Friday, February 6, 2026
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विकास और पर्यावरण की एक जैसी लड़ाई

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केंद्र सरकार ने हाल ही में कश्मीर में प्रस्तावित तीन रेलवे परियोजनाओं पर रोक लगाकर एक महत्वपूर्ण संदेश दिया है। यह फैसला सेब के बागों को बचाने के लिए लिया गया है, जिन पर इन रेल लाइनों के निर्माण से सीधा खतरा मंडरा रहा था। यह कदम न केवल पर्यावरण संरक्षण की दिशा में सराहनीय है बल्कि उन किसानों के लिए भी बड़ी राहत है जिनकी आजीविका सेब के बागों पर निर्भर है। प्रस्तावित रेलवे लाइनों के कारण पुलवामा, शोपियां और अनंतनाग जैसे इलाकों में सेब के हजारों पेड़ों के कटने की आशंका थी। ये इलाके कश्मीर के सेब उत्पादन का केंद्र हैं और वहां की ग्रामीण अर्थ व्यवस्था की रीढ़ माने जाते हैं। बीते एक साल से किसान इस डर में जी रहे थे कि विकास के नाम पर उनकी जमीन और रोजगार छिन जाएगा। इसी आशंका के चलते किसानों ने विरोध प्रदर्शन भी किए और सरकार से इन परियोजनाओं को रद्द करने की मांग की। रेल मंत्री ने स्पष्ट किया कि जम्मू-कश्मीर सरकार और राज्य के सांसदों की सिफारिश पर इन परियोजनाओं को रोका गया है ताकि बागों को नुकसान से बचाया जा सके। यह निर्णय इस बात की मिसाल है कि यदि सरकार चाहे, तो वह विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बना सकती है। पर बड़ा सवाल यह है कि क्या यही संवेदनशीलता देश के अन्य हिस्सों में भी दिखाई जा रही है?

इस सवाल के जवाब में राजस्थान के बीकानेर में चल रहा ह्यखेजड़ी बचाओ-प्रकृति बचाओह्ण आंदोलन ध्यान खींचता है। यह आंदोलन राजस्थान में सौर ऊर्जा परियोजनाओं के नाम पर हो रही पर्यावरणीय क्षति के विरोध में खड़ा हुआ है। इस आंदोलन के तहत पर्यावरण संघर्ष समिति ने बीकानेर में तीन दिन पहले महापड़ाव डाला है। महापड़ाव स्थल पर आमरण अनशन पर पहले 363 पर्यावरण प्रेमी बैठे, जिनकी संख्या बाद में 450 हो गई। इनमें 29 संत, एक साध्वी और 68 महिलाएं हैं। अनशन पर 18 के युवा से लेकर 80 साल तक के बुजुर्ग बैठे हुए हैं। पर्यावरण कार्यकतार्ओं का आरोप है कि सौर ऊर्जा परियोजनाओं के लिए राजस्थान में पिछले एक दशक में लाखों पेड़ काटे गए हैं। इनमें खेजड़ी जैसे पारंपरिक और जीवनदायी वृक्ष भी शामिल हैं। खेजड़ी को राजस्थान में ह्यकल्प वृक्षह्ण का दर्जा प्राप्त है। यह न केवल मरुस्थलीय पर्यावरण को संतुलन देता है बल्कि इससे सांगरी जैसी सब्जी, पशुओं के लिए चारा और ग्रामीण समुदाय की आजीविका भी जुड़ी हुई है।

जन्म से मृत्यु तक के सामाजिक संस्कारों में भी खेजड़ी की मौजूदगी अपरिहार्य है। महाराजा गंगासिंह विश्वविद्यालय के पर्यावरण विभाग के प्रो. अनिल छंगाणी की स्टडी में यह तथ्य उजागर हुआ है कि सोलर लगाने के लिए 10 साल में 50 लाख पेड़ काटे जा चुके हैं। इनमें खेजड़ी, बेर, केर, रोहिड़ा, बबूल आदि शामिल हैं। अध्ययनों में यह भी सामने आया है कि सौर प्लांटों के आसपास का तापमान औसतन 4-5 डिग्री तक बढ़ जाता है। पेड़ों की कटाई से कीट-पतंगों, मधुमक्खियों, पक्षियों और अन्य जीवों के आवास नष्ट हो रहे हैं। गोंद और चारे की उपलब्धता घट रही है, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर सीधा असर पड़ रहा है। इसके अलावा, सौर संयंत्रों को साफ और ठंडा रखने के लिए भारी मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है जबकि राजस्थान जल संकट से जूझ रहा है।

कोयला, परमाणु और गैस आधारित बिजली उत्पादन से प्रदूषण फैलता है और कोयले के भंडार भी सीमित हैं। ऐसे में वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों को अपनाना अपरिहार्य है। लेकिन क्या इसका मतलब यह होना चाहिए कि पर्यावरण और पारंपरिक जीवन प्रणालियों की अनदेखी कर दी जाए? यहीं पर कश्मीर और बीकानेर के मामलों की तुलना करना आवश्यकता लगता है। कश्मीर में सरकार ने सेब के बागों को बचाने के लिए विकास परियोजनाओं पर रोक लगाई। वहां यह माना गया कि किसानों की आजीविका और पर्यावरण को नुकसान पहुंचा कर विकास का कोई औचित्य नहीं है।

कश्मीर के सेब के बाग और राजस्थान की खेजड़ी दोनों ही अपने-अपने क्षेत्रों की अर्थ व्यवस्था और संस्कृति के आधार हैं। अंतर केवल इतना है कि एक मामले में सरकार ने संवेदनशीलता दिखाई है जबकि दूसरे मामले में अब भी आवाजें अनसुनी हैं। सवाल है कि क्या विकास की परिभाषा क्षेत्र के अनुसार बदल जानी चाहिए? क्या एक राज्य के पेड़ ज्यादा कीमती हैं और दूसरे के कम? जरूरत इस बात की है कि सौर ऊर्जा परियोजनाओं के लिए स्पष्ट और सख्त पर्यावरणीय नियम बनाए जाएं। कंपनियों को पेड़ कटाई, जल उपयोग और स्थानीय जैव विविधता के संरक्षण के लिए जवाबदेह ठहराने की जरूरत है। नीतियों में स्थानीय समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए ताकि विकास उनके खिलाफ नहीं बल्कि उनकी सहभागिता से हो। केन्द्र सरकार फैसला यह दिखाता है कि यदि राजनीतिक इच्छाशक्ति हो, तो पर्यावरण और आजीविका दोनों को बचाया जा सकता है।

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