Monday, September 20, 2021
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HomeINDIA NEWSजानिए, इस्लामिक स्टेट आतंकी समूह का मकसद !

जानिए, इस्लामिक स्टेट आतंकी समूह का मकसद !

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जनवाणी ब्यूरो |

नई दिल्ली: आतंकवाद से इस वक्त पूरी दुनिया जूझ रही है। फिलहाल इन आतंकी गतिविधियों का गढ़ बना है अफगानिस्तान। जहां गुरुवार को ही काबुल एयरपोर्ट के बाहर दो बड़े बम धमाके हुए। इनमें अब तक कम से कम 40 लोगों के मारे जाने की खबर है, जबकि सैकड़ों घायल हुए हैं।

इस हमले के पीछे इस्लामिक स्टेट-खोरासान (आईएस-के) को माना जा रहा है, जिसका प्रभाव अमेरिका के अफगानिस्तान से जाने के बाद लगभग तय है। तालिबान ने भी दावा किया है कि एयरपोर्ट की सुरक्षा में खड़े उसके कुछ लड़ाकों को चोटें आई हैं।

ऐसे में कई जगह सवाल हैं कि आखिर जब तालिबान और आईएस दोनों ही आतंकी संगठन हैं, तो इन दोनों में क्या फर्क है और इस्लामिक जगत में इनके मकसद कितने अलग हैं।

आइए जानते हैं कितने अलग हैं अफगानिस्तान के आतंकी संगठन…

इस्लामिक स्टेट: तालिबान की कमजोरी से नाराज खूंखार आतंकियों का संगठन

आईएस का मतलब है इस्लामिक स्टेट। इस आतंकी संगठन का जन्म हुआ था इराक और सीरिया में। 2014 में इराक के मोसुल में कब्जा करने के बाद इस संगठन ने जमकर कहर बरसाया और यूरोप में कई हमलों को अंजाम दिया। 2014 में बेल्जियम से लेकर, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, अमेरिका और फ्रांस तक आतंकी हमलों में इस संगठन का नाम आया।

इसलिए इसका शुरुआती नाम इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड सीरिया (आईएसआईएस) पड़ा। हालांकि, इस संगठन ने पूरे यूरोप से लेकर अमेरिका, ब्रिटेन, एशिया और भारत के करीब अफगानिस्तान से लेकर श्रीलंका तक में दहशत फैलाई। इस संगठन के सरगना आतंकी अबु-बकर अल बगदादी ने संगठन का लक्ष्य इस्लामी जगत में खिलाफत शासन लाना रखा था और खुद को इस्लामिक जगत का खलीफा (सबसे बड़ा नेता) तक घोषित कर लिया था।

बताया जाता है कि 2014 से लेकर 2017 तक अपने चरम के दौरान आईएसआईएस ने अफगानिस्तान में भी कुछ लड़ाके भेजना शुरू कर दिया था। हालांकि, यहां उसकी असली ताकत बने तालिबान के वो खूंखार आतंकी, जो अमेरिका से लड़ाई के दौरान मुल्ला उमर के नेतृत्व वाले संगठन की कमजोरी से तंग आ चुके थे। ऐसे ही कुछ आतंकियों ने मिलकर अफगानिस्तान के खोरासान प्रांत में आईएस की शुरुआत की और पूरे देश में कई आतंकी गतिविधियों को अंजाम दिया।

क्या है आईएस-खोरासान की विचारधारा?

आईएस-खोरासान का अस्तित्व आईएसआईएस के खत्म होने के बाद भी बरकरार है। इस आतंकी संगठन की विचारधारा सुन्नी इस्लाम की वहाबी-सलफी परंपरा की मानी जाती है। आईएस ने अफगानिस्तान में ज्यादातर हमले सुसाइड बॉम्बरों यानी आत्मघाती हमलावरों के जरिए कराए हैं, जिनमें सैकड़ों लोग मारे गए हैं।

इतना ही नहीं यह संगठन अल-कायदा और तालिबान के उलट सोशल मीडिया पर भी काफी एक्टिव रहा है, जिसके चलते दुनियाभर के कट्टरपंथी लोग इस संगठन से जुड़े। अफगानिस्तान में जहां बीते एक दशक में लगातार तालिबान का उदय हुआ, वहीं आईएस ने भी छिपकर बड़े हमलों के जरिए खुद की खतरनाक आतंकी संगठन के तौर पर पहचान बनाई है।

तालिबान: अफगानिस्तान में कट्टरपंथी शासन थोपने वाला आतंकी संगठन

तालिबान का उदय 1992 से लेकर 1996 तक अफगानिस्तान में चले गृहयुद्ध के दौरान हुआ। दरअसल, सोवियत सेनाओं को देश से निकालने के बाद मुजाहिदीनों के एक कट्टरपंथी गुट ने तालिबान नाम का संगठन बना लिया। अफगानिस्तान में गृहयुद्ध खत्म होने तक तालिबान ने काबुल पर कब्जा कर लिया था और 1998 आते-आते इस संगठन का अफगानिस्तान के लगभग 90 फीसदी क्षेत्र पर कब्जा था।

