
मानव सभ्यता और नदी का रिश्ता आदिकाल से चला आ रहा है। अनेक सभ्यताएं नदियों के किनारे पुष्पित पल्लवित हुई और विनाशकारी बाढ़ से नेस्तनाबूद हो गई। समय के साथ लोगों ने बाढ़ से बचने के लिए अनेक उपाय खोज लिए। यूरोप के देशों ने इस समस्या से निजात पाने के लिए पुख्ता इंतजाम किए हैं। ऐसे समय में जब देश के कई प्रांत बाढ़ की भारी विभीषिका झेल रहे हैं। कई स्थानों पर पुल बह गए सड़कें टूट गई और घर क्षतिग्रस्त हो गए। जान-माल की अच्छी-खासी क्षति भी हुई। पंजाब और हरियाणा में नदियों में पानी का स्तर अचानक बढ़ गया और बांधों में जमा पानी छोड़ना पड़ा। तब भारत विश्व के अनेक देशों के अनुभवों से बाढ़ प्रबंधन के प्रभावी तरीके सीख सकता है।
करीब ढाई दशक पहले, 2002 में जब यूरोप में बाढ़ आई तो यूरोपीय संघ के देशों के प्रतिनिधि कोपेनहेगन में एकत्र हुए। नॉर्वे और स्विट्जरलैंड यूरोपीय संघ का हिस्सा नहीं है, लेकिन उन्हें भी आमंत्रित किया गया। वे देश, जो तब तक ईयू के सदस्य नहीं बने थे लेकिन बनने के आकांक्षी थे, उन्हें भी बुलाया गया। ध्यान देने लायक बात यह है कि इन यूरोपीय देशों ने अपने-अपने देशों में जल प्रबंधन का मुकम्मल इंतजाम कर रखा है। इन देशों ने अपने यहां इस काम के लिए कर्मचारी रखे हैं, जिन्हें ‘वाटर डाइरेक्टर’ कहा जाता है। कोपेनहेगन की उस सभा में सभी डाइरेक्टर मौजूद थे। इस बात पर आम सहमति बनी कि बाढ़ की भविष्यवाणी, सावधानियों और बाढ़ के बाद की स्थिति से निपटने के लिए गंभीर स्तर पर योजना बनाई जाए। इसलिए फ्रांस और नीदरलैंड के प्रतिनिधियों ने मिलकर एक विशेषज्ञ समूह बनाया। इस समूह ने एक दस्तावेज तैयार जिसका नाम ‘बेस्ट प्रैक्टिस डॉक्यूमेंट’ रखा गया। 2003 में इन सभी प्रतिनिधियों की बैठक ग्रीस में पुन: आयोजित हुई, जहां यह दस्तावेज पेश किया गया।
यह दस्तावेज यानी बेस्ट प्रैक्टिस डॉक्यूमेंट मौजूदा समय में दुनिया में बाढ़ को लेकर एक बड़ा और अहम दस्तावेज है। इसे जीवित दस्तावेज भी कहा जाता है, क्योंकि आवश्यकतानुसार इसमें लगातार संशोधन होता रहता है। इस डॉक्यूमेंट के मुख्यत: तीन भाग हैं। पहले भाग में, प्रक्रिया और बुनियादी सिद्धांत तय किए गए हैं। द्वितीय भाग में सिद्धांतों और प्रक्रियाओं को अमली जामा पहनाने के उपायों को सुझाया गया है। तीसरे भाग में परिणाम बयान किए गए हैं। उनतीस पृष्ठों के इस दस्तावेज में बाढ़ जैसी प्रकृतिक आपदा पर काबू पाने के लिए जो कुछ सुझाया गया है उसकी मदद से यूरोप में बाढ़ पर काफी हद तक नियंत्रण पा लिया गया है। इनमें जिन पहलुओं पर ध्यान दिया गया है उनको भारत जैसे देश अपना कर इस संकट से निजात पाने की कोशिश कर सकते हैं।
यूरोपीय संघ ने जो ‘साझी जिम्मेदारी और साझा हित’ का बुनियादी सिद्धांत तय किया। इसके मुताबिक बाढ़ के बारे में जितने भी प्रयास किए जाएंगे उसमें स्थानीय, क्षेत्रीय, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सभी संबंधित क्षेत्र जरूर शामिल होंगे। बाढ़ का मुकाबला करने के लिए जापान ने आश्चर्यजनक प्रणाली बनाई है। उन्होंने इस काम को तीन स्तरों पर किया। पहला राष्ट्रीय स्तर पर जिसका जिम्मा सरकार ने लिया; दूसरा स्थानीय स्तर पर जिसके लिए स्थानीय संगठनों और संस्थाओं को काम पर लगाया गया; और तीसरे स्तर पर व्यक्तिगत पर लोगों को सजग किया गया। सरकार ने बड़े कामों—आवश्यक इनफ्रास्ट्रक्चर विकसित करने—का जिम्मा ले लिया। इसने नदियों के किनारे ऊंचे तटबन्ध बनाए।
शहरी क्षेत्रों में जल निकासी की व्यवस्था को मजबूत बनाया। ड्रेनेज के लिए लिए पंप स्टेशन स्थापित किए। लोगों को बाढ़ के बारे में जागरूक किया कि जब बाढ़ सिर पर आ जाए तो आबादी क्या करे और खत्म होने पर वापसी कैसे हो। स्वयंसेवी समूह को व्यवस्थित किया, प्रशिक्षण कैसे दिया। बाढ़ उतरने के बाद बहाली के काम को सशक्त बनाया। वित्तीय और भौतिक सहायता का बेहतर प्रबंध किया। ‘बाढ़ बीमा’ जैसे तरीके अख़्तियार करके सामाजिक और आर्थिक संदर्भ से पीड़ितों में आत्मविश्वास पैदा किया गया।
स्थानीय संगठनों के जिम्मे यह काम लगाया गया कि वे बारिश के पानी का अधिक से अधिक भंडारण करें। बाढ़ को अवशोषित करने के लिए वृक्ष लगाएं। स्थानीय निवासियों को इकट्ठा करके सुधारात्मक उपाय के बारे में चर्चा चर्चा करें। अफवाहों का मुकाबला और स्वयं सेवी संगठनों को प्रबंधित करें। व्यक्तिगत स्तर पर लोगों को प्रशिक्षण दिया गया और समझाया गया कि भूमि की प्रकृति को समझें, आवास के आसपास अधिकतम वृक्षारोपण करें। बाढ़ आने की स्थिति में हर व्यक्ति को बताया गया कि वह क्या करे किधर का रुख करे। घर के उपकरणों कैसे बचाना है और बहुमूल्य वस्तुओं की कैसे रक्षा करनी हैं। बाढ़ के मामलों से निपटने के लिए बकायादा अलग मंत्रालय की स्थापना की गई। यह मंत्रालय साल के बारह महीने और महीने के तीस दिन बाढ़ का मौसम आने से पहले हर संभव तैयारी करता है।
नीदरलैंड भी ऐसा मुल्क है जहां बाढ़ तबाही मचाती थी। वहां की सरकार ने नदियों के तटबंधों अधिक ऊंचा किया। नदियों पानी को विभाजित करने और उसका जोर घटाने के लिए नई नहरें बनार्इं। समुद्र के सामने तटबंध बनाए गए। इस देश ने तटबंधों का ऐसा ऐसा पुख्ता तंत्र विकसित किया कि इससे न केवल जलपरिवहन सुगम हुआ बल्कि बाढ़ आनी बंद हो गयी। आइए उन पांच मुद्दों की चर्चा करते हैं, जो इन ईयू देशों के अनुभव हैं, जिन पर भारत भी अमल करके बाढ़ जैसी विभीषिका पर काफी हद तक काबू पा सकता है। पहला, जिन जिन राज्यों से होकर नदी गुजरती है उन राज्यों के बीच समन्वय होना चाहिए और बाढ़ नियंत्रण हेतु संयुक्त योजना बनाई जानी चाहिए। दूसरे, बाढ़ की समस्याओं के प्रति जनचेतना के जागृति की कोशिश करनी चाहिए और जनभागीदारी को बढ़ाना होगा। साथ में बाढ़ से संबंधित बीमा नीतियां भी बनानी होंगी। तीसरे, एक प्रभावी जल प्रबंधन के साथ-साथ सूचना तंत्र विकसित करना होगा। उल्लेखनीय है कि भारत के जल संसाधन मंत्रालय के अंतर्गत आने वाला केंद्रीय जल आयोग राज्यों में बाढ़ की पहले से चेतावनी देता है। लेकिन हाल ही में पंजाब में आई बाढ़ के बारे में आयोग पहले से कोई जानकारी नहीं दे सका। यह आयोग के नाकाम सूचना तंत्र और कुप्रबंधन को दिखलाता है।
चौथे, हमारे देश में अभी भी आपदा प्रबंधन अपने शैशव काल से गुजर रहा है, इसको विकसित और बेहतर बनाना होगा। जिसके तहत बाढ़ प्रभावित हो सकने वाले क्षेत्रों के बारे में आकलन करना और नुकसान का अग्रिम अनुमान लगा सके। बाढ़ के बाद सरउठाने वाली बीमारियों और प्रदूषण से निपटने के लिए हरसंभव तैयारी करे। पांचवां, अवसंरचना से संबन्धित है। बाढ़ से मुकाबला करने के लिए इनफ्रास्ट्रक्चर को और मजबूत किया जाये—तट बन्ध का नियमित रखरखाव किया जाए। समय की पुकार है कि बाढ़ जैसी विभीषिकाओं से लड़ने के लिए व्यापक तत्परता दिखाई जाए। बाढ़ और आपदा प्रबन्धन तथा आवश्यक इन्फ्रास्ट्रक्चर विकसित किया जाए।

