Friday, April 23, 2021
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दादा फाल्के तक रजनी

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रजनीकांत को ‘दादासाहब फाल्के अवॉर्ड’ देने का ऐलान किया गया है। रजनीकांत दक्षिण भारत के सुपर स्टार हैं। हिंदी पट्टी में हालांकि वह इतने कामयाब नहीं हुए, लेकिन उनकी स्टाइलिश अदाकारी के चलते उत्तर भारत में भी उनके चाहने वाले कम नहीं हैं। जब सूचना प्रसारण मंत्री ने उन्हें 2019 के 51वें दादा फाल्के पुरस्कार देने की घोषणा की तो एक सवाल फौरन उभर कर सामने आया कि जब तमिलनाडू में चुनाव चल रहे हैं, तो चुनाव के बीच में उन्हें फिल्मों के लिए दिए जाने वाला सबसे बड़ा पुरस्कार देने का ऐलान क्यों किया गया? क्या यह चुनाव को प्रभावित करने की मंशा है? यह सवाल इसलिए पूछा जा रहा है कि रजनीकांत ने अपनी सियासी पार्टी बनाने का ऐलान किया था। बात यहां तक पहुंच गई थी कि उन्होंने भाजपा के साथ गठबंधन के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह समेत बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व से बात भी की थी। हालांकि बाद में स्वास्थ्य कारणों ने उनका राजनीति में उतरने का इरादा बदल गया था। लेकिन यह तो जगजाहिर है कि उनका झुकाव भाजपा की ओर है।

इसी वजह से सवाल यह सामने आया कि चुनाव के समय ही रजनीकांत को दादा फाल्के पुरस्कार देने का ऐलान क्यों किया गया? सवाल तो यह भी है कि क्या यह चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन नहीं माना जाएगा? पुरस्कार के ऐलान करने की इतनी जल्दी क्यों थीं कि चुनाव संपन्न होने का भी इंतजार नहीं किया गया? रजनीकांत जैसे लोकप्रिय शख्सियत के लिए देश के सबसे बड़े फिल्म अवॉर्ड की घोषणा सत्ताधारी एनडीए गठबंधन को फायदा दिला सकता है, इस संभावना को खारिज नहीं किया जा सकता।

राजनीतिक सवालों से इतर देखें तो इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि रजनीकांत इस पुरस्कार को डिजर्व करते हैं, जो उन्हें देर से दिया गया है। रजनीकांत को भारत सरकार द्वारा 2000 में पद्म भूषण और 2016 में पद्म विभूषण से भी सम्मानित किया जा चुका है।

दक्षिण भारत में फिल्मी सितारों का भगवान का दर्जा दिया जाता रहा है। राजनीति में भी फिल्मी सितारे बेहद सफल रहे हैं। एमजी राजचंद्रन हों, जय ललिता हों या फिर एनटी रामाराव हों। बेशक अगर रजनीकांत राजनीति में आते तो कामयाब रहते। ये इतिहास रहा है कि दक्षिण भारत के जितने भी फिल्मी सितारे राजनीति में आए कमोशबेश सभी कामयाब रहे हैं। बहरहाल, रजनीकांत ने तमिल सिनेमा में ‘अपूर्व रागंगल’ से डेब्यू किया था। उनकी कई हिट फिल्मों में ‘बाशा’, ‘शिवाजी’ और ‘एंथिरन‘ जैसी फिल्में हैं। वे अपने प्रशंसकों के बीच थलाइवर (नेता) के रूप में जाने जाते हैं। 71 वर्षीय रजनीकांत बीते पांच दशक से भारतीय सिनेमा पर राज कर रहे हैं। 12 दिसंबर 1950 को बेंगलुरू के एक सामान्य मराठी परिवार में जन्मे रजनीकांत ने अपनी मेहनत से टॉलीवुड ही नहीं, बल्कि बॉलीवुड में भी काफी नाम कमाया।

रजनीकांत उनका असली नाम नहीं है। शिवाजी राव गायकवाड़ के रूप में उन्होंने अपना कॅरियर एक बस कंडक्टर के रूप में किया था। 1973 में मद्रास फिल्म संस्थान में दाखिला लिया और अभिनय की पढ़ाई की। अभिनय की शुरुआत नाटकों से की थी। एक नाटक के मंचन के दौरान फिल्म निर्देशक के बालाचंदर उनसे मिले और उनके समक्ष उनकी तमिल फिल्म में अभिनय करने का प्रस्ताव रखा।

