Wednesday, January 28, 2026
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आजादी के लिए दी शहादत

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आज स्वतंत्रता संग्राम के दौरान लखनऊ के पास काकोरी में अंजाम दिए गये ऐतिहासिक ट्रेन ऐक्शन के तीन क्रांतिकारी नायकों रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाकउल्लाह खां और रोशन सिंह का साझा शहादत दिवस है। दूसरे शब्दों में कहें तो उनकी शहादतों की स्मृतियों को ताजा करने और उनसे प्रेरणा लेने का दिन।

उनके इस ऐक्शन को अपने साम्राज्य के लिए सीधी चुनौती मानकर देश के तत्कालीन ब्रिटिश शासकों ने 1927 में 19 दिसम्बर को यानी आज के ही दिन बिस्मिल को उत्तर प्रदेश की गोरखपुर, अशफाक को फैजाबाद (अब अयोध्या) और रोशन सिंह को मलाका (तत्कालीन इलाहाबाद, अब प्रयागराज) की जेलों में फांसी पर लटकाकर शहीद कर डाला था जबकि ऐक्शन के एक और नायक राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी की सांसें गोंडा जेल में दो दिन पहले 17 दिसम्बर को ही छीन ली थीं।

सुविदित है कि हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन से जुड़े इन क्रान्तिकारियों ने अपने कुछ और साथियों के साथ नौ अगस्त, 1925 को आठ डाउन सहारनपुर लखनऊ पैसेंजर ट्रेन में ले जाया जा रहा सरकारी खजाना काकोरी स्टेशन के पास लूट लिया था। क्योंकि उनका मानना था कि गोरी सरकार ने यह खजाना देशवासियों के चौतरफा शोषण और खुल्लमखुल्ला लूट से इकट्ठा किया है और इसे लूटकर देश की मुक्ति के प्रयत्नों में खर्च करना ही उसका सबसे सार्थक उपयोग है।

शहादत के वक्त, जैसी कि परम्परा है, गोरखपुर जेल में अफसरों द्वारा बिस्मिल से उनकी अंतिम इच्छा पूछी गई तो उनका दो टूक जवाब था : ‘आई विश द डाउनफॉल आफ ब्रिटिश एम्पायर’ यानी मैं ब्रिटिश साम्राज्य का नाश देखना चाहता हूं। शहादत से कुछ ही दिनों पहले उन्होंने उम्मीद भरी पंक्तियां लिखी थीं : मरते बिस्मिल, रोशन, लहरी, अशफाक अत्याचार से / होंगे पैदा सैकड़ों उनके रुधिर की धार से।

इसी कड़ी में फैजाबाद की जेल में अशफाकउल्लाह खां ने (बिस्मिल से जिनकी वैचारिक एकता व दोस्ती को हिंदू मुस्लिम सद्भाव की अद्भुत मिसाल बताया जाता है) कहा था कि उनकी अंतिम इच्छा यह है कि जब उन्हें फांसी पर लटकाया जाए तो उनके वकील फांसी घर के सामने खड़े होकर देखें कि वे कितनी खुशी और हसरत से उसके फंदे पर झूल रहे हैं। बिस्मिल और अशफाक में एक और समान बात यह थी कि दोनों शायर थे और गजलें कहते थे। बिस्मिल ने तो अनेक किताबें भी लिखी थीं। इनमें ग्यारह उन्होंने खुद छपवार्इं और उनकी बिक्री से एकत्र धन से क्रांति कर्म के लिए हथियार खरीदे थे। गोरी सरकार को यह बात नागवार गुजरी तो उसने ये सारी किताबें जब्त कर ली थीं। उनकी आत्मकथा, जिसे वे अपनी शहादत से कुछ दिन पहले तक लिखते रहे थे, बाद में प्रकाशित हुई थी।

अशफाक की बात करें तो वे बिस्मिल की गिरफ्तारी के बाद भी अरसे तक गोरी पुलिस के शिकंजे से बचे रहे थे और बचे रहने के लिए कभी नेपाल, कभी कानपुर तो कभी बनारस भागते फिर रहे थे। बनारस से छिपते-छिपाते वे झारखंड स्थित मेदिनीनगर (तब डाल्टनगंज) पहुंचे तो अपनी पहचान छुपाकर वहां दस महीने रहे थे। दरअसल, हुआ यह कि काकोरी ट्रेन ऐक्शन के डेढ़ महीने बाद 26 सितम्बर, 1925 की रात गोरी पुलिस समूचे उत्तर भारत में संदिग्धों के घरों व ठिकानों पर अभियान के तौर पर छापे मारती व धर-पकड़ करती अशफाक के शाहजहांपुर स्थित घर पहुंची तो उन्होंने खुद को घर से थोड़ी दूर स्थित एक गन्ने के खेत में छिपाकर उसकी निगाहों से बचा लिया। हालांकि इससे पहले उनके दोस्त रामप्रसाद बिस्मिल मुखबिरों व गद्दारों के चलते पुलिस के हत्थे चढ़ चुके थे और उन्हें सलाखों के पीछे भेजा जा चुका था।
इसके बाद यह बात कोई रहस्य नहीं रह गयी थी कि अशफाक घर पर ही बने रहे तो बहुत दिनों तक खैर नहीं मना सकेंगे।

