैं। इसीलिए वे राजनीतिक दलों पर दबाव बनाकर सरकार से गुजारिश कर रही हैं कि वह इस सन्दर्भ में कानून में बदलाव लाए।

खाप पंचायत को लेकर अक्सर मान्यता रहती है कि खाप पंचायत सिर्फ जाटों की होती है। लेकिन ऐसा नहीं है खाप पंचायत अधितकर गोत्र आधारित होती है। ऐसे में, अलग-अलग जातियों के लोग खाप का हिस्सा होते हैं।

साल 1950 में पश्चिमी यूपी के मुजफ्फरनगर जिले के सौरम गांव में आजादी के बाद हुई पहली सर्व खाप पंचायत में बीनरा निवासी चौधरी जवान सिंह गुज्जर इसके प्रधान थे और गांव पुनियाला के ठाकुर यशपाल सिंह उप-प्रधान थे, जबकि गांव सोरम के चौधरी कबूल सिंह इसके मंत्री थे। तीन पदाधिकारियों में, चौधरी कबूल सिंह एक मात्र जाट थे। लेकिन आजकल खाप पंचायतों को सीधा जाटों से जोड़ा जाता है क्योंकि पिछले कुछ सालों में जाटों का दबदबा पंचायतों में बढ़ा है।

खाप पंचायतें मुख्य रूप से तीन काम करती हैं: पहला-सदस्यों के बीच विवादों को निपटाने का, दूसरा-यह धार्मिक विश्वास के रक्षक के रूप में कार्य करती थीं और तीसरा-पंचायत पर खाप क्षेत्र को बाहरी आक्रमण से बचाने की जिम्मेदारी थी। परंपरागत रूप से छोटे मुद्दों पर खाप पंचायतों द्वारा चर्चा की जाती है लेकिन अगर कोई बड़ी समस्या है तो एक ‘सर्व खाप पंचायत (बहु-गोत्र परिषद)’ बुलाई जाती है।

सर्वखाप पंचायत के उद्गम से लेकर वर्तमान लेकर अब तक कुल 25 महामंत्री हुए हैं। प्रथम महामंत्री राव राम राणा थे और वर्तमान महामंत्री सुभाष चौधरी हैं। सर्वखाप पंचायत के अध्यक्ष देश के कई भागों से आए थे, किंतु महामंत्री सौरम गांव के बालियान गोत्रीय ही रहे हैं।

अब्बासी खलीफाओं के कुल में और बगदाद नगर में पैदा हुए सूफी सन्त हजरत गरीब शाह सन् 1510 में शोरम में आकर रहने लगे थे। ये इतने प्रसिद्ध संत हुए कि दूर-दूर से अनेकों बादशाह और बड़े-बड़े अधिकारी उनके दर्शन करने के लिए इस गांव में आया करते थे।

1551 में उनकी मृत्यु के सात वर्ष बाद बादशाह बाबर उनकी कब्र पर श्रद्धा पुष्प अर्पित करने आया था। उसने सौरम गांव की यात्रा के वृतांत में लिखा था-‘यहां जाटों की खापों के चौधरी मुझसे आकर मिले। सौरम के चौधरी रामराय ने इसका इंतजाम किया था।

मैंने जाटों को देखा। जाट कौम निहायत ही ईमानदार और पाकीजा ख्याल है। इनके अखलाक बहुत ही ऊंचे हैं। ये लोग हकपरस्त हैं। गांव में हिंदू-मुसलमान मेलजोल से रहते हैं…मैंने सर्वखाप पंचायत के पंचों को देखा था। जो सच्चे इंसाफपरस्त और अपने कोल फैल के पाबन्द हैं। सर्वखाप पंचायत के मल्ल योद्धा और पंच मुल्क हिंद की सब से बड़ी शख्सियत हैं।

इस वास्ते मैं बालियान खाप के गांव सौरम के वजीरों का और खापों के पंचों का शुक्रगुजार हूं और सौरम के चौधरी को एक रुपया इज्जत का और एक सौ पच्चीस रुपये पगड़ी के भेंट जिंदगी भर देता रहूंगा।’ सर्वखाप पंचायत के पंच मंडल के एक सदस्य चौधरी नाथाराम ने बादशाह अकबर के दो पुत्रों को आरम्भिक शिक्षा दी थी।

अकबर, जहांगीर व शाहजहां ने सर्वखाप पंचायत के महत्व को स्वीकार किया था।
अंग्रेज सरकार में लार्ड मैकाले ने सर्वखाप पंचायत पर रोक लगा दी थी। फलस्वरूप 1947 तक खुले रूप में पंचायत का आयोजन नहीं हो सका। सन 1924 में बैसाखी अमावस्या को सौरम गांव में सर्वखाप की पंचायत हुई थी, जिसमें सौरम के चौधरी कबूल सिंह को सर्वखाप पंचायत का सर्वसम्मति से महामंत्री नियुक्त किया था।

डॉ. यशपाल सिंह


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