
पाण्डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ प्रेमचंद के समकालीन हैं। वह ऐसे कथाकार हैं, जिन्हें प्रेमचंद युग का सबसे ‘बदनाम उपन्यासकार’ भी कहा जाता है। वर्षों पहले ‘उग्र’ ने कहानी को एक नई शैली दी थी, जिसे उग्र शैली कहा गया। उनकी मित्र मंडली में सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, जयशंकर प्रसाद, शिवपूजन सहाय और विनोदशंकर व्यास जैसे लोग शामिल थे। वह संभवत: पहले ऐसे कहानीकार हैं, जिन्हें कहानी लेखन के लिए 9 माह जेल में बिताने पड़े। यह सजा उन्हें ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध कहानी लिखने पर नहीं मिली। बेशक उन्होंने बलिदान, ध्रुवधारणा और उसकी मां जैसी क्रांतिकारी कहानियां भी लिखीं। ‘उसकी मां’ कहानी पढ़ते हुए बरबस मैक्सिम गोर्की के उपन्यास मां की याद आ जाती है। ‘उसकी मां’ कहानी में नैरेटर (मैं) अलमारियों में सजे पुस्तकालय की ओर निहार रहा है। वह किसी महान लेखक की कोई कोई महान कृति निकाल कर देखने की सोच रहा था। उसे दुनिया भर के महान लेखक अलमारी में सजे दिखाई पड़ते हैं। ठीक इसी समय एक पुलिस अधिकारी उसके घर आता है और एक लड़के (लाल) की तस्वीर दिखाकर पूछता है कि क्या वह इसे जानते हैं? इसके बाद कहानी खुलती है। जिसे पुलिस तलाश रही थी, वह एक क्रांतिकारी है, जो अपनी बूढ़ी मां के साथ अकेला रहता है। उसके और भी बहुत से दोस्त उसके घर आते हैं। ये सब मिलकर भारत के लिए आजादी चाहते हैं। मां उन्हें खाना बनाकर खिलाती हैं। यह सभी लड़के पकड़ लिए जाते हैं और इन्हें सजा हो जाती है। उग्र दरअसल जिस महान लेखक की खोज शुरू में अपनी किताबों की अलमारी में कर रहे थे, वह उन्हें वास्तविक जीवन में मिला-लाल के रूप में।
यह वह समय था जब आजादी की लड़ाई उफान पर थी, राष्ट्रवाद और राष्ट्रभक्ति प्राथमिकता पर थी। यही वह समय था जब युवाओं को नैतिक और राष्ट्र के लिए समर्पित होने की प्रेरणा दी जाती थी। ठीक इसी समय उग्र ने पाया कि समाज में समलैंगिक रिश्ते पनप रहे हैं। निश्चित रूप से उन्होंने देखा होगा कि कुछ पुरुष छोटी उम्र के लड़कों को अपने प्रेम जाल में फंसा रहे हैं। इन्हें जागृत करना पाण्डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ ने अपना कर्तव्य समझा। 1927 में इन समलैंगिक रिश्तों पर उनका कहानी संग्रह प्रकाशित हुआ-चॉकलेट। इसे राजपाल एण्ड सन्स ने पुन: प्रकाशित किया है-चॉकलेट शीर्षक से।
संग्रह में कुल जमा 8 कहानियां हैं। इनमें अलग-अलग जगहों पर इन रिश्तों को दिखाया गया है। ये कहानियां मतवाला पत्रिका में 1924 से 1927 के बीच प्रकाशित हुर्इं। शीर्षक कहानी ‘चॉकलेट’ में एक कवि-शायर एक युवा लड़के से प्रेम कर बैठता है। कहानी में कहीं भी अश्लील भाषा का प्रयोग नहीं हुआ, न ही कहीं समलैंगिक रिश्तों को विस्तार से दर्शाया गया। उग्र ने समलैंगिक रिश्तों के लिए अलग से शब्द भी दिए हैं। जैसे चॉकेलट या पालट। इन पर चर्चा को उन्होंने चॉकलेट चर्चा कहा है। लगभग सभी कहानियों के अंत में समलैंगिक रिश्तों में फंस गए या फंसा लिया गये लड़कों की मुक्ति का आह्वान है। वह छोटी उम्र के लड़कों से रिश्ता बनाने वालों को अंत में सजा दिलवाते हैं या आत्महत्या की ओर अग्रसर करते दिखाते हैं। उग्र ने अलग-अलग कहानियों में, अलग-अलग जगहों पर बनते इन रिश्तों का चित्रण किया है।