पुलिस दोबारा-तिबारा दबिश देगी और जब तक उनको धर नहीं दबोचेगी, चैन नहीं लेगी। इसलिए वे पहले तो अपने घर से गुपचुप नेपाल चले गये और कुछ दिनों बाद लौटे तो भी घर जाने के बजाय कानपुर में ह्यप्रतापह्ण के सम्पादक गणेशशंकर विद्यार्थी के यहां शरण ले ली। विद्यार्थी जी का घर उन दिनों स्वतंत्रता संघर्ष में मुब्तिला प्राय: सारे सेनानियों का अघोषित अड्डा हुआ करता था। बाद में विद्यार्थी जी ने उनको बनारस भेज दिया, जहां से वे चोरी-छिपे तत्कालीन बिहार के पलामू अंचल में स्थित डाल्टनगंज चले गए। प्रसंगवश, तब झारखंड नहीं बना था और डाल्टनगंज बिहार का हिस्सा हुआ करता था। उसका यह नाम 1861 में छोटा नागपुर के कमिश्नर कर्नल डाल्टन के नाम पर रखा गया था, जिसे बदलकर अब राजा मेदिनी राय के नाम पर मेदिनीनगर कर दिया गया है।

बहरहाल, डाल्टनगंज में अशफाक ने अपना एक छद्मनाम रख लिया और पलामू जिला परिषद के एक इंजीनियर के अधीन एक छोटी-सी नौकरी करने लगे। वे खुद को मथुरा का कायस्थ बताया करते थे और लोग उन्हें ‘लाला जी’ कहा करते थे। फरारी के दिन काटते हुए वहां उन्होंने बंगला भाषा भी सीखी और बंगला के गीत गाना भी। दिलचस्प यह कि वे जिस इंजीनियर की नौकरी करते थे, वह शायरी का शौकीन था और उसने यह जानने के बाद कि अशफाक ‘हसरत वारसी’ उपनाम से शायरी भी करते हैं, उनका वेतन बढ़ा दिया था। शायरी की एवज में उन्हें मिली यह वेतनवृद्धि इस अर्थ में अनूठी थी कि उनकी अनेक रचनाएं अभी भी समुचित मूल्यांकन की मांग कर रही हैं।

यहां यह भी गौरतलब है कि इससे पहले पंजाब के क्रांतिकारी लाला केदारनाथ सहगल के देश से बाहर शरण दिलाने के प्रस्ताव को अशफाक ने यह कहकर ठुकरा दिया था कि ‘मैं देश से भागना नहीं, बल्कि देशवासियों के साथ रहकर आजादी के लिए लड़ना चाहता हूं।’ लेकिन डाल्टनगंज में उनका राज बहुत दिन राज नहीं रह सका। क्योंकि वे वहां भी गुप्त रूप से क्रांतिकारियों को संगठित करने में भी लगे रहते थे। बताते हैं कि उस समय पलामू क्रांतिकारियों का गढ़ हुआ करता था। दस ही महीने बीते थे कि उनका भेद खुल गया और फिर लड़ने के संकल्प के साथ वे दोबारा विद्यार्थी जी के पास कानपुर आ धमके।

विद्यार्थी जी ने पुलिस से दूर रखने के लिए उन्हें भोपाल भेज दिया, लेकिन वहां टिकने के बजाय वे दिल्ली चले गए और अपने जिले शाहजहांपुर के एक पुराने दोस्त के घर पर रहने लगे, जहां उसके विश्वासघात के शिकार हो गए। इस दोस्त ने उनकी गिरफ्तारी के लिए घोषित इनाम के लालच में धोखे से उन्हें पकड़वा दिया, जिसके बाद काकोरी ऐक्शन में शामिल होने को लेकर उन पर पूरक मुकदमा चलाया गया (उनके पहले गिरफ्तार साथियों पर अलग से मुकदमा चल रहा था।) और फांसी की सजा सुना दी गई।

हां, यह बताये बगैर बात अधूरी रह जायेगी कि इलाहाबाद (अब प्रयागराज) की मलाका जेल में शहीद किए गये रोशन सिंह को जिन्दादिली के बगैर जिन्दगी ही बेकार लगती थी। उन्होंने कहा था : जिन्दगी जिंदादिली को मान ऐ रोशन/ वरना कितने ही यहां रोज फना होते हैं। शहीदों को शत शत नमन

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