
हमारे धर्माधीशों व सत्ताधीशों में यों कितने भी वैभिन्य हों, एक गजब की समानता है। यह कि दोनों को आत्मावलोकन से एक जैसा परहेज है। साथ ही राजनीति व धर्म के उदात्त स्वरूपों से उनका कोई लेना-देना नहीं रह गया है। कारण यह कि इन दोनों के बड़े हिस्से ने मान लिया है कि मनुष्यता की नि:स्वार्थ सेवा के बजाय परस्पर निर्भरता वाली दुरभिसंधियों और आक्रामकताओं के पोषण का रास्ता कहीं ज्यादा सुभीते वाला है, इसलिए उसी को प्रशस्त करते रहना बेहतर है-भले ही इससे अंधेरे लगातार गहराते जायें और उस धर्म, जो निर्बलों को बल व विकलों को प्राण देता आया है, साथ ही उस राजनीति, जो समता, स्वतंत्रता और लोकतांत्रिकता की हामी है, की चुनौतियां निरंतर विकराल होती जाएं। ऐसा नहीं होता, सत्ताधीश व धर्माधीश देश के विभिन्न समाजों व समुदायों में दूरियां पैदा करने में लगे अपने अनुयायियों को बरजने का साहस कर पाते और धर्म व राजनीति दोनों को संयोजक से वियोजक होने से रोकते तो हम इन दिनों कांवड़ यात्रा का जो विद्रूप देखने को अभिशप्त हैं, उसकी नौबत नहीं आती। वह दिल दहलाने वाला वीडियो भी नहीं ही देखना पड़ता, जो इस बार कांवड़ यात्रा शुरू होते ही सोशल मीडिया पर वायरल हो गया था और जिसको देखकर भले ही संवेदनशील नागरिकों और अभिभावकों का दिल दहल गया, धर्माधीशोंं व राजनेताओं की बेदिली जस की तस बनी रही।
उक्त वीडियो में भगवान शिव की तस्वीर वाली भगवा वेशभूषा में कुछ बच्चे बैठे दिखते हैं, जिनकी उम्र बमुश्किल 10-12 बरस होगी। वे सब के सब चिलम फूंक रहे और धुआं उड़ा रहे हैं। एक बच्चा चिलम का धुआं बर्दाश्त नहीं कर पाता तो असहज-सा महसूस करता हुआ बार-बार उठकर पानी पीता है। लेकिन उसकी ओर किसी का ध्यान नहीं जाता। जाए भी कैसे, धर्माधीशों और सत्ताधीशों दोनों ने मिलकर धर्म की ऐसी नई परिभाषा गढ़ दी है, जिसके अनुसार धार्मिक होने की पहली शर्त बिना कुछ सोचे-समझे अपना मुंह पुरातन की ओर करना, उसकी अंधताओं, जड़ताओं, अवैज्ञानिकताओं, कुरीतियों व रूढ़ियों आदि का बोझ ढोते और उसी में गर्व महसूस करते रहना है।
उन्होंने धर्म की यह परिभाषा न गढ़ी होती तो उक्त वीडियो के बच्चों के लिए, जिन्हें रोजाना पौष्टिक भोजन शायद ही मयस्सर होता हो, धर्म के नाम पर चिलम फूंकना और अपने फेफड़ों में उसका धुआं भरना इतना सहज नहीं होता। तब उनके अभिभावक भी अपेक्षाकृत जागरूक होते और उन्हें चिलमबाज नन्हे कांवड़िए बनाकर खुश नहीं होते। क्योंकि तब उनका धर्म के उस रूप पर जोर होता, जिसमें भगवानों के बाल रूप की पूजा में मक्खन, मिश्री, दूध व मेवे जैसी पौष्टिक चीजों का भोग लगाया जाता है, न कि उन्हें फूंकने के लिए चिलम पकड़ा दी जाती है।
धर्म की इसी अनर्थकारी परिभाषा का ही कुफल है कि शिवभक्ति के महीने सावन में हर सोमवार मंदिरों में कई लीटर दूध से शिव का अभिषेक करने वाले धनाढ्यों को इस सवाल का सामना करना गवारा नहीं है कि उक्त वीडियो के बच्चे स्कूल की जगह कांवड़ यात्रा में क्यों दिख रहे हैं? चूंकि इन धनाढ्यों की भक्ति भावना इतने से ही तुष्ट हो जाती है कि उनके बच्चे अच्छे और महंगे स्कूलों में पढ़ने जाते हैं, इसलिए उन्हें इसमें भी कोई नुकसान नहीं दिखाई देता कि कांवड़ यात्रा के दौरान उसके मार्ग में पड़ने वाले जिलों के स्कूलों को कई-कई दिनों के लिए बंद कर दिया जाता है और उनके शिक्षकों व शिक्षिकाओं की कांवड़ यात्रा में ड्यूटी लगा दी जाती है। उत्तर प्रदेश के गोलागोकर्णनाथ जिले में तो सावन के हर सोमवार शिक्षकों को पढ़ाने की जगह कांवड़ियों की सेवा में लगने का आदेश है।
