जनवाणी ब्यूरो |
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने हिमाचल प्रदेश सरकार की उस याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति दे दी है, जिसमें राज्य सरकार ने हाईकोर्ट के एक आदेश को चुनौती दी थी। यह आदेश विधायकों और सांसदों से जुड़े 45 आपराधिक मामलों को वापस लेने से रोकने से संबंधित था। इनमें वे मामले भी शामिल हैं, जिनमें कोरोना काल के दौरान रैलियां करने के कारण कांग्रेस कार्यकर्ताओं के खिलाफ भाजपा सरकार के समय केस दर्ज किए गए थे। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस जारी किया है और अगली सुनवाई की तारीख 16 मार्च तय की है।
गौरतलब है कि हिमाचल हाईकोर्ट ने 26 अप्रैल 2024 को एक निर्णय सुनाते हुए कहा था कि राज्य सरकार 65 मामलों में से केवल 15 मामलों को ही वापस ले सकती है, जबकि बाकी मामलों को वापस लेने की अनुमति नहीं दी गई थी। कोर्ट ने यह भी बताया कि जिन 65 मामलों को वापस लेने की सिफारिश की गई थी, उनमें से 5 मामलों का निपटारा पहले ही हो चुका है, जिनमें मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू से संबंधित एक मामला भी शामिल है।
राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में क्या तर्क प्रस्तुत किया?
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से वरिष्ठ वकील वी. गिरि ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि सभी मामलों को जनहित में वापस लिया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी बताया कि इस फैसले को पब्लिक प्रॉसिक्यूटर, जिला वकीलों, जिलाधीश और पुलिस अधिकारियों से सलाह लेकर लिया गया है।
कौन से मामले वापस लेने से रोका गया?
हाईकोर्ट ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 269 (बीमारी फैलने का खतरा), 353 (सरकारी कर्मचारी पर हमला), 504 (जानबूझकर अपमान), 506 (धमकी), और राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम व आपदा प्रबंधन कानून से जुड़े मामलों को वापस लेने से मना किया था।
कानूनी तर्क क्या था?
हाईकोर्ट ने कहा कि भले ही भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 321 के तहत पहले अनुमति की आवश्यकता नहीं थी, लेकिन 2020 में सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के बाद अब विधायकों और सांसदों से जुड़े मामलों में कोर्ट की अनुमति जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा था कि केस वापस लेने का निर्णय राजनीतिक कारणों से नहीं, बल्कि सच्चे जनहित और ईमानदारी से लिया जाना चाहिए।