कहीं थियेट्रिकल कंपनियों में काम करने वाले छोटी उम्र के लड़कों (जो लड़कियों का किरदार निभाते थे) यौन शोषण की कथा (कमरिया नागिन सी बल खाय) दिखाई है तो कहीं जेलों में (जेल में) इस तरह के रिश्तों के विरोध में वह खड़े दिखाई देते हैं। जाहिर है उग्र इस तरह के रिश्तों को व्यभिचार मानते रहे होंगे। अपनी कहानी ‘व्यभिचारी प्यार’ में वह कल्याणचन्द्र (नायक), जिसे उग्र ने कलाविद महाराज, कविवर और साहित्याचार्य कहा है, एक बालक के प्रेम में पड़ जाता है। अंत में कल्याणचन्द्र जहर खाकर आत्महत्या कर लेता है। पुलिस को उसके पास से एक खत मिलता है। खत में कल्याणचन्द्र ने लिखा है: बेशक उस बालक…के चारित्रिक सर्वनाश का उत्तरदायी वही व्यक्ति है, जिसके पास यह पत्र पुलिसवाले पाएंगे। मैंने ही उसके स्वर्ग में नरक के बीज बोये हैं। मैंने ही अपनी नादानी से उसका जीवनपट काला कर दिया है। मैं अपने किये का प्रायश्चित जहर खाकर कर रहा हूं। मुझ कायर में हिम्मत नहीं कि, पुलिस, अदालत और समाज का सामना कर सकूं।
‘पालट’ कहानी के अंत में शोषित बालक के मरने की खबर मिलती है। ‘चॉकलेट चर्चा’ में उग्र कॉलेज में होने वाली इस तरह की घटनाओं को दर्शाते हैं। संग्रह की सभी कहानियां एक नजरिये से-आदर्शवादी-लिखी गई हैं-छोटी उम्र के बालकों के शोषक की नजर से। कहानियों में कहीं भी छोटी उम्र के बालकों की तकलीफ बालकों की नजर से दर्ज नहीं की गई है। कहीं भी बच्चों के मुख से तकलीफ का वर्णन नहीं है, इसका यह अर्थ कतई नहीं है कि बच्चे शोषण करवाने के लिए सहमत थे। इसका अर्थ यह है कि बालकों को यह पता ही नहीं चलता था कि उनका शोषण हो रहा है और जब पता चलता था, तब तक बहुत देर हो चुकी होती थी।
पता नहीं उग्र आज होते तो इन कहानियों पर क्या सोचते। क्योंकि 2018 में भारतीय उच्चतम न्यायालय ने समलैंगिकता को मान्यता दे दी है। हालांकि सच यह भी है कि इस तरह के रिश्तों को समाज आज भी खुले मन से स्वीकृत नहीं करता। लेकिन 100 साल पहले के समाज और परिस्थितियों को देखें, जब नैतिकता, राष्ट्रभक्ति, राष्ट्रवाद, आदर्शवाद हमारी जरूरत था, तब शायद ये कहानियां जरूरी लगेंगी।
हालांकि इस जरूरत के बावजूद बीसवीं सदी के तीसरे दशक में जब ये कहानियां प्रकाशित हुई तो पक्ष और विपक्ष में एक बड़ी बहस छिड़ गई थी। इस बहस में प्रेमचंद से लेकर महात्मा गांधी तक को कूदना पड़ा। उग्र के लेखन में राष्ट्रवाद के साथ-साथ, महिलाओं का शोषण, महिलाओं का शोषण, भ्रष्टाचार और जातिवाद का विरोध देखा जा सकता है। ऐसे में उनके लिए छोटी उम्र के बालकों के यौन शोषण पर चुप रह जाना संभव नहीं था। बकौल मंटो, ‘मैं सोसायटी की चोली क्या उतारूंगा, जो है ही नंगी, मैं उसे कपड़े पहनाने की कोशिश भी नहीं करता, क्योंकि ये मेरा काम नहीं दर्जियों का काम है।’ उग्र ने भी समाज की सच्चाइयों को, उसकी नग्नता को, साहस के साथ चित्रित किया-चॉकलेट इस का प्रमाण है।
सुधांशु गुप्त


