
जनादेश 2024 तो जरूर आ चुका है परन्तु ‘षड़यंत्रकारी एक्जिट पोल’ की हवा निकलने के बाद आए आश्चर्यचकित करने वाले इस जनादेश ने खास तौर पर उन लोगों के मुंह का स्वाद बिगाड़ कर रख दिया है जो ‘अबकी बार 400 पार’ जैसे फर्जी नारों और गोदी मीडिया द्वारा प्रचारित झूठे एक्जिट पोल में दिखाई गई मोदी के नेतृत्व में भाजपा की धमाकेदार वापसी की पूरी उम्मीद लगाए बैठे थे। एक चैनल ने तो अपने एक्जिट पोल में एनडीए को 400 पार करा भी दिया था। परंतु भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में इस बार के परिणाम कुछ ऐसे आए हैं कि एनडीए बहुमत के आंकड़ों को पार करने के बावजूद विलाप कर रहा है, जबकि बहुमत के आंकड़ों से दूर रहने के बाद भी विपक्षी गठबंधन में जश्न का माहौल है। चुनाव परिणाम जो भी हों, लेकिन परिपक्व राजनीति का तकाजा तो यही है कि भारतीय लोकतंत्र में जनमत चाहे जो भी हो जैसा भी हो उस का सम्मान किया जाना चाहिए व उसे विनम्रतापूर्ण स्वीकार किया जाना चाहिए। इस बार के चुनाव परिणामों के बाद खासतौर पर कुछ विशेष सीटों पर मिली पराजय या उनके अप्रत्याशित नतीजों के बाद पराजित पक्ष के लोगों ने अपना गुस्सा मतदाताओं पर निकालना शुरू कर दिया है। कई पराजित लोग तो मतदाताओं के निर्णय की खुलकर आलोचना कर रहे हैं। इनमें सबसे अधिक व तीखी प्रतिक्रिया फैजाबाद संसदीय सीट को लेकर सुनाई दी। इसी लोकसभा सीट के अन्तर्गत अयोध्या विधानसभा क्षेत्र भी आता है, जहां निर्मित राम मंन्दिर को लेकर भारतीय जनता पार्टी न केवल फैजाबाद, न केवल उत्तर प्रदेश, बल्कि पूरे देश के मतदाताओं से यह आस लगाए बैठी थी कि इसी वर्ष 22 जनवरी को हुए राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा के बाद उसे ऐतिहासिक बहुमत हासिल होगा। इसी सीट से लल्लू सिंह जो बाल्य्काल से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े हैं तथा पांच बार अयोध्या से विधायक और दो बार फैजाबाद लोकसभा सीट से ही लोकसभा का चुनाव भी जीत चुके हैं, तीसरी बार भी बड़े ही आत्मविश्वास के साथ इसी लोकसभा सीट से चुनाव मैदान में थे। लेकिन यहा के मतदाताओं ने एक अप्रत्याशित जनादेश देते हुए इंडिया गठबंधन के संयुक्त प्रत्याशी अवधेश प्रसाद को 54, 567 मतों से जिता दिया।
केवल अयोध्या ही नहीं बल्कि चित्रकूट, मेहंदीपुर बालाजी, सलासर धाम जैसी और भी अनेक धर्म नगरियां हैं, जहां भाजपा ‘धर्म ध्वजा’ के सहारे जीत हासिल करना चाहती थी परंतु ऐसे सभी क्षेत्रों से भाजपा प्रत्याशियों को शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा है। हद तो यह है कि स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जिन्होंने स्वयं को ‘अवतारी’ होने का भ्रम पाल रखा था और 2019 के चुनाव में काशी से ही 4 लाख 71 हजार के अंतर से जीत हासिल की थी वे इस बार कांग्रेस के प्रत्याशी अजय राय को मात्र 152513 मतों से ही पराजित सके। जबकि ऐतिहासिक रोड शो, प्रेस कॉन्फ्रÞेंस और गंगा में क्रूज यात्रा जैसी शोबाजियों के सहारे वे इस बार 10 लाख से अधिक मतों से जीतने का सपना देख रहे थे। राजनैतिक विश्लेषकों का तो यहां तक कहना है कि यदि कांग्रेस ने मोदी के मुकाबले प्रियंका गांधी को उतारा होता तो शायद इस बार वे प्रधानमंत्री बनना तो दूर सांसद भी नहीं बन पाते।
ठीक इसके विपरीत कांग्रेस समाजवादी गठबंधन ने उत्तर प्रदेश में वह धमाका कर दिया जिसकी शायद इंडिया गठबंधन को भी उम्मीद नहीं थी। यहां इण्डिया गठबंधन ने 42 सीटों पर जीत हासिल की। उधर भाजपा द्वारा ‘पप्पू’ प्रचारित किए गए राहुल गांधी जहां वायनाड से 3.64 लाख वोटों से जीते वीं, उन्होंने उत्तर प्रदेश के मंत्री बीजेपी के प्रत्याशी दिनेश प्रताप सिंह को रायबरेली से 3.90 लाख वोटों से पराजित किया। उपरोक्त जनादेश निश्चित रूप से न केवल मंहगाई, बेरोजगारी, सांप्रदायिकता तथा धर्म के नाम पर समाज को विभाजित कर जन सरोकार के मूल मुद्दों से जनता जनार्दन का ध्यान भटकाकर उसे धार्मिक भावनाओं में उलझाकर रखने के विरुद्ध था, बल्कि यह जनादेश जनता द्वारा सत्ता का घमंड चूर कर देने के लिए भी था। जनता के हाथों अपनी मुंह की खाने वाले भाजपाइयों को जो 400 पार और 370 पार जैसे नारों में जी रहे थे, उन्हें यह जनादेश कतई नहीं भाया। इसलिए पराजित उम्मीदवारों ने भी मतदाताओं को ही गरियाना शुरू कर दिया।
अयोध्या-फैजाबाद के मतदाताओं को तो इतना कोसा गया व उनके लिए ऐसी अभद्र भाषा का प्रयोग किया गया, मानो इस लोकसभा सीट की भाजपा ने अपने नाम ‘रजिस्ट्री’ ही करा ली थी, जिसे जनता ने छीन लिया। आखिर अयोध्या की जनता ने किन कारणों से यह जनादेश दिया? रायबरेली की जनता के हाथों पराजित भाजपा उम्मीदवार दिनेश प्रताप सिंह तो अपनी शर्मनाक पराजय से रायबरेली के मतदाताओं से इतना आग बबूला हुये कि उन्होंने घोषणा कर दी कि वे ‘एक वर्ष के अवकाश पर रहेंगे और रायबरेली की जनता का कोई काम ही नहीं करेंगे। जिसे काम कराना हो वह राहुल गांधी के पास ही जाए।’ इसी तरह सांप्रदायिकतावादी भाजपा के सपने टूटने के लिए कहीं मुस्लिम मतदाताओं को जिम्मेदार ठहराते हुए अपशब्द कह रहे हैं, तो कहीं दलितों व पिछड़ों को गालियां रहे हैं। सवाल यह है कि क्या देश का मतदाता किसी भी दल या राजनेताओं का गुलाम है जो उनकी इच्छाओं के अनुरूप ही मतदान करे? क्या यह जरूरी है कि सांप्रदायिकतावादियों की नजरों में जो सबसे जरूरी विषय हो मतदाता भी उसे वैसी ही प्राथमिकता दें? भाजपाई नेताओं को मतदाताओं को गरियाने के बजाय आत्म मंथन ही करना चाहिए। मतदाताओं को कोसना व गालियां देना जनता का अपमान है।


