Wednesday, September 22, 2021
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सरकार के साथ समाज भी जिम्मेदारी निभाए

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कोरोनारूपी महामारी से जुड़ी हर मुश्किल घड़ी का सामना लाकडाउन में हमने भले ही मुस्कुराते हुए किया हो, लेकिन अनलॉक में कोरोना अब अधिक दुर्गम सार्वजनिक चुनौती बन रहा है और रुला रहा है। कोरोना को लेकर सरकारी घोषणा एवं आंकलन भी चुनावी घोषणा पत्र की तरह लगने लगे हैं। भारत में जब कोरोना के मामले नगण्य थे, सरकार और प्रशासन बहुत जागरूक था। जब मामले चरम पर थे, सरकारें निस्तेज हो गईं थीं, यह कैसी विडम्बना एवं विरोधाभास है? कोरोना का खतरा एक बार फिर डरा रहा है। दूसरी लहर में रोजाना सामने आने वाले नए मामलों की संख्या 20 हजार से 1 लाख पार करने में महज 25 दिन लगे, जबकि पहली लहर में 76 दिनों में आंकड़ा एक लाख पहुंचा था। इस दौर में 8 राज्य कोरोना से सबसे अधिक प्रभावित हुए हैं और 80 फीसदी से अधिक मामले इन्हीं राज्यों में पाए गए हैं। इस साल की शुरुवात में जनवरी फरवरी में ऐसा लगने लगा था कि अब कोरोना जाने वाला है, नए मामलों की संख्या 11,000 के पास पहुंचने लगी थी, लेकिन अब नए मामलों की संख्या रोजाना 50 हजार के पार कर चुकी है। 9-10 सितंबर 2020 के आसपास हमने कोरोना का चरम देखा था, जब मामले रोज 97,000 के पार पहुंचने लगे थे।

इसमें दु:खद तथ्य यह है कि तब भी महाराष्ट्र सबसे आगे था और आज भी 60 प्रतिशत से ज्यादा मामले अकेले इसी राज्य से आ रहे हैं। हम वही देखते हैं, जो सामने घटित होता है। पर यह क्यों घटित हुआ या कौन इसके लिए जिम्मेदार है? यह वक्त ही जान सकता है। आदमी तब सच बोलता है, जब किसी ओर से उसे छुपा नहीं सकता, पर वक्त सदैव ही सच को उद्घाटित कर देता है।

देश के लिए यह सोचने का समय है, ताकि पिछले साल की तरह कोरोना संक्रमण वापसी न कर सके। आंखें खोलकर एक पर आंकड़ों को गौर से नए चश्मे से देखना होगा। यक्ष प्रश्न है कि आखिर कोरोना को परास्त करते-करते क्यों दोबारा से कोरोना पीड़ितों की संख्या बढ़ने लगी हैं इसलिए हमें कोरोना महामारी के दूसरे दौर के लिए अधिक सतर्क, सावधान एवं दायित्वशील होना होगा।

देश में टीकाकरण अभियान में बहुत भारी भीड़ उमड़ रही है, लेकिन प्रशासन के पास पर्याप्त इंतजामात नहीं हैं। दूरदराज इलाकों में लोगों को घंटों गर्मी में लाइन में खड़ा होना पड़ रहा है। कमरों में लोगों के बैठने के लिए भी जगह कम पड़ रही है।

कोविड के खतरों को देखते हुए बीमार लोगों शासन की गाइडलाइन के तहत ही टीकाकरण कराया जा रहा है जो केवल कागजों में दर्ज है। वैक्सीन लगाने वाले कोरोना के हमारे वारियर भी अब मास्क पहनने के नाम पर औपचारिकता ही निभा रहे हैं। सोशल डिस्टेंसिंग भी अब इनके लिए दूर की गोटी हो चुकी है।

टीकाकरण बूथ पर पहचान पत्र, आधार कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस या अन्य फोटोयुक्त आईडी के आधार पर पंजीकरण तो हो रहा है, वहीं टीकाकरण के बीच गंभीर बीमारी से ग्रस्त लोगों के लिए शासन ने गाइडलाइन जारी की है, जिसमें कहा गया है कि गंभीर बीमारी से ग्रस्त 45 से 59 साल उम्र तक के ऐसे लोग जिन्हें ब्लड प्रेशर, कैंसर, हृदय रोग, सांस संबंधी बीमारी है, तो उन्हें अपने साथ इलाज करने वाले डॉक्टर का पर्चा और उनका परामर्श दिखाना होगा। इसे पहले पोर्टल पर अपलोड किया जाएगा फिर मौजूद स्वास्थ्य विशेषज्ञों के विचार के बाद ही उन्हें टीका लगेगा लेकिन अब ऐसा कहीं नहीं हो रहा है और सारी कवायद कागज में डाटा फिट हर दिन बढ़त बढ़ाने तक सिमटती जा रही है? अब तो वैक्सीन लगाने का सिलसिला रफ्तार पकड़ चुका है। क्या स्वस्थ क्या गंभीर बीमार सब एक श्रेणी के हो चले हैं।

भारत ही नहीं, दुनिया के विकसित देश भी इस भयावह बीमारी से जूझ रहे हैं। वैज्ञानिक अप्रैल के मध्य में कोरोना की दूसरी लहर के पीक स्तर पर पहुंचने का अनुमान लगा रहे हैं। दुनिया को इस महामारी से जूझते हुए एक वर्ष से अधिक का समय हो चुका है।

हालांकि वैक्सीन भी आ चुकी है परंतु वैक्सीन लगवाने की रफ्तार बेहद धीमी है। भारत में अभी तक मात्र छह करोड़ लोगों को ही वैक्सीन लग पाई है। सरकारें अपने स्तर पर प्रयास कर रही हैं। कहीं पर पूर्ण तो कहीं पर आंशिक पाबंदियां लगाई गई हैं। बेशक इस प्रकार की पाबंदियां, लॉकडाउन इस महामारी का हल नहीं परंतु इस प्रकार की पाबंदियों द्वारा कोरोना की रफ्तार को कुछ कम अवश्य किया जा सकता है।

लॉकडाउन के दौरान आने वाली समस्याओं से जनता भी रूबरू हो चुकी है। सरकारी प्रयास तभी सफल होते हैं, जब जनता की उसमें सहभागिता होती है। कोरोना को रोकने की जिम्मेदारी केवल सरकार की है यह सोचने की भूल मानव जीवन पर भारी पड़ सकती है। कोरोना से बचने के लिए हर एक व्यक्ति को जागरूक होना होगा और खुद का बचाव करना होगा।

हमारे शरीर में कोरोना के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता खत्म हो जाना भी कोरोना के पुन: उभरने का एक कारण है। अभी भी लॉकडाउन से संक्रमण को थामा जा सकता है। बेशक पिछले साल यही उपाय अधिक कारगर रहा था, लेकिन इसका फायदा यह मिला कि कोरोना के खिलाफ हम अधिक सावधान हो गए, कमियां एवं त्रुटियां सुधार लीं।

अस्पतालों की सेहत सुधार ली लेकिन अब साधन-सुविधाओं से अधिक सावधानी ही बचाव का सबसे जरूरी उपाय है। मास्क पहनना, शारीरिक दूरी का पालन करना और सार्वजनिक जगहों पर जाने से बचना कहीं ज्यादा प्रभावी उपचार है। घर से बाहर निकलते वक्त हमें पूरी सावधानी बरतनी होगी। अभी लापरवाही एवं गैर-जिम्मेदाराना हरकत किसी अपराध से कम नहीं है। जनता को यह बात समझने की आज जरूरत है।


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