इस बार कांवड़ यात्रा को लेकर यूपी सरकार ऐसे सारे प्रबंधों का दावा कर रही है, जिससे कांवड़ियों को रास्ते में तनिक भी दिक्कत न पेश आए। उनकी यात्रा के मार्ग पर मांस की बिक्री की पूरी तरह मनाही कर दी गई है और कई जगह रैपिड रेल निर्माण का काम भी रोक दिया गया है, क्योंकि रैपिड निर्माण के लिए कई बार उसके क्रम में यातायात रोकना पड़ता है। यों, उत्तर प्रदेश कांवड़ यात्रा की कितनी बड़ी कीमत चुका रहा है, इसे इस तथ्य से समझ सकते हैं कि यात्रा की पाबन्दियों के कारण अकेले गाजियाबाद जिले की 27 हजार औद्योगिक इकाइयों में इस दिनों में 2900 करोड़ रुपयों के व्यवसाय पर असर पड़ा है, क्योंकि अघोषित बंदी के कारण इस दौरान न कच्चे माल की आवक हो पा रही है और न उत्पादित माल की सप्लाई। बड़ी औद्योगिक इकाइयों को रोजाना 250 करोड़ का चूना लग रहा है, जबकि छोटी इकाइयों को 40 करोड़ का।
फिर भी मेरठ में एक दुर्घटना में कांवड़ के कथित अपमान को मुद्दा बनाकर कांवडियों ने जिस तरह घंटों बवाल काटा, जिला प्रशासन को घुटनों के बल ला खड़ा दिया और मान-मनौवल के लिए मजबूर किया, उससे नहीं लगता कि योगी सरकार उनकी तनिक भी कृतज्ञता अर्जित कर सकी है। कर भी नहीं सकती, क्योंकि वह खुद जिस खास तरह की कट्टर धार्मिक मानसिकता का पोषण करती है, उसमें लोकतांत्रिक मान्यताओं, नियम-कायदों और व्यवस्थाओं के सम्मान की कोई जगह नहीं है-सारा जोर अपने खास तरह के धर्म और धार्मिकता को सबसे ऊपर रखने पर है।
निस्संदेह, हाथरस में सड़क दुर्घटना में छ: कांवड़ियों की जानें जाना और कई अन्य का घायल होना बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है और उसके सिलसिले में योगी सरकार इस सवाल से बच नहीं सकती कि जब कांवड़ियों की सुरक्षा के लिहाज से उसने रेलवे की रैपिड निर्माण मशीनों तक को हटवा दिया था, तो यह क्योंकर हुआ कि एक तेज रफ्तार डम्पर ने कांवड़ियों की भीड़ में घुसकर कोहराम मचा दिया? अब यह सरकार वे जानें तो नहीं ही लौटा सकती, जो इस हादसे में चलीं गर्इं, लेकिन अच्छी बात है कि अपनी चूक मानकर उसने हाथरस के लापरवाह पुलिस अधीक्षक का तबादला कर दिया है।
अलबत्ता, तबादला ही पर्याप्त नहीं है और जिन्होंने उक्त हादसे में अपने परिजन गंवाए हैं, उनके आंसू पोंछने के लिए उन्हें समुचित मुआवजा वगैरह भी दिया जाना चाहिए। लेकिन ऐसे तदर्थ उपायों से कहीं ज्यादा जरूरी यह है कि सत्ताधीश और धर्माधीश दोनों राजनीति व धर्म के नाम पर अंधताओं व अलोकतांत्रिकताओं के पोषण से बाज आएं, थोड़े सदाशयी होकर सामने आएं और सदाशयता फैलाने के लिए अपने अनुयायियों का नैतिक स्तर ऊंचा उठाने के जतन करें। खुद भी समझें ओर उन्हें भी समझाएं कि धर्म और राजनीति दोनों तभी अच्छे लगते हैं, जब मनुष्य के जीवन को निर्मलताओं की ओर ले जाने के उपकरण बनें।


