
कांग्रेस के सामने स्वयं को बनाए रखने की चुनौती है। यह जिÞम्मेदारी राहुल गांधी अकेले अपने कंधों पर उठाए दिखाई देते हैं, लेकिन इसे पूरी तरह प्रशंसनीय नहीं माना जा सकता है। उनके पास एक पुरानी, राष्ट्रीय और ऐतिहासिक पार्टी है, जिसमें तमाम नए-पुराने महत्वपूर्ण नेता मौजूद हैं। जमीनी स्तर पर ये तमाम नेता सक्रिय क्यों नहीं होते हैं? होना तो यह चाहिए कि सरकार के सभी विभागों के मंत्रियों की तरह, विपक्ष के पास भी उन पर निगरानी रखने के लिए समानांतर रूप से एक-एक समर्थ नेता हो। आखिर आप भी सरकार बनाने के लिए ही इतनी कवायद और दावेदारी कर रहे हैं, और जनता देख रही है। शक्ति को अपनी डाइनिंग टेबल तक सीमित करके बड़ी लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती है।
कहते हैं, एक कुशल खिलाड़ी प्रतिद्वंद्वी को पहले अपने एरीना (मैदान) में लाता है और वहाँ अपनी शर्तों पर उसे लड़ने के लिए मजबूर करता है। नरेंद्र मोदी जमीनी अनुभव से पगे नेता हैं। उनके पास एक सशक्त राजनीतिक संगठन का सहयोग है। खास बात यह है कि सत्ता और संगठन के पास दीर्घकालिक लक्ष्य हैं। वे मानते हैं कि सत्ता साधन है, साध्य नहीं। धारा 370 हो या लंबे समय से विवादित राम मंदिर का मुद्दा, पार्टी ने अपने समय और शक्ति का उपयोग इस लक्ष्य को हासिल करने में किया। अपनी पार्टी को मजबूत बनाने के लिए देशभर में आधुनिक तकनीकी सुविधाओं से युक्त पार्टी कार्यालय बनाए और वित्त व्यवस्था भी गजब की सुदृढ़ की। इससे पार्टी में आत्मविश्वास और बढ़ा। जनता की धार्मिक भावना को ध्यान में रखते हुए तमाम मंदिर और तीर्थ स्थलों का विकास किया गया है। कुछ पर्यटन स्थल भी विकसित किए गए हैं। नई संसद भवन का निर्माण भी एक महत्वपूर्ण काम है। धर्म की गहरी जड़ों की पहचान कर, उसे अपने पक्ष में उपयोग एक राजनीतिक कौशल की तरह किया गया है। परिणामस्वरूप, तमाम कथा आयोजन, प्रवचन, भजन-भंडारे, साधु-संत और उपदेशक उनके पक्ष में बोलते और काम करते दिखाई देते हैं।
लोकतंत्र में विपक्ष की रचनात्मक भूमिका होती है। असल में चौकीदार तो विपक्ष होता है। विपक्ष को आदर और सम्मान देना भारतीय लोकतंत्र की परंपरा भी रही है। लेकिन भाजपा ने ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ का आक्रामक लक्ष्य घोषित कर लोकतांत्रिक चुनावी व्यवस्था को युद्ध में बदल दिया। इसके जवाब में कांग्रेस को अपने मजबूत इतिहास को रेखांकित करते हुए संगठित होना चाहिए था। भाजपा जानती है कि कांग्रेस का मजबूत पक्ष क्या है, इसलिए बार-बार नेहरू को निशाने पर लिया जाता रहा है। मुख्य पिलर पर चोट करने से भवन जल्दी धराशायी हो जाता है। बुलडोजर सिर्फ़ मकान पर ही नहीं चलते हैं। जरूरत पड़ जाए तो महापुरुष भी इसकी चपेट में आ सकते हैं। दक्षिणपंथी विचारधारा उन्हें नायक मानने से संकोच करती है जो अंग्रेजों से लड़े। मुगलों से जो लड़े, उन्हें नायक मानना उनकी राजनीतिक सुविधा भी है।
सत्ता नेतृत्व जानता है कि कहां कांग्रेस निशस्त्र हो सकती है। सबसे बड़ी निशस्त्रता प्रगतिशील, समावेशी राजनीतिक विचारधारा के कारण है। गांधी जब ग्राम स्वराज की बात कर रहे थे, तब नेहरू ने उद्योग और वैश्विक मंच पर भारत को देखना चाहा। वे देश को आधुनिक संसार में देखना चाहते थे, जाहिर है, बहुत सी चीजें छोड़नी पड़ीं। पश्चिम का अनुकरण हुआ-न केवल तकनीक में अपितु जीवन शैली, शिक्षा और संस्कृति में भी। इसके चलते जातिगत और धर्मगत नजरियों पर शिथिलता बरती गई। आज की राजनीति में सांप्रदायिक मुद्दे और विचार जब भी उठाए जाते हैं, कांग्रेस राजनीतिक रूप से कमजोर पड़ने लगती है और उसे मुस्लिम परस्त बताते हुए घेर लिया जाता है। गोमांस जैसे संवेदनशील मुद्दों पर अनेक बार कांग्रेस को असहज होते देखा है। अस्सी करोड़ लोगों को मुफ़्त राशन देने का विरोध कोई भी पार्टी नहीं कर पा रही है। हर मौके पर कांग्रेस के मात्र चार चेहरे दिखाई देते हैं। प्रतीत होता है, कांग्रेस नेतृत्व अपने लोगों का उपयोग नहीं कर पा रहा है। यदि कोई दल है, तो दल की तरह दिखना भी चाहिए। कांग्रेस को हर समय मिशन मोड में रहने वाली भाजपा से भी सीखने की जरूरत है।
कांग्रेस के महत्वपूर्ण नेता या तो खामोश बैठे हैं या फिर पार्टी छोड़कर जा रहे हैं। उन्हें पार्टी में रोक रखने की कोशिश दिखाई नहीं देती। होना तो यह चाहिए था कि वे जमीनी स्तर पर कोई मजबूत संगठन बनाने का प्रयास करते। हालांकि आरएसएस की तरह का संगठन बना लेना कांग्रेस के बूते का नहीं है। लेकिन केवल सरकार से असंतोष और बिखरे हुए लोगों के भरोसे कुछ हासिल नहीं होने वाला है। लगता है कांग्रेस के पुरातन पेड़ पर एकतरफा पतझर चल रहा है। हाल के दिनों में कुछ जगहों पर कांग्रेस की सभाओं में भीड़ दिखाई दी है, लेकिन इस भीड़ को वोट में बदलना बहुत बड़ी चुनौती है। कांग्रेस के समक्ष बड़ी चुनौती पार्टी को बनाए रखने की है।

