Tuesday, March 31, 2026
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अमृतवाणी: राजा का सपना

एक ताकतवर और न्यायप्रिय राजा थे। उन्होंने कई युद्ध जीते थे, लेकिन धीरे-धीरे रक्तपात से उनका मन भरने लगा था। वह चाहते थे कि लोगों को खुश रखें। उनके भीतर यह उलझन बनी रहती थी कि वह अपने खजाने की कितनी राशि सैन्य ताकत बढ़ाने पर खर्च करें और कितना प्रजा के कल्याण के लिए। एक रात उनके सपने में एक देवता प्रकट हुए और बोले, ‘राजन! मैं तुम पर प्रसन्न हूं। लो यह तलवार, यह तुम्हें विश्व विजयी बनाएगी।’ राजा ने हाथ जोड़ते हूए कहा, ‘हे देव, मैं आपकी इस कृपा के लिए आभारी हूं, लेकिन इस तलवार का मैं क्या करूंगा? मुझे युद्ध से घृणा होती जा रही है।’ तब देवता ने एक मणि हाथ में लेकर कहा, ‘यह नील मणि ले लो। इसके प्रभाव से तुम्हें अपार धन मिलेगा। स्वयं भी सुख से रहना और अपनी प्रजा को भी सुखी रखना।’ इस पर राजा बोले, ‘आप बड़े दयालु हैं। आपकी मुझ पर इतनी कृपा है। प्रजा से कर के रूप में जो धन मुझे प्राप्त होता है, उससे मेरे राज्य का का कामकाज अच्छी तरह चल जाता है।’ इस पर देवता बोले, ‘राजन, लगता है संसार की चीजों में तुम्हारी रुचि नहीं है, तुम मेरे साथ स्वर्ग चलो।’ राजा ने उत्तर दिया, ‘स्वर्ग के सुख का भी मुझे क्या करना है। मेरी प्यारी धरती ही स्वर्ग से क्या कम है?’ देवता ने कहा, ‘ठीक है, मैं तुम्हें फूलों के कुछ बीज देता हूं। जहां भी बिखेर दोगे, वहां ऐसी सुगंध वाले फूल खिलेंगे कि उन्हें सूंघते ही शत्रु भी मित्र बन जाएंगे।’ इस बार राजा के होठों पर मुस्कान आई। दोनों हाथ बढ़ाकर उन्होंने फूलों के बीज ले लिए और प्रसन्न होकर बोले, ‘सच में मुझे इन्हीं की आवश्यकता थी। प्रजा जन मिलजुल कर रहें, इससे बड़ी चीज और क्या हो सकती है।’ राजा का स्वप्न टूट गया। उनकी सारी उलझन समाप्त हो गई। मानव कल्याण को उन्होंने अपना लक्ष्य बना लिया।
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