Saturday, February 21, 2026
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अमृतवाणी: खोटा सिक्का 

एक दिन एक महात्मा किसी राजा के दरबार में बैठे हुए थे। ठीक उसी समय महात्मा जी का एक शिष्य वहां आया और रुआंसा होकर कहने लगा, यहां के दुकानदार तो बहुत ही खराब हैं। जब मैं एक सिक्का लेकर सामान खरीदने गया तो उन्होंने कहा कि तुम्हारा सिक्का खोटा है, इसलिए तुम्हें यहां सामान नहीं मिल सकता। तुम महात्मा जी के शिष्य हो, इसलिए छोड़े देते हैं अन्यथा तुम्हें हम दंड दिलाकर ही रहते। राजा भी उसकी यह बात सुन रहा था। उसने सिक्का अपने हाथ में लेकर देखा और पूछा, यह सिक्का तुम्हें किसने दिया है? क्या तुम्हें मेरे कानून का पता नहीं है। यह तो सचमुच खोटा है और खोटा सिक्का चलाने वाले को मैं सख्त दंड देता हूं। मैं जानता हूं कि तुमने यह नहीं बनाया होगा, पर बताओ यह सिक्का किसने दिया? राजा की बात पर शिष्य डर गया। उसने महात्मा की ओर देखा। इस पर महात्मा ने राजा की बात को रोकते हुए कहा, यह सिक्का खोटा है तो क्या हुआ, इस पर राजा की छाप तो बनी ही है। राजा ने कहा, मैं और कुछ नहीं जानता। बस, मेरा सिक्का सच्चा होना चाहिए। मेरी छाप होने पर भी खोटा सिक्का बनाना और चलाना मेरे राज्य में बहुत बड़ा अपराध है। इस पर महात्मा बोले, राजन, आपका शासन अन्याय से पूरी तरह मुक्त नहीं है। आप निरपराध को सजा देते हैं। युद्ध के नाम पर रक्तपात करते हैं। ऐसा करना क्या खोटा सिक्का चलाने के समान अपराध नहीं है? राजा महात्मा की बात को तुरंत समझ गया। उसने पूछा, तब फिर मुझे अब क्या करना चाहिए। महात्मा बोले, तुम्हें शासन ठीक ढंग से करना चाहिए। जब ऐसा हो जाएगा, तभी तुम्हारे शासन में खोटा सिक्का खत्म हो सकेगा।

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