हालांकि, 2001 में अमेरिकी सेना के आने के बाद इस संगठन के ज्यादातर खूंखार आतंकी पाकिस्तान में छिप गए और पिछले 20 सालों से छिपकर गुरिल्ला युद्ध के जरिए अमेरिकी सेना का मुकाबला कर रहे थे। रेगिस्तानी गुफाओं और पहाड़ी इलाकों की जानकारी होने की वजह से तालिबानी आतंकी लगातार अपना प्रभाव बढ़ाते गए और पाकिस्तान की मदद से एक बार फिर अफगानिस्तान पर अपना राज कायम करने में कामयाब रहे। बताया जाता है कि पिछले 20 सालों तालिबान से लड़ते हुए 66 हजार अफगान सेना के जवान और पुलिसकर्मी मारे गए, जबकि 47 हजार आम लोगों की भी जान गई। हालांकि, आईएस से उलट तालिबान का प्रभाव कभी भी अफगानिस्तान और पाकिस्तान से ज्यादा नहीं बढ़ा।

क्या है तालिबान की विचारधारा?

अरबी में तालिबान का मतलब है विद्यार्थी और माना जाता है कि तालिबान की शुरुआत पाकिस्तान के धार्मिक स्कूलों में हुई, जहां सुन्नी इस्लाम का सख्त रूप सिखाया गया। तालिबान ने अफगानिस्तान में सत्ता पर काबिज होने के दौरान वादा किया था कि वह शरिया कानून के जरिए पाकिस्तान के पश्तून इलाके और अफगानिस्तान में शांति वापस लाएगा। लेकिन शरिया कानून के तहत अफगानिस्तान में नागरिकों पर काफी सख्त कानून लागू हुए। जहां 10 साल से ऊपर की लड़कियों की शिक्षा पर रोक लगा दी गई, वहीं टेलीविजन और सोशल मीडिया पर भी पाबंदी लगी रही।

बताया जाता है कि इस संगठन का मकसद अफगानिस्तान को अफगान अमीरात में तब्दील करना है। बता दें कि अमीरात शब्द अमीर से बना है, इस्लाम में अमीर का मतलब प्रमुख या प्रधान से होता है। इस अमीर के तहत जो भी जगह या शहर या देश आता है, वो अमीरात कहलाता है। इस तरह इस्लामिक अमीरात ऑफ अफगानिस्तान का मतलब हुआ एक इस्लामिक देश, जिसमें तालिबान के मौजूदा सरगना हैबतुल्लाह अखुंदजादा सुप्रीम लीडर के तौर पर जाना जाएगा।

अल-कायदा: इस्लाम के लिए लड़ाई में जिहाद का इस्तेमाल करने वाला संगठन

अफगानिस्तान में जिस आतंकी संगठन को खत्म करने के लिए अमेरिकी सेना ने तालिबान को 2001 में सत्ता से हटाया था, वह था अल-कायदा। इसी आतंकी संगठन को अमेरिका के 9/11 हमलों का जिम्मेदार बताया जाता है। यह संगठन अफगानिस्तान में सोवियत सेना की हार से ठीक पहले 1988 में पाकिस्तान में बना था और तब इसका सरगना था ओसामा बिन लादेन और मोहम्मद आतिफ।

इस संगठन को अमेरिका के अलावा कई और पश्चिमी देशों में भी इस्लाम के लिए खतरे के तौर पर देखा जाता है। 1992 में यमन से लेकर अमेरिका, सऊदी अरब, इंडोनेशिया, अफ्रीका, यूरोप और पश्चिम एशिया तक में संगठन के कई आतंकी हमलों की बात सामने आती है।

अफगानिस्तान तक ही सीमित हो गईं। इसकी वजह यह थी कि अल-कायदा के आतंकी गुरिल्ला युद्ध के जरिए अमेरिकी सैनिकों से लड़ते रहे और अमेरिका के लक्षित हमलों में इस आतंकी संगठन को बड़ा नुकसान हुआ। 2011 में इस गुट के सरगना ओसामा बिन लादेन के अमेरिकी सेना के हाथों मारे जाने के बाद अफगानिस्तान से भी अल-कायदा का सफाया हो गया और इसके आतंकी इराक, सीरिया जाकर इस्लामिक स्टेट का हिस्सा बन गए।

क्या है अल-कायदा की विचारधारा?

अल-कायदा मुख्य तौर पर सुन्नी इस्लाम की वहाबी विचारधारा को मानता है। अल-कायदा का अरबी में मतलब होता है बुनियाद या नींव और इस संगठन के आतंकियों का मानना है कि उन्हें इस्लाम को बचाने और उसके प्रसार के लिए जिहाद का इस्तेमाल करना चाहिए।

अल-कायदा का मानना है कि यह हर मुस्लिम की जिम्मेदारी है कि वह इस्लाम का विरोध करती दिख रही ताकतों के खिलाफ एकजुट हो जाए। कई मायनों में आईएसआईएस के उदय को अल-कायदा के पतन से जोड़ा जाता है। दरअसल, दोनों ही संगठन लगभग एक ही विचारधारा को मानते हैं और आईएस के बनने के बाद अल-कायदा ने खुद आईएस के आतंकी राज का समर्थन किया था।

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