जनवाणी ब्यूरो |
नई दिल्ली: भारत के प्रतिष्ठित हेयर स्टाइलिस्ट हबीब अहमद का 25 सितंबर को 84 वर्ष की आयु में निधन हो गया। वे केवल बालों की कटिंग करने वाले नाई नहीं थे, बल्कि एक सांस्कृतिक प्रतीक बन चुके थे, जिन्होंने हेयर स्टाइलिंग को पहचान, अभिव्यक्ति और ताकत का माध्यम बना दिया।
उनके निधन की जानकारी उनके बेटे और मशहूर सेलिब्रिटी हेयर स्टाइलिस्ट जावेद हबीब ने इंस्टाग्राम पर साझा की। उन्होंने अपने पिता को श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि, “पापा ने सिर्फ़ बाल नहीं संवारे, उन्होंने कई ज़िंदगियों को आकार दिया।”
विरासत में मिली कैंची और कंघी
हबीब अहमद का जन्म 2 अक्टूबर 1940 को उत्तर प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर के पास जलालाबाद नामक छोटे से कस्बे में हुआ था। उनके परिवार की जड़ें गहरी थी – पेशे में भी और परंपरा में भी। उनके पिता, नज़ीर अहमद, ब्रिटिश भारत के वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो और लॉर्ड माउंटबेटन के निजी नाई रहे, और बाद में स्वतंत्र भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद के व्यक्तिगत हेयर स्टाइलिस्ट के रूप में राष्ट्रपति भवन में सेवाएं दीं।
लंदन से लेकर लाजपत नगर तक
अपने पिता के मार्गदर्शन में पले-बढ़े हबीब को उनके जीवन में एक नया मोड़ तब मिला जब उन्हें बालों की डिज़ाइनिंग की पढ़ाई के लिए इंग्लैंड भेजा गया। वहां से लौटने के बाद उन्होंने भारत में हेयर स्टाइलिंग को केवल सेवा नहीं, बल्कि एक पेशेवर कला के रूप में स्थापित किया। उन्होंने दिल्ली के लाजपत नगर से शुरुआत की और धीरे-धीरे पूरे देश में एक ऐसा नाम बन गए जो सिर्फ़ “हबीब” कहलाने लगा।
‘हबीब, द मैन हू बिल्ट एन एम्पायर’
हबीब अहमद के जीवन और संघर्ष पर आधारित लेखिका हृतु पवार की किताब ‘हबीब, द मैन हू बिल्ट एन एम्पायर’ में बताया गया है कि कैसे उन्होंने भारत में हेयर ड्रेसिंग को एक व्यवस्थित इंडस्ट्री में बदला। उन्होंने न केवल ब्यूटी सैलून की परंपरा को बदला, बल्कि कई युवा हेयर स्टाइलिस्ट्स को प्रशिक्षित कर एक पीढ़ी तैयार की।
एक युग का अंत
हबीब अहमद का जाना न केवल हेयर स्टाइलिंग इंडस्ट्री बल्कि भारत की सांस्कृतिक धरोहर के लिए भी एक अपूरणीय क्षति है। उन्होंने यह दिखाया कि स्टाइल सिर्फ़ दिखावे की चीज़ नहीं, बल्कि आत्मविश्वास और अभिव्यक्ति की भाषा है। उनकी विरासत अब उनके बेटे जावेद हबीब और देशभर के हज़ारों हेयर प्रोफेशनल्स के ज़रिए ज़िंदा रहेगी।

