गैस से वे पहले ही परेशान थे। चौबीसों घंटे गैस का प्रॉडक्शन उनके शरीर में चल ही रहा था। अब रसोई गैस का प्रपंच और..। यानी कंगाली में आटा गीला। पेट में घुड़-मुड़, खट्टी डकारें और बार-बार सीटी-सी आवाजें..। अपनी गैस प्रॉब्लम से वे हलकान हुए जा रहे थे कि रसोई से पत्नी की दनदनाती आवाज आई-‘अजी सुनते हो, सिलेंडर बुक कराया कि नहीं। गैस खत्म होने वाली है। फिर कहोगे, टाइम पर चेताया नहीं..।’ अपने शरीर की गैस से तो वे जैसे-तैसे निपट रहे थे, लेकिन रसोई गैस खत्म होने की बात सुनकर उनकी ऊपर की सांस ऊपर, नीचे की नीचे रह गई। कल ही पड़ोस वाले शर्मा जी बता रहे थे कि गैस बुक कराए तीन हफ्ते हो गए, सिलेंडर का अता-पता नहीं है। वे खुद अखबारों में पढ़ रहे थे और न्यूज चैलनों में देख रहे थे कि देश में गैस की किस कदर कमी चल रही है। जो घर में सिलेंडर लगा है, उसमें थोड़ी-बहुत गैस बची है। पत्नी व्यंजन कम खिला रही है, जान ज्यादा खा रही है।
इधर खाना-पीना आॅनलाइन मंगाओ तो दुख, न मंगाओ तो दुख। कमबख्त रेस्टोरेंट वालों ने बिल में अतिरिक्त गैस सरचार्ज लगाना शुरू कर दिया है। बार-बार शरीर की सीटियों से परेशान होकर कल बच्चों ने कह दिया कि पापा, लेमन जूस पीओ। पेट साफ हो जाएगा। गैस की तरह घर में नींबूओं का भी टोटा था। बच्चे बोले- ‘आनलाइन मंगा लो।’ नींबू-पानी का आॅर्डर किया तो पता चला, उसमें भी गैस चार्ज के अतिरिक्त बीस रुपए जोड़े हुए थे। अब रेस्टोरेंट वालों से कोई पूछे कि नींबू-पानी बनाने में कौनसी गैस लगती है। मतलब जहां गैस की जरूरत नहीं, वहां भी गैस चार्ज जोड़ दिए। होर्मुज संकट को घर तक लाने के लिए ट्रंप महाशय को मन ही मन दो-चार उच्चस्तरीय गालियों से नवाजा और आॅर्डर को अंजाम तक पहुंचाया।
समय का खेल भी बड़ा निराला है। वर्ष 2016 की नोटबंदी में हाल कुछ इस तरह था- घर में शादी है। गैस भी, गेस्ट भी.. पर कैश नहीं..! फिर 2020 में कोरोना काल आया। तब मामला था- कैश भी, गैस भी.. पर गेस्ट नहीं..! और आज 2026 में हाल यह है- कैश भी है, गेस्ट भी हैं.. पर गैस ही नहीं है..। गैस की समस्या कभी खत्म नहीं होती। बस अपडेट होती रहती है। चाहे वह शरीर की गैस हो या रसोई गैस हो। एक गैस (रसोई की) आ नहीं रही, दूसरी गैस (शरीर की) जा नहीं रही।
‘पापा, गाड़ी की गैस खत्म हो गई है,’ नीचे से बेटे की आवाज सुनकर यूं महसूस हुआ कि घर में कोई गैस-बम फूटा हो। अब की बार ट्रंप के साथ-साथ जनाब खामनेई और भारत सरकार को याद करते हुए स्वयं को भी इस बात के लिए कोसा कि गलती हमारी भी है, जो हम हर चीज के लिए गैस पर निर्भर हैं। गैस का क्या वजूद! हवा-हवाई.., दिखती तो है नहीं। जाने कब खत्म हो जाए..। जिस रसोई गैस की बदबू नाक में दम कर देती थी, अब उसी गैस की बदबू सूंघने के लिए हम बेताब थे। पर गैस की ‘महक’ फिजां में कहीं खो गई थी।