इस तरह उनके करियर की शुरुआत बालाचंदर निर्देशित तमिल फिल्म ‘अपूर्वा रागंगाल’ (1975) से हुई, जिसमें वह खलनायक बने। यह भूमिका यूं तो छोटी थी, लेकिन इसने उन्हें आगे और भूमिकाएं दिलाने में मदद की। इस फिल्म को राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाजा गया था।

तमिल फिल्मों में खलनायक की भूमिकाएं निभाने के बाद वह धीरे-धीरे एक स्थापित अभिनेता की तरह उभरे। तेलुगु फिल्म ‘छिलाकाम्मा चेप्पिनडी’ (1975) में उन्हें मुख्य अभिनेता की भूमिका मिली। उसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। कुछ सालों में ही रजनीकांत तमिल सिनेमा के महान सितारे बन गए और तब से सिनेमा जगत में एक प्रतिमान बने हुए हैं।

हर फिल्म के साथ उनकी लोकप्रियता बढ़ती गई। आलम यह हो गया कि उनकी कोई फिल्म रिलीज होती तो दर्शक सुबह पांच बजे ही सिनेमाघर के बाहर पहुंच जाते थे। तभी सिनेमाघर मालिकों को शो तभी शुरू करना पड़ता था।

पर्दे पर उनकी एंट्री होते ही दर्शक पर्दे पर इतने सिक्के फेंकते थे कि कई बार सिनेमाघरों के पर्दे तक फट गए। इस वजह से सिक्के उछालने पर पाबंदी लगा दी गई थी। इस पर हैरान हुआ जा सकता है कि रजनीकांत ने हिंदी, कन्नड़, मलायलम, बंगाली और अंग्रेजी फिल्मों में भी काम किया है, लेकिन कभी मराठी फिल्मों में काम नहीं किया, जबकि रजनीकांत मूलरूप से मराठी हैं।

हिंदी फिल्मों में 1983 से उनका सफर ‘अंधा कानून’ फिल्म से हुआ था। इस फिल्म में हेमा मालिनी उनके साथ लीड रोल में थीं, जबकि अमिताभ बच्चन ने एक्सटेंडेड कैमियो किया था। स्पेशल एपीयरेंस में धर्मेंद्र भी नजर आए थे। उस वक्त अमिताभ बच्चन शिखर पर थे और उनकी फिल्में हिट हो रहीं थीं। इसके बाद रजनीकांत नियमित रूप से हिंदी फिल्में करते रहे।

हालांकि, उनका मुख्य फोकस तमिल सिनेमा ही रहा। 2011 में आई शाह रुख खान की फिल्म रा.वन में रजनीकांत ने चिट्टी रोबोट के रूप में कैमियो किया था। इस फिल्म का चर्चित गाना लुंगी डांस उन्हें समर्पित किया गया था। 2018 में आई 2.0 में अक्षय कुमार ने रजनीकांत के साथ पहली बार स्क्रीन स्पेस शेयर किया था। दक्षिण भारत में भले ही रजनीकांत ने शिखर छुआ है, लेकिन उत्तर भारत में उन्हें उतनी सफलता नहीं मिल पाई।

उनके हिस्से में कमल हासन की ‘सदमा’ जैसी कोई फिल्म नहीं आई। दक्षिण भारतीय अभिनेताओं ने बॉलीवुड में कोई खास सफलता नहीं पाई। कमल हासन भी कुछ हिंदी फिल्में करने के बाद वापस दक्षिण भारत लौट गए थे।
दादा साहब फाल्के पुरस्कार फिल्म इंडस्ट्री का बेहद प्रतिष्ठित अवार्ड माना जाता है। इस अवार्ड को 1969 में शुरू किया गया था।

यह भारत सरकार की ओर से दिया जाने वाला एक वार्षिक पुरस्कार है, जो किसी व्यक्ति विशेष को भारतीय सिनेमा में उसके आजीवन योगदान के लिए दिया जाता है। इस पुरस्कार के तहत विजेता को एक स्वर्ण कमल, प्रशस्ति पत्र, शॉल और 10 लाख रुपये नकद प्राइज मनी के तौर पर दिया जाता है। दादा साहब फाल्के को ‘फादर आफ इंडियन सिनेमा’ कहा जाता है। इस पुरस्कार का प्रारंभ फाल्के के जन्मदिन पर साल 1969 में हुआ था। देविका रानी इस पुरस्कार को पाने वाली पहली विजेता थीं।